पूर्णिया की दो स्कूली छात्राओं ने बनाया 1500 रुपये में मासिक धर्म स्वास्थ्य निगरानी मॉडल, राष्ट्रीय मंच पर बनाई जगह पूर्णिया की दिव्या कुमारी और सोनम कुमारी ने केवल 1500 रुपये की लागत से एआई और आईओटी आधारित स्मार्ट मासिक धर्म स्वच्छता किट तैयार की है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष 30 में स्थान हासिल किया। मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं को गहराई से समझते हुए बिहार के पूर्णिया जिले की दो स्कूली छात्राओं ने एक अनोखा तकनीकी मॉडल तैयार किया है। आरक्षी मध्य विद्यालय में पढ़ने वाली दिव्या कुमारी और सोनम कुमारी ने अपने नवाचार से यह साबित कर दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सामाजिक समस्याओं का प्रभावी समाधान निकाला जा सकता है। दोनों छात्राओं ने आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए केवल 1500 रुपये के साधारण खर्च में एक खास स्मार्ट किट तैयार की है, जो न केवल महिलाओं के मासिक धर्म स्वास्थ्य की देखरेख करेगी बल्कि कचरा प्रबंधन और स्वच्छता के क्षेत्र में भी बड़ी मदद पहुंचाएगी। इस नवाचार को राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रतियोगिता में शीर्ष 30 प्रोजेक्ट्स में शामिल कर सम्मानित किया गया है। स्कूल के बाद संस्थान में सीखी विज्ञान और क्राफ्ट की तकनीक दिव्या और सोनम नियमित रूप से अपनी स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद बिहार बाल भवन किलकारी जाती हैं। इस संस्थान में बच्चों को उनके खाली समय में विज्ञान, क्राफ्ट और अलग-अलग व्यावहारिक प्रयोगों का मुफ्त प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी सीखने के क्रम में दोनों छात्राओं का ध्यान अपने आसपास की महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली व्यावहारिक दिक्कतों की ओर गया। समाज में झिझक, उचित सुविधाओं की कमी और स्वच्छता से जुड़े संकट को देखते हुए उन्होंने एक ऐसा मॉडल बनाने का फैसला किया जो महिलाओं की इन तकलीफों को कम कर सके। अपने शिक्षक मोहम्मद सद्दाम के मार्गदर्शन में दोनों छात्राओं ने लगातार तीन महीने तक प्रयोगशाला में पसीना बहाया और इस अनूठे मॉडल को अंतिम रूप दिया। एआई और आईओटी आधारित स्मार्ट स्वच्छता मॉडल छात्राओं द्वारा तैयार किए गए इस मॉडल का नाम एआई एंड आईओटी बेस्ड स्मार्ट मेंस्ट्रुअल हेल्थ एंड हाइजीन मॉनिटरिंग किट रखा गया है। यह पूरी प्रणाली मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य, शारीरिक आराम और स्वच्छता पर नजर रखने के लिए बनाई गई है। परियोजना में विशेष रूप से एक सहेली कक्ष की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। यह कक्ष विद्यालयों या कार्यस्थलों पर ऐसा सुरक्षित स्थान होगा जहां मासिक धर्म के कठिन समय में छात्राएं या महिलाएं बिना किसी झिझक के कुछ देर विश्राम कर सकेंगी। इसके अलावा सिस्टम में स्वास्थ्य निगरानी से जुड़े सेंसर और जरूरी संकेतकों को जोड़ा गया है, ताकि स्वच्छता की स्थिति पर सटीक ध्यान दिया जा सके। इस्तेमाल किए गए पैड्स का सुरक्षित निपटान और कंपोस्टिंग इस प्रोजेक्ट की सबसे अहम खूबी पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान पेश करना है। आमतौर पर देखा जाता है कि जानकारी या साधनों के अभाव में महिलाएं इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड्स को खुले में या साधारण कचरे के डिब्बे में फेंक देती हैं। इससे न केवल संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ता है बल्कि प्लास्टिक कचरे के कारण पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचता है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए दिव्या और सोनम ने मॉडल में इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड के सुरक्षित और वैज्ञानिक निपटान की व्यवस्था शामिल की है। साथ ही इसे जैविक रूप से नष्ट कर कंपोस्टिंग में बदलने की प्रक्रिया भी समझाई गई है, जिससे कचरा पर्यावरण को प्रदूषित किए बिना सुरक्षित रूप से उपयोगी खाद के रूप में तब्दील हो सके। मासिक धर्म को लेकर झिझक दूर करने का संकल्प छात्राओं का मानना है कि आज भी समाज में मासिक धर्म को लेकर खुलापन नहीं है और कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। अपनी इस परियोजना के जरिए दिव्या और सोनम यह संदेश देना चाहती हैं कि मासिक धर्म कोई कमजोरी या शर्म का विषय नहीं है, बल्कि यह एक बेहद सामान्य और प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। महिलाओं को अपनी इस जैविक क्रिया के दौरान उचित पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर पूरा ध्यान देना चाहिए। उनका उद्देश्य समाज की इस पुरानी सोच को बदलना है ताकि हर लड़की बिना किसी झिझक के अपनी सेहत की देखभाल कर सके। बेगूसराय में प्रथम स्थान के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चयन बिहार बाल भवन किलकारी के प्रबंधक रोशन राणा ने इस उपलब्धि पर जानकारी देते हुए बताया कि हाल ही में बेगूसराय में एक विज्ञान मेले का आयोजन किया गया था। इस मेले में विभिन्न जिलों के कई शानदार मॉडल्स के बीच दिव्या और सोनम की इस परियोजना ने पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद इस प्रोजेक्ट का चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए हुआ। देश भर के मॉडल्स के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा में इस किट ने शीर्ष 30 में अपनी मजबूत जगह बनाई। महज 1500 रुपये की लागत से तैयार इस प्रोजेक्ट की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना होने से पूर्णिया जिले और पूरे संस्थान में खुशी का माहौल है। इसका आप पर असर यह नवाचार ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन को बेहद कम खर्च में सुलभ बनाने की राह दिखाता है। • भारत में: कम लागत वाले ऐसे मॉडल देश भर के सरकारी स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में मेंस्ट्रुअल वेस्ट मैनेजमेंट और स्वच्छता की कमी को दूर करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे बालिकाओं में स्कूल छोड़ने की दर कम करने और स्वच्छता संबंधी बीमारियों से बचाव में मदद मिलेगी। • पूर्णिया और बिहार में: स्थानीय स्तर पर बाल भवन किलकारी जैसी संस्थाओं के माध्यम से छात्रों को नवाचार के लिए प्रोत्साहन मिलने से अन्य सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी विज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। यह मॉडल राज्य के अन्य विद्यालयों में सहेली कक्ष जैसी व्यवस्था स्थापित करने का आधार बन सकता है। • पर्यावरण पर प्रभाव: खुले में सैनिटरी पैड फेंकने से होने वाले प्लास्टिक कचरे और मिट्टी के प्रदूषण को कंपोस्टिंग तकनीक के जरिए रोका जा सकता है। इससे स्थानीय नगर निकायों पर कचरा निस्तारण का दबाव काफी हद तक घटेगा। • सामाजिक सोच में बदलाव: स्कूल स्तर पर ही किशोरियों द्वारा इस विषय पर खुलकर प्रोजेक्ट तैयार करने से समाज में मासिक धर्म को लेकर फैली झिझक और कुरीतियां टूटने लगेंगी। परिवार और समाज में माहवारी स्वास्थ्य को लेकर सकारात्मक चर्चा की शुरुआत होगी। ऐसा क्यों हुआ यह