रामपुर के किसान रघुवीर ने खेत पर लगाया मेंथा डिस्टिलेशन प्लांट, बन गया पड़ोसी किसानों की भी कमाई का जरिया रामपुर के किसान रघुवीर ने करीब 9 साल पहले डेढ़ लाख रुपये में मेंथा ऑयल डिस्टिलेशन प्लांट लगाया, जो अब उन्हें और आसपास के गांवों के किसानों को सीधे प्रोसेसिंग की सुविधा देने के साथ अलग कमाई का जरिया भी बन गया है। रामपुर में मेंथा की खेती किसानों की आजीविका का बड़ा हिस्सा है, लेकिन फसल कटने के बाद उसका तेल निकलवाना हमेशा एक बड़ी परेशानी रही है। दूर-दराज के प्रोसेसिंग सेंटर तक फसल ले जाने में समय और पैसे दोनों बर्बाद होते थे। किसान रघुवीर ने इसी समस्या का एक व्यावहारिक हल निकाला और करीब 9 साल पहले अपने खेत के पास ही मेंथा ऑयल डिस्टिलेशन प्लांट लगा लिया। उस वक्त मशीन लगाने में करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए थे। आज वही निवेश न सिर्फ उनकी खेती को आसान बना रहा है, बल्कि आसपास के कई गांवों के किसानों के लिए भी एक सामुदायिक सुविधा बन चुका है। दो दशकों की मेंथा खेती की राह रघुवीर करीब 20 साल से मेंथा उगाते आ रहे हैं। शुरुआती दिनों में फसल तैयार होने पर तेल निकलवाने के लिए दूसरी जगह जाना पड़ता था। वाहन भाड़ा अलग, इंतजार अलग और कई बार लंबी कतार भी झेलनी पड़ती थी। इन सब खर्चों के बाद खेती के मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा वैसे ही निकल जाता था। इसीलिए रघुवीर ने तय किया कि अपनी जमीन पर ही प्रोसेसिंग की व्यवस्था की जाए और उन्होंने डिस्टिलेशन प्लांट लगाने का फैसला किया। गांव-गांव के किसानों का साझा प्रोसेसिंग केंद्र अब रघुवीर का यह प्लांट सिर्फ उनके अपने काम का नहीं रहा। आसपास के तमाम गांवों के किसान अपनी मेंथा की फसल सीधे यहां लेकर आते हैं और वहीं तेल निकलवा लेते हैं। इससे उन्हें कहीं और नहीं जाना पड़ता और ढुलाई का खर्च भी बचता है। प्रति किलो तेल निकलवाने पर रघुवीर करीब 150 रुपये की प्रोसेसिंग फीस लेते हैं। इस तरह खेती के साथ-साथ एक अलग आमदनी का स्रोत भी बन गया है। पहले जहां उन्हें खुद यह खर्च उठाना पड़ता था, वहीं आज वही मशीन उनके लिए कमाई का जरिया बन चुकी है। सीजन में 17 से 18 क्विंटल तेल का उत्पादन मेंथा की कटाई के बाद फसल को एक-दो दिन हल्का सुखाया जाता है। इसके बाद सूखी हुई फसल को डिस्टिलेशन टैंक में भरा जाता है। पानी गर्म करके भाप तैयार की जाती है, जो पत्तियों के बीच से गुजरती है। यह भाप तेल को साथ लेकर पाइप के जरिए कंडेंसर तक पहुंचती है, जहां ठंडा होने पर तेल और पानी अलग हो जाते हैं और शुद्ध मेंथा तेल इकट्ठा हो जाता है। साल में दो से तीन बार मेंथा की फसल तैयार होती है और हर सीजन में प्लांट करीब एक महीने तक लगातार चलता है। एक सीजन में रघुवीर की यूनिट से कुल मिलाकर करीब 17 से 18 क्विंटल तेल निकलता है। डिस्टिलेशन का अवशेष भी नहीं जाता बेकार तेल निकल जाने के बाद टैंक में जो सूखी पत्तियां और अवशेष बचते हैं, वे भी पूरी तरह बेकार नहीं होते। रघुवीर इस कचरे को खेत में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिससे बाहर से खाद खरीदने का खर्च कम हो जाता है। कुछ किसान इसी अवशेष को ईंधन की तरह प्रयोग में लाते हैं। कभी-कभी यह बचा हुआ माल बेचा भी जाता है, जिससे थोड़ी अतिरिक्त कमाई हो जाती है। मेंथा