# रिश्वत की जगह गाय खरीदने वाले शिवहर के आलोक आज बने डेयरी किसान की मिसाल

> शिवहर जिले के किसान आलोक कुमार सिंह ने झूठे मुकदमे में रिश्वत देने से इनकार कर एक गाय खरीदी और उसी की कमाई से मुकदमा लड़कर जीत हासिल की, आज उनके पास 7-8 गायें हैं और डेयरी व्यवसाय उनकी पहचान बन चुका है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-07-05 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/rishvata-ki-jagaha-gaya-kharidane-vale-shivhar-ke-alok-aja-bane-deyari-kisana-ki-misala-4924 · **Language:** Hindi
**Tags:** डेयरी व्यवसाय, शिवहर किसान, गाय पालन, एनडीआरआई करनाल, सक्सेस स्टोरी, स्वरोजगार

शिवहर जिले के किसान आलोक कुमार सिंह की कहानी बताती है कि रिश्वत के आगे झुकने के बजाय मेहनत का रास्ता चुनने वाला इंसान अपनी किस्मत खुद बदल सकता है। करीब दो दशक पहले एक झूठे मुकदमे में फंसे आलोक से नाम हटवाने के एवज में 30 हजार रुपये की रिश्वत मांगी गई थी, लेकिन कमजोर आर्थिक हालत के बावजूद उन्होंने यह रकम देने से साफ इनकार कर दिया। आज वही आलोक शिवहर में डेयरी व्यवसाय का जाना-पहचाना चेहरा बन चुके हैं और उनके पास 7-8 गायें हैं, जिनसे होने वाली आमदनी परिवार की आर्थिकी की रीढ़ बन चुकी है।

## रिश्वत मांगी गई तो अभिभावकों ने सुझाई गाय खरीदने की तरकीब
आलोक बताते हैं कि जब मुकदमे से नाम हटवाने के लिए उनसे 30 हजार रुपये मांगे गए, तब घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि यह रकम आसानी से जुटाई जा सके। ऐसे मुश्किल वक्त में उनके अभिभावक ने एक अलग ही सलाह दी, रिश्वत में पैसे बहाने के बजाय एक अच्छी नस्ल की गाय खरीदी जाए और उसके दूध से होने वाली कमाई से ही मुकदमे की लड़ाई लड़ी जाए। यही सलाह आलोक की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई और उन्होंने इसी रास्ते पर चलने का फैसला किया।

## दूध की कमाई से चुकाई वकीलों की फीस, दो साल में मिला इंसाफ
साल 2006 में आलोक ने मारर की मशहूर दुग्ध समिति से लैब अटेंडेंट लक्ष्मण सिंह की मदद से एक एचएफ नस्ल की गाय खरीदी। उस समय उनकी आर्थिक हालत बेहद कमजोर थी, लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए, रिश्वत नहीं देंगे। गाय का दूध बेचकर जो पैसे आते, उन्हीं से वे वकीलों की फीस और मुकदमे का पूरा खर्च चुकाते रहे। करीब दो साल तक चली इस कानूनी लड़ाई में आखिरकार उन्हें इंसाफ मिला और केस खत्म हो गया। आलोक का मानना है कि अगर उस वक्त वे रिश्वत देने का रास्ता चुन लेते, तो शायद आज डेयरी व्यवसाय में मिली यह कामयाबी उनके हिस्से में नहीं आती।

## एक गाय से शुरू हुआ कारवां, अब सात-आठ गायों का डेयरी फार्म
पहली गाय से मिली सफलता ने आलोक का हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे उसी एक गाय से शुरू हुआ यह सिलसिला बढ़ता गया और देखते ही देखते उनके पास 10 गायें हो गईं। फिलहाल उनके पास 7-8 दुधारू गायें हैं, जिनसे रोजाना अच्छी मात्रा में दूध निकलता है और यही व्यवसाय अब परिवार की कमाई का मुख्य जरिया बन चुका है। आलोक हिसाब लगाते हुए बताते हैं कि एक अच्छी दुधारू गाय करीब 300 दिनों तक दूध देती है। अगर रोजाना औसतन 10 लीटर दूध भी मिले, तो इससे होने वाली कमाई किसी भी छोटे किसान के लिए आर्थिक मजबूती की मजबूत नींव बन सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने डेयरी व्यवसाय को अपनी पहचान बना लिया।