पहल ग्रामीण और छोटे शहरों के स्कूलों में मासिक धर्म के दौरान छात्राओं के सामने आने वाली असुविधाओं और कचरा निस्तारण के अभाव को देखकर शुरू हुई। • सीधे अनुभव से उपजी सोच: आरक्षी मध्य विद्यालय की छात्राओं दिव्या और सोनम ने खुद अपने विद्यालय और आसपास की लड़कियों को माहवारी के समय होने वाली असुविधा और झिझक को करीब से देखा था। इसी जमीनी परेशानी का स्थायी और तकनीकी हल तलाशने के लिए उन्होंने यह प्रोजेक्ट शुरू किया। • कचरा प्रबंधन का गंभीर संकट: ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड्स को नष्ट करने की कोई वैज्ञानिक व्यवस्था न होने से पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा था। छात्राओं ने कचरे के वैज्ञानिक निपटान और कंपोस्टिंग को मॉडल का मुख्य हिस्सा बनाया। • निशुल्क मार्गदर्शन और मंच: बिहार बाल भवन किलकारी में क्राफ्ट और साइंस के निशुल्क प्रशिक्षण और शिक्षक मोहम्मद सद्दाम के मार्गदर्शन ने छात्राओं को अपनी सोच को मॉडल में बदलने का अवसर दिया। तीन महीने के निरंतर अभ्यास से यह मॉडल तैयार हो पाया। सवाल-जवाब 1. पूर्णिया की छात्राओं द्वारा बनाए गए इस मॉडल का क्या नाम है? इस मॉडल का नाम एआई एंड आईओटी बेस्ड स्मार्ट मेंस्ट्रुअल हेल्थ एंड हाइजीन मॉनिटरिंग किट रखा गया है। 2. इस प्रोजेक्ट को तैयार करने में कितनी लागत और समय लगा? इस प्रोजेक्ट को तैयार करने में महज 1500 रुपये की लागत और तीन महीने का समय लगा है। 3. इस मॉडल को बनाने वाली छात्राएं किस स्कूल से हैं? इस मॉडल को बनाने वाली दिव्या कुमारी और सोनम कुमारी पूर्णिया के आरक्षी मध्य विद्यालय की छात्राएं हैं। 4. इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय स्तर पर क्या उपलब्धि मिली है? बेगूसराय विज्ञान मेले में पहला स्थान पाने के बाद इस प्रोजेक्ट ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में शीर्ष 30 में स्थान बनाया है। 5. मॉडल में सैनिटरी पैड्स के निपटान के लिए क्या व्यवस्था है? प्रोजेक्ट में इस्तेमाल किए गए पैड्स के सुरक्षित वैज्ञानिक निपटान और उनके कंपोस्टिंग की व्यवस्था की गई है। 6. छात्राओं को इस प्रोजेक्ट के निर्माण में किसका मार्गदर्शन मिला? छात्राओं को बिहार बाल भवन किलकारी में शिक्षक मोहम्मद सद्दाम और प्रबंधक रोशन राणा का मार्गदर्शन मिला। प्रेरणा और सबक पूर्णिया की इन दो साधारण छात्राओं की यात्रा साबित करती है कि इरादा मजबूत हो तो सीमित बजट में भी बड़ी सामाजिक समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। • समस्या को अवसर में बदलना: जिस विषय पर समाज बात करने से कतराता है, उन छात्राओं ने उसी विषय को अपनी रचनात्मकता और विज्ञान का केंद्र बनाया। • सीमित संसाधनों में कमाल: महज 1500 रुपये की छोटी पूंजी के साथ आधुनिक एआई और आईओटी तकनीक का इस्तेमाल करके यह दिखाया कि नवाचार के लिए बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। • लगन और निरंतरता: स्कूल के बाद तीन महीने तक लगातार मेहनत करना दर्शाता है कि धैर्य और निरंतर प्रयास से राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है। • सामाजिक सरोकार: केवल विज्ञान मेला जीतने के बजाय उन्होंने महिलाओं के स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे दोहरे सामाजिक मुद्दों को एक साथ हल करने की मिसाल पेश की। https://trendkia.com/success-stories/purnia-ki-do-skuli-chhatraon-ne-banaya-1500-rupaye-men-masika-dharma-svasthya-nigarani-modala-rashtriya-mncha-para-banai-jagaha-57872 TrendKia — Har trend, sabse pehle.