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  "type": "article",
  "title": "पटना के पीएमसीएच में रोज मुफ्त थाली बांटता है निखिल कुमार सानू, वजह जान भर आएंगी आंखें",
  "summary": "पटना के पीएमसीएच अस्पताल में बिहार भोजन दान फाउंडेशन के संस्थापक निखिल कुमार सानू दो साल से रोज सुबह मरीजों के भूखे परिजनों को मुफ्त थाली परोसते हैं। बचपन में खुद भूखा रहने के बाद उन्होंने यह वादा निभाया और अब हर दिन करीब 250 से 300 लोगों का पेट भरते हैं।",
  "content": "पटना के पीएमसीएच अस्पताल के गेट पर रोज सुबह एक अनोखा नजारा दिखता है। सिर पर गेरुआ गमछा बांधे एक युवक हाथ में थाली लिए मरीजों के परिजनों को आवाज लगाता है कि खाना आ गया है, भरपेट खाइए, बिल्कुल मुफ्त है। यह आवाज सिवान के रहने वाले रमेश के कानों तक भी पहुंची, जिनका बेटा ब्रेन के गंभीर इन्फेक्शन के चलते अस्पताल में भर्ती है। रात से रमेश और उनकी पत्नी ने अन्न का एक दाना तक नहीं खाया था। इलाज का खर्च और बेटे की जान बचने की चिंता में इमरजेंसी के बाहर बैठे रमेश टूट चुके थे, तभी यह आवाज उनके लिए किसी सहारे से कम नहीं थी।\n\nगेट पर कढ़ी, चावल और चोखे से भरी थाली हाथ में आते ही रमेश की आंखों से आंसू निकल पड़े। वे उस शख्स के पैरों में गिर गए और रोते हुए बताया कि उनकी पत्नी अंदर भूखी बैठी है, मगर गार्ड खाना अंदर ले जाने नहीं देता। उस शख्स ने रमेश को संभाला, हौसला दिया, उन्हें भरपेट खिलाया और पत्नी के लिए भी अलग से भोजन का पैकेट दिया। रमेश अकेले ऐसे परिजन नहीं हैं। पीएमसीएच में रोज ऐसे कई परिवार पहुंचते हैं जिनकी जमा पूंजी इलाज और दवाइयों में खत्म हो चुकी है और दो वक्त की रोटी जुटाना भी उनके लिए संभव नहीं रह गया है।\n\nकौन हैं यह गेरुआ गमछाधारी युवक\nइस शख्स का नाम निखिल कुमार सानू है और वे बिहार भोजन दान फाउंडेशन के संस्थापक हैं। पिछले दो साल से निखिल हर दिन सुबह 11 बजे से साढ़े 11 बजे के बीच पीएमसीएच के मरीन ड्राइव गेट पर मुफ्त भोजन लेकर पहुंचते हैं। भोजन और पानी एक ई रिक्शा पर लदा रहता है और साथ में एक बैनर भी टंगा होता है, जिसपर लिखा है कि एक रुपये में भरपेट भोजन मिलता है। यह एक रुपया सिर्फ उन लोगों के लिए रखा गया है जो मुफ्त में खाना नहीं खाना चाहते। हालात यह हैं कि निखिल के पहुंचने से पहले ही भूखे परिजन गेट पर लाइन लगाकर उनका इंतजार करने लगते हैं।\n\nबचपन की वह भूख, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी\nनिखिल का यह सफर आसान नहीं रहा। बचपन में एक वक्त ऐसा भी आया था जब वे खुद एक वक्त के खाने के लिए तरस गए थे। उनकी दादी करीब दो महीने तक अस्पताल में भर्ती रहीं। उसी दौरान उनके पिता जहां नौकरी करते थे, वहां लंबे समय से हड़ताल चल रही थी। इलाज में घर की सारी जमा पूंजी खत्म हो गई और हालात इतने खराब हो गए कि दो वक्त का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो गया। पीएमसीएच से मरीज को मिलने वाले ब्रेड और अंडे के लिए निखिल और उनकी बहन आपस में लड़ पड़ते थे। भूख के उन्हीं मुश्किल दिनों में निखिल ने खुद से एक वादा किया था कि जिस दिन उनकी स्थिति बेहतर होगी, वे अस्पताल में भूखे मरीजों और उनके परिजनों को मुफ्त भोजन कराएंगे।