# पूर्णिया के रूपेंद्र दुबे की अनोखी कहानी, मां के आशीर्वाद से ट्रैक्टर चलाने से लेकर ढाबा चलाने तक का सफर

> पूर्णिया के रूपेंद्र मोहन दुबे ने अपनी मां की प्रेरणा से ‘दुबे दरबार’ ढाबे की शुरुआत की, जो आज 22 परिवारों को रोजगार दे रहा है। कभी खेतों की जुताई करने वाले रूपेंद्र आज सफल व्यवसायी बन चुके हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-09-01 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/purnia-ke-rupendra-dubey-ki-anokhi-kahani-maa-ke-aashirwad-se-tractor-chalane-se-lekar-dhaba-chalane-tak-ka-safar-25436 · **Language:** Hindi
**Tags:** पूर्णिया, बिहार, सफलता की कहानी, रोजगार, दुबे दरबार, रूपेंद्र दुबे

बिहार के पूर्णिया में रूपेंद्र मोहन दुबे की कहानी संघर्ष से सफलता की एक मिसाल पेश करती है। इलाके में उन्हें लोग लड्डू दुबे के नाम से भी पुकारते हैं। उन्होंने अपनी मां की प्रेरणा से ‘दुबे दरबार’ नाम से एक ढाबे की शुरुआत की है। यह ढाबा आज 22 लोगों के परिवारों का भरण-पोषण कर रहा है, जो कभी खुद किराने की छोटी दुकान चलाते थे या खेतों में मजदूरी करते थे। दूसरों को रोजगार देने वाले रूपेंद्र दुबे की यह यात्रा प्रेरणादायक है।

## संघर्ष के दिन और ट्रैक्टर का सफर
साल 1990 से पहले का समय रूपेंद्र मोहन दुबे के लिए काफी अलग था। वे खेतों में खेती का काम करते थे और अपने ट्रैक्टर से 60 रुपये प्रति घंटे की दर से किसानों के खेतों की जुताई किया करते थे। इसके बाद उन्होंने समय के साथ पूर्णिया के डॉलर हाउस चौक पर एक किराने की दुकान भी संचालित की। हालांकि, उन्हें अपने लिए जीने से ज्यादा दूसरों की भलाई करने और उनके जीवन में सुधार लाने में संतुष्टि मिलती थी।

## मां की सीख और समाज सेवा की प्रेरणा
रूपेंद्र मोहन दुबे की मां एक समाजसेविका थीं। उनकी मां उन्हें हमेशा समाज के हित में काम करने की सलाह देती थीं। वह चाहती थीं कि रूपेंद्र ऐसा कोई व्यवसाय शुरू करें जिससे न सिर्फ समाज का नाम रोशन हो, बल्कि जरूरतमंद लोगों को आसानी से रोजगार भी मिल सके। मां की यही बातें उनके मन में घर कर गईं और उन्होंने इसी दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया।

## ‘दुबे दरबार’ की स्थापना और लोकप्रियता
मां की दी गई सीख से पूरी तरह प्रेरित होकर रूपेंद्र मोहन दुबे ने पूर्णिया के नवनिर्मित बाईपास के पास सिपाही टोला बक्सा घाट रोड के किनारे अपनी पैतृक जमीन पर ‘दुबे दरबार’ रेस्टोरेंट नाम से ढाबा खोला। इस ढाबे की खासियत यह है कि यहां 100 से अधिक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिन्हें खाने के लिए दूर-दूर से लोग खिंचे चले आते हैं। यहां हमेशा खाने के शौकीनों की अच्छी खासी भीड़ देखने को मिलती है, और वे साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखते हैं।

## दूसरों के जीवन में उजाला फैलाने की खुशी
रूपेंद्र मोहन दुबे का कहना है कि उन्हें इस बात का बेहद संतोष और खुशी है कि जो इंसान कभी खुद दूसरों के खेतों में काम करके अपनी आजीविका चलाता था, आज वह 22 अन्य लोगों को रोजगार देकर उनके परिवारों का पेट पाल रहा है। उनका यह अनूठा प्रयास समाज के प्रति उनकी गहरी जिम्मेदारी को बयां करता है। उनकी योजना आने वाले समय में अपने इस कारोबार को और विस्तार देकर अधिक से अधिक लोगों को रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने की है।

## इसका आप पर असर
यह सफलता की कहानी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के महत्व को दर्शाती है।

- **बिहार में:** स्थानीय निवासियों और युवाओं को स्वरोजगार शुरू करने तथा समाज सेवा के साथ व्यवसाय चलाने की प्रेरणा मिलती है।
- **पूर्णिया में:** क्षेत्र के स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलते हैं और छोटे उद्यमियों का मनोबल बढ़ता है।

## सवाल-जवाब

### 1. रूपेंद्र मोहन दुबे को किस अन्य नाम से जाना जाता है?
उन्हें इलाके में लोग लड्डू दुबे के नाम से भी जानते हैं।

### 2. रूपेंद्र मोहन दुबे ने कौन सा व्यवसाय शुरू किया है?
उन्होंने पूर्णिया में 'दुबे दरबार' नाम से एक ढाबा और रेस्टोरेंट शुरू किया है।

### 3. वे 1990 से पहले क्या काम करते थे?
1990 से पहले वे खेती करते थे और 60 रुपये प्रति घंटे की दर से ट्रैक्टर से खेतों की जुताई करते थे।

### 4. वर्तमान में उनका ढाबा कितने लोगों को रोजगार दे रहा है?
उनका यह ढाबा कुल 22 लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है।

### 5. यह ढाबा कहां स्थित है?
यह ढाबा पूर्णिया के नवनिर्मित बाईपास के पास सिपाही टोला बक्सा घाट रोड किनारे उनकी पैतृक जमीन पर स्थित है।

## प्रेरणा और सबक
रूपेंद्र मोहन दुबे की यह यात्रा जीवन में आगे बढ़ने और दूसरों की मदद करने के कई महत्वपूर्ण सबक देती है।

- **शुरुआत छोटी हो सकती है:** ट्रैक्टर चलाकर मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी अपनी मेहनत के दम पर बड़ा मुकाम हासिल कर सकता है।
- **समाज को साथ लेकर चलें:** सच्ची सफलता वही है जो आपके साथ-साथ आसपास के कई अन्य परिवारों का भी जीवन सुधार दे।
- **माता-पिता के संस्कारों का महत्व:** परिवार से मिली सही सीख और प्रेरणा इंसान को सही और परोपकारी मार्ग पर ले जाती है।

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