सरकारी पद त्यागकर शिक्षक बनने की ठानी, अब गाजीपुर में युवाओं को रसायन विज्ञान सिखा रहे डॉ. राम दुलारे टेक्निकल असिस्टेंट के सरकारी पद पर सात महीने कार्य करने के बाद डॉ. राम दुलारे ने इस्तीफा देकर उच्च शिक्षा का मार्ग चुना और अब वे पीजी कॉलेज गाजीपुर में रसायन विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. अक्सर लोग एक सुरक्षित सरकारी सेवा हासिल करने के बाद अपनी पूरी जिंदगी उसी ढर्रे पर बिता देना पसंद करते हैं, मगर कुछ ऐसे जुनूनी व्यक्तित्व भी होते हैं जो अपने असली सपनों को पूरा करने के लिए बंधे-बंधाए सुरक्षा घेरे को छोड़ने से नहीं हिचकिचाते. ऐसी ही एक प्रेरक यात्रा उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से निकलकर गाजीपुर के पीजी कॉलेज तक पहुंची है, जहां रसायन विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राम दुलारे आज सैकड़ों युवाओं का भविष्य संवार रहे हैं. सरकारी विभाग में टेक्निकल असिस्टेंट की पक्की नौकरी मिलने के बावजूद उन्होंने केवल सात महीने के भीतर त्यागपत्र सौंप दिया था, क्योंकि उनकी दिली ख्वाहिश अध्यापन और अनुसंधान के क्षेत्र में नाम कमाने की थी. मऊ से आरंभिक सफर और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक की राह डॉ. राम दुलारे की शुरुआती स्कूली शिक्षा मऊ जिले में संपन्न हुई. बाल्यकाल से ही उनका रुझान विज्ञान के गूढ़ रहस्यों और विशेष रूप