उत्पादक किसानों के लिए एक मिसाल रघुवीर का मानना है कि जहां भी मेंथा की खेती होती है, वहां के किसानों के लिए इस तरह का प्लांट बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। खेत पर ही प्रोसेसिंग की सुविधा होने से किसान को बार-बार दूसरी जगह नहीं जाना पड़ता और फसल सीधे प्रोसेस हो जाती है। यही कारण है कि आज रघुवीर के गांव के ज्यादातर किसान अपनी मेंथा फसल का तेल उन्हीं की मशीन में निकलवाते हैं। इसका आप पर असर • भारत में: मेंथा उत्पादक किसान अगर अपने इलाके में खुद डिस्टिलेशन प्लांट लगाएं तो ढुलाई और प्रोसेसिंग पर होने वाले खर्च में कटौती कर मुनाफा बढ़ा सकते हैं और दूसरे किसानों को सेवा देकर अतिरिक्त आय भी कमा सकते हैं। • रामपुर में: स्थानीय किसानों को अब तेल निकलवाने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता, जिससे हर कटाई सीजन में समय और ढुलाई का पैसा दोनों बचते हैं। सवाल-जवाब 1. रघुवीर ने डिस्टिलेशन प्लांट कब लगाया और उसकी लागत कितनी थी? उन्होंने करीब 9 साल पहले यह प्लांट लगाया था और उस समय इसकी लागत करीब डेढ़ लाख रुपये आई थी। 2. वे दूसरे किसानों से प्रोसेसिंग के लिए कितना शुल्क लेते हैं? रघुवीर प्रति किलो तेल निकालने पर करीब 150 रुपये की प्रोसेसिंग फीस लेते हैं। 3. एक सीजन में उनकी यूनिट से कितना मेंथा तेल निकलता है? एक सीजन में उनकी यूनिट से करीब 17 से 18 क्विंटल मेंथा तेल निकलता है। 4. साल में कितनी बार मेंथा की फसल तैयार होती है? साल में दो से तीन बार मेंथा की फसल होती है और हर बार प्लांट करीब एक महीने तक लगातार चलता है। 5. डिस्टिलेशन के बाद बचे अवशेष का क्या उपयोग होता है? बचे हुए सूखे पत्ते और अवशेष को खेत में जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, कुछ लोग इसे ईंधन की तरह प्रयोग करते हैं या बेच देते हैं। 6. मेंथा तेल निकालने की प्रक्रिया क्या है? कटाई के बाद फसल को 1-2 दिन सुखाया जाता है, फिर डिस्टिलेशन टैंक में डालकर भाप से तेल निकाला जाता है और कंडेंसर में तेल व पानी अलग होकर शुद्ध तेल मिलता है। 7. रघुवीर कितने सालों से मेंथा की खेती कर रहे हैं? वे करीब 20 साल से मेंथा की खेती करते आ रहे हैं। प्रेरणा और सबक रघुवीर की कहानी यह बताती है कि एक किसान अपनी रोजमर्रा की परेशानी को पहचान कर उसका स्थायी समाधान खुद निकाल सकता है और उसी से दूसरों की भी मदद कर सकता है। • समस्या की जड़ पहचानें: रघुवीर ने समझा कि ढुलाई और प्रोसेसिंग का खर्च ही उनके मुनाफे को लगातार कम कर रहा है और उसी समस्या पर अपनी ऊर्जा लगाई। • एकमुश्त निवेश करें, बार-बार का खर्च बचाएं: डेढ़ लाख रुपये की शुरुआती लागत ने आगे चलकर कई गुना बचत और अतिरिक्त कमाई का रास्ता खोला। • समुदाय के साथ बढ़ें: अपनी मशीन आसपास के किसानों के लिए भी खोलकर रघुवीर ने पूरे इलाके का भरोसा जीता और प्रोसेसिंग फीस के रूप में अलग आमदनी भी कमाई। • बेकार को भी उपयोगी बनाएं: डिस्टिलेशन का अवशेष खाद, ईंधन या बिक्री के काम आता है, यानी पूरी प्रक्रिया में कुछ भी बर्बाद नहीं जाता। https://trendkia.com/success-stories/rampur-ke-kisana-raghuveer-ne-kheta-para-lagaya-mentha-distillation-plant-bana-gaya-parosi-kisanon-ki-bhi-kamai-ka-jariya-2296 TrendKia — Har trend, sabse pehle.