{
  "type": "article",
  "title": "रांची के सूरज डोकरा कला से हर महीने कमा रहे 50 हजार रुपये, जानिए प्राचीन आदिवासी शिल्प की खासियत",
  "summary": "रांची के सूरज डोकरा अपनी पारंपरिक आदिवासी कला के दम पर हर महीने 50 हजार रुपये से ज्यादा की कमाई कर रहे हैं। उनकी बनाई लकड़ी और पीतल की मूर्तियों को देश-विदेश में भारी पसंद किया जा रहा है।",
  "content": "झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले सूरज डोकरा अपनी अनूठी कला और हुनर के बलबूते आत्मनिर्भरता की एक बेहतरीन मिसाल कायम कर रहे हैं। प्राचीन आदिवासी शिल्प शैली में मूर्तियां और कलाकृतियां तैयार करने वाले सूरज इस पारंपरिक कार्य के जरिए हर महीने 50 हजार रुपये से अधिक की शानदार कमाई कर रहे हैं। उनकी इस कला की गूंज अब स्थानीय बाजारों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है, जहां लोग उनके हाथ के बने शिल्पों को खरीदने के लिए खासे उत्सुक रहते हैं।\n\n \n\nप्राकृतिक सामग्रियों और ऑर्गेनिक रंगों का अनूठा मेल\n\nसूरज अपनी कलाकृतियों को बनाने के लिए पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों का ही उपयोग करते हैं। वे अपनी शिल्पकारी के लिए जरूरी लकड़ी जंगलों के साथ-साथ अपने घर के आसपास के पेड़ों से प्राप्त करते हैं। इन लकड़ियों पर उनकी नक्काशी इतनी सजीव होती है कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। उन्होंने विशेष रूप से भगवान जगन्नाथ की बेहद जीवंत और आकर्षक लकड़ी की मूर्तियां गढ़ी हैं, जिन्हें देखकर हर कोई उनकी कारीगरी की तारीफ किए बिना नहीं रहता। इन मूर्तियों को रंगने के लिए किसी केमिकल या कृत्रिम रंग का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि फल-सब्जियों से तैयार ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग होता है। लकड़ी से बनी भगवान जगन्नाथ की इन मूर्तियों की कीमत करीब 500 रुपये से शुरू होती है और बाजार में इनकी मांग हमेशा बनी रहती है। लोग विशेष ऑर्डर देकर भी इन मूर्तियों को तैयार करवाते हैं।\n\n \n\nपीतल के शिल्प और प्राचीन मोम ढलाई तकनीक\n\nलकड़ी के अलावा सूरज पीतल धातु से भी कई तरह की मनमोहक मूर्तियां बनाते हैं। उनके हाथों बने पीतल के कछुए, खरगोश और विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं अपनी खूबसूरती के कारण लोगों को तुरंत आकर्षित करती हैं। इन सभी कलाकृतियों को बनाने के पीछे एक बेहद प्राचीन और जटिल तकनीक जुड़ी हुई है, जिसे लॉस्ट-वैक्स या मोम ढलाई प्रक्रिया कहा जाता है। इस पारंपरिक विधि में सबसे पहले मोम से आकृति या स्टैच्यू तैयार किया जाता है। इसके बाद उस सांचे के भीतर पिघला हुआ तांबा डाला जाता है। धातु के ठंडा होने और सूखने के बाद ऊपर के मोम को हटा दिया जाता है, जिससे मूल मूर्ति बाहर निकलती है। इस प्राचीन पद्धति का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता यानी हड़प्पा काल से जुड़ा हुआ है। उसी ऐतिहासिक शैली का आज भी पालन करने के कारण सूरज की कलाकृतियों की बनावट और फिनिशिंग पूरी तरह अद्वितीय होती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग उनके स्टॉल पर पहुंचते हैं।\n\n \n\nदेशभर में प्रदर्शनियां और विदेशी खरीदार\n\nसूरज ने अपनी इस कला का दायरा सिर्फ अपने शहर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दिल्ली सहित देश के कई प्रमुख शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में अपने स्टॉल लगाए। इन आयोजनों में भारत आने वाले विदेशी मेहमानों और पर्यटकों ने भी उनकी कला की जमकर सराहना की है और दिल खोलकर खरीदारी की है। बाजार में इस खास शैली के कलाकारों की संख्या बेहद कम होने के कारण सूरज की कलाकृतियां अपनी एक अलग पहचान रखती हैं। अब देश के बड़े व्यापारिक उद्यमी और विदेशी ग्राहक भी उनके नियमित ग्राहकों में शामिल हो चुके हैं, जो अपने घरों और दफ्तरों को सजाने के लिए इन नायाब कलाकृतियों को खरीदते हैं।\n\n \n\nसंस्कृति के संरक्षण का माध्यम\n\nसूरज का यह काम सिर्फ उनके लिए आजीविका का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह लुप्त होती प्राचीन आदिवासी कला को पुनर्जीवित करने और भारतीय संस्कृति को सहेजने का एक बड़ा जरिया भी बन चुका है। आधुनिक दौर में जब लोग अपनी पारंपरिक जड़ों से दूर हो रहे हैं, तब इस तरह का आदिवासी शिल्प न केवल सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रख रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी कला से जुड़ने की प्रेरणा भी दे रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सूरज डोकरा हर महीने कितनी कमाई करते हैं?\nसूरज डोकरा अपनी इस प्राचीन आदिवासी कला के माध्यम से हर महीने 50 हजार रुपये से अधिक की कमाई कर रहे हैं।\n\n2. सूरज मुख्य रूप से किस तरह की कलाकृतियां बनाते हैं?\nवे लकड़ी से भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां और पीतल से कछुआ, खरगोश तथा विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते हैं।\n\n3. इन मूर्तियों को रंगने के लिए किस रंग का उपयोग किया जाता है?\nइन मूर्तियों में फलों और सब्जियों के रंगों से तैयार किए गए ऑर्गेनिक पेंट का इस्तेमाल किया जाता है।\n\n4. मूर्तियां बनाने के लिए किस प्राचीन तकनीक का उपयोग होता है?\nवे हड़प्पा सभ्यता के समय की मोम ढलाई (लॉस्ट-वैक्स) तकनीक का उपयोग करते हैं जिसमें पिघले तांबे को मोम के सांचे में डाला जाता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nसूरज डोकरा की यात्रा से सीखने योग्य मुख्य बातें:\n\n• पारंपरिक कौशल को पहचानना: अपनी स्थानीय संस्कृति और प्राचीन कला को सहेजकर उसे आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप ढालना सफलता की कुंजी बन सकता है।\n• पर्यावरण के अनुकूल दृष्टिकोण: जंगलों की लकड़ी और फल-सब्जियों के ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग करके कम लागत में बेहतरीन और टिकाऊ उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।\n• ऐतिहासिक पद्धतियों का महत्व: हड़प्पा काल की मोम ढलाई जैसी प्राचीन तकनीकों को अपनाकर अपने काम को बाजार में पूरी तरह अनोखा और प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।\n• विस्तृत पहुंच बनाना: स्थानीय स्तर के काम को दिल्ली जैसी बड़ी प्रदर्शनियों तक ले जाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक अपनी पहुंच स्थापित की जा सकती है।",
  "url": "https://trendkia.com/success-stories/ranchi-ke-suraj-dokra-kala-se-50-thousand-rupee-kamai-21418",
  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-08-24",
  "tags": [
    "सूरज डोकरा",
    "आदिवासी कला",
    "रांची समाचार",
    "हस्तशिल्प",
    "डोकरा क्राफ्ट",
    "झारखंड आर्ट"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}