\n\nढाई किलो चावल से शुरू हुआ सफर आज बना बड़ा भंडारा\nबड़े होने के बाद निखिल ने अपना वह बचपन का वादा निभाना शुरू किया। शुरुआत बेहद छोटी थी, महज ढाई किलो चावल से सेवा की नींव पड़ी। पहले हफ्ते में सिर्फ एक दिन अस्पताल जाकर लोगों को खाना खिलाते थे। धीरे-धीरे लोग इस मुहिम से जुड़ने लगे। किसी ने चावल देना शुरू किया तो किसी ने सब्जी का खर्च उठा लिया। कारवां बढ़ता गया और देखते ही देखते ढाई किलो चावल से शुरू हुई यह छोटी कोशिश आज एक बड़े भंडारे का रूप ले चुकी है। अब बिहार भोजन दान फाउंडेशन के जरिए कई लोग इस काम में सहयोग करते हैं और निखिल हर दिन मरीजों और उनके परिजनों को भरपेट मुफ्त भोजन कराते हैं।\n\nनिखिल बताते हैं कि यहां हर दिन अलग-अलग तरह का खाना परोसा जाता है। किसी दिन कढ़ी-चावल के साथ चोखा बनता है तो किसी दिन पूरी-सब्जी के साथ जलेबी भी खिलाई जाती है। कई लोग अपने जन्मदिन या सालगिरह को खास बनाने के लिए मिठाई या दूसरे फूड आइटम लेकर यहां पहुंचते हैं और बड़े प्रेम से मरीजों तथा उनके परिजनों को खुद अपने हाथों से खाना खिलाते हैं।\n\nहर दिन 250 से 300 लोगों की भरता है थाली\nनिखिल बताते हैं कि खाना पहुंचते ही वे खुद पीएमसीएच के अंदर जाते हैं और परिजनों को बुलाकर भोजन के लिए बाहर लाते हैं। सभी को पूरे सम्मान के साथ भरपेट खाना खिलाया जाता है। हर दिन करीब 250 से 300 लोग यहां भोजन करते हैं। इनमें से कई परिजन वार्ड में भर्ती मरीजों के लिए भी खाना पैक कराकर ले जाते हैं। बुधवार को छोड़कर सप्ताह के बाकी सभी दिन यह सेवा बिना रुके जारी रहती है।\n\nपरिजनों की दर्द भरी कहानियां, जो आंखें नम कर देती हैं\nनिखिल बताते हैं कि यहां सिर्फ बिहार से ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों से भी जरूरतमंद लोग पहुंचते हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे परिवार होते हैं जिनका पटना शहर में कोई अपना नहीं है और वे लंबे समय से पीएमसीएच में इलाज करा रहे हैं। कोई प्रेम विवाह के बाद पत्नी का इलाज कराने अकेला यहां पहुंचा है, लेकिन उसे अपने परिवार से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही। कई छोटे बच्चे रातभर अपने पिता के साथ अस्पताल के चक्कर काटते रहते हैं, क्योंकि उनकी मां वार्ड में भर्ती है। रात से भूखे इन बच्चों को जब खाने की थाली मिलती है तो उनके चेहरे की खुशी बहुत कुछ बयां कर देती है।\n\nनिखिल एक वाकये को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार एक महिला लगातार तीन दिनों से भूखी थी। चौथे दिन वह लोगों से पूछते-पूछते किसी तरह यहां तक पहुंची। जिस तरह वह खाना खा रही थी, उसे देखकर ही अंदाजा हो गया कि उसने कितने दिनों से पेट भरकर भोजन नहीं किया था। निखिल कहते हैं कि यहां ज्यादातर वही लोग आते हैं जिनके परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से अस्पताल में भर्ती है और इलाज के चलते उनकी आर्थिक हालत पूरी तरह बिगड़ चुकी है। वे कहते हैं कि जिस परिवार का कमाने वाला सदस्य ही महीनों से अस्पताल के बिस्तर पर हो, उस घर की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। उनकी यह छोटी सी कोशिश बस ऐसे ही जरूरतमंद परिवारों के लिए है।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह कहानी बताती है कि किसी भी शहर में अस्पताल के बाहर भूखे मरीजों और परिजनों की मदद के लिए छोटे स्तर पर शुरू की गई पहल भी बड़ा सहारा बन सकती है, और आम लोग चावल, सब्जी या पैसे देकर ऐसी सेवाओं में सीधे योगदान कर सकते हैं।\n• पटना और बिहार में: पीएमसीएच में इलाज करा रहे मरीजों के परिजन अब जान सकते हैं कि मरीन ड्राइव गेट पर हर दिन, बुधवार को छोड़कर, सुबह 11 से साढ़े 11 बजे के बीच बिहार भोजन दान फाउंडेशन की तरफ से मुफ्त भरपेट भोजन उपलब्ध है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. निखिल कुमार सानू कौन हैं?\nवे बिहार भोजन दान फाउंडेशन के संस्थापक हैं, जो पिछले दो साल से पीएमसीएच में मरीजों के परिजनों को मुफ्त भोजन कराते हैं।\n\n2. यह सेवा कहां और कब चलती है?\nयह सेवा पीएमसीएच के मरीन ड्राइव गेट पर, बुधवार को छोड़कर हर दिन सुबह 11 से साढ़े 11 बजे के बीच चलती है।\n\n3. रोज कितने लोगों को भोजन मिलता है?\nहर दिन करीब 250 से 300 लोग यहां भरपेट भोजन करते हैं।\n\n4. इस सेवा की शुरुआत कैसे हुई?\nबचपन में दादी की बीमारी के दौरान निखिल के परिवार को भूख झेलनी पड़ी थी, इसी अनुभव से प्रेरित होकर उन्होंने महज ढाई किलो चावल से यह सेवा शुरू की थी।\n\n5. यहां किस तरह का भोजन परोसा जाता है?\nअलग-अलग दिन कढ़ी-चावल-चोखा या पूरी-सब्जी-जलेबी जैसा भोजन परोसा जाता है, और कई लोग खास मौकों पर मिठाई भी लेकर आते हैं।\n\n6. बैनर पर एक रुपये में भोजन क्यों लिखा है?\nयह सिर्फ उन लोगों के लिए है जो मुफ्त में खाना स्वीकार नहीं करना चाहते, बाकी सभी को यह भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है।\n\n7. क्या यहां सिर्फ बिहार के लोग ही आते हैं?\nनहीं, बिहार के अलावा आसपास के राज्यों से भी जरूरतमंद परिवार यहां भोजन के लिए पहुंचते हैं।\n\n8. क्या वार्ड में भर्ती मरीजों के लिए भी खाना मिलता है?\nहां, कई परिजन अपने भर्ती मरीजों के लिए भी यहां से खाना पैक कराकर ले जाते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nनिखिल कुमार सानू की कहानी बताती है कि अपनी सबसे मुश्किल यादों को भी कैसे किसी और की जिंदगी बेहतर बनाने में बदला जा सकता है।\n\n• दर्द को मकसद बनाया: बचपन में भूख से जूझने के अनुभव को उन्होंने शिकायत नहीं, बल्कि एक वादे में बदल दिया कि हालात सुधरने पर वे दूसरों की मदद करेंगे।\n• छोटी शुरुआत से नहीं घबराए: महज ढाई किलो चावल और हफ्ते में एक दिन की सेवा से शुरुआत की, बिना बड़े संसाधनों का इंतजार किए।\n• लोगों को जोड़ना सीखा: धीरे-धीरे और लोगों को इस मुहिम से जोड़ा, जिससे यह छोटी कोशिश एक बड़े भंडारे में बदल गई।\n• सम्मान के साथ सेवा दी: सिर्फ खाना बांटने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि खुद अंदर जाकर परिजनों को बुलाना और पूरे सम्मान के साथ खिलाना उनकी सेवा का हिस्सा बनाया।\n• निरंतरता बनाए रखी: दो साल से लगातार, हफ्ते में लगभग हर दिन यह सेवा जारी रखी है, जो दिखाता है कि निरंतरता ही किसी भी छोटी पहल को बड़ा असर देती है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-07-12",
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    "अस्पताल भोजन सेवा"
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