## करनाल में प्रशिक्षण लेकर तोड़ीं भ्रांतियां, गांव-गांव फैलाई जागरूकता
आलोक बताते हैं कि पहले गांवों में लोगों के मन में यह डर बैठा था कि गाय पालने में तरह-तरह की दिक्कतें आती हैं और सही देखभाल न हो तो पशु बांझ हो जाते हैं। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल में पांच दिनों का प्रशिक्षण लिया, जहां विशेषज्ञों से उन्होंने पशुओं के संतुलित आहार, फूड सप्लीमेंट, स्वास्थ्य प्रबंधन और वैज्ञानिक डेयरी तकनीकों की बारीकियां सीखीं। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वे गांव-गांव जाकर बैठकें करने लगे, पशुपालकों को सही जानकारी देकर जागरूक किया और कई जगह दुग्ध समितियों के गठन में भी मदद की। उनका कहना है कि सही जानकारी मिलते ही क्षेत्र के लोगों ने बड़े पैमाने पर गाय पालन शुरू किया, जिससे इलाके में दूध उत्पादन में साफ बढ़ोतरी देखी गई।

## ईमानदारी और आत्मनिर्भरता की मिसाल बने आलोक
आलोक कुमार सिंह की यह कहानी बताती है कि सबसे मुश्किल हालात में भी ईमानदारी और धैर्य का रास्ता अपनाकर सफलता पाई जा सकती है। रिश्वत देने के बजाय उन्होंने न्यायालय पर भरोसा रखा और अपनी मेहनत से न सिर्फ कानूनी लड़ाई जीती, बल्कि डेयरी व्यवसाय में भी नई पहचान बनाई। आज वे दूसरे किसानों को वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन करने, पशुओं को संतुलित आहार देने और डेयरी को स्वरोजगार के मजबूत जरिए के तौर पर अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी यह यात्रा साबित करती है कि सही फैसला, मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर सबसे विपरीत हालात को भी सफलता की नई शुरुआत में बदला जा सकता है।

## इसका आप पर असर
- **भारत में:** यह कहानी देशभर के छोटे किसानों को दिखाती है कि रिश्वत देने के बजाय ईमानदार रास्ता चुनकर भी आर्थिक मजबूती और कानूनी लड़ाई, दोनों में जीत हासिल की जा सकती है।
- **शिवहर में:** क्षेत्र के पशुपालकों के बीच गाय पालन को लेकर फैली भ्रांतियां दूर हुई हैं और वैज्ञानिक तरीके अपनाने से इलाके में दूध उत्पादन बढ़ा है, जिससे कई परिवारों की आमदनी में सुधार हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. आलोक कुमार सिंह किस जिले के किसान हैं?
वे बिहार के शिवहर जिले के किसान हैं।

### 2. मुकदमे से नाम हटवाने के लिए उनसे कितनी रिश्वत मांगी गई थी?
उनसे 30 हजार रुपये की रिश्वत मांगी गई थी।

### 3. रिश्वत देने के बजाय आलोक ने क्या किया?
उन्होंने 2006 में मारर की दुग्ध समिति से लक्ष्मण सिंह के जरिए एक एचएफ नस्ल की गाय खरीदी और उसके दूध की कमाई से मुकदमा लड़ा।

### 4. उन्हें मुकदमे में इंसाफ मिलने में कितना समय लगा?
करीब दो साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें इंसाफ मिला।

### 5. आज आलोक के पास कितनी गायें हैं?
फिलहाल उनके पास 7-8 दुधारू गायें हैं, जबकि एक समय उनकी संख्या 10 तक पहुंच गई थी।

### 6. आलोक ने प्रशिक्षण कहां से लिया?
उन्होंने राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल में पांच दिवसीय प्रशिक्षण लिया।

### 7. एक अच्छी दुधारू गाय कितने दिनों तक दूध देती है?
आलोक के मुताबिक एक अच्छी दुधारू गाय करीब 300 दिनों तक दूध देती है।

### 8. प्रशिक्षण लेने के बाद आलोक ने और क्या किया?
उन्होंने गांव-गांव जाकर बैठकें कीं, पशुपालकों को जागरूक किया और दुग्ध समितियों के गठन में मदद की।

## प्रेरणा और सबक
- **ईमानदारी को कभी न छोड़ें:** पैसों की तंगी होने पर भी आलोक ने रिश्वत देने से इनकार किया, जो उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।
- **छोटी शुरुआत को बड़ा बनाएं:** सिर्फ एक गाय से शुरू हुआ सफर धैर्य और मेहनत से 10 गायों तक पहुंच गया।
- **सही सलाह पर भरोसा करें:** अभिभावकों की सलाह मानकर गाय खरीदने का फैसला ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बना।
- **ज्ञान को अपडेट रखें:** एनडीआरआई करनाल से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने वैज्ञानिक तरीके सीखे और पुरानी भ्रांतियों को दूर किया।
- **सफलता को बांटें:** प्रशिक्षण के बाद गांव-गांव जाकर दूसरे किसानों को जागरूक करना और दुग्ध समितियां बनवाना उनकी सोच को और बड़ा बनाता है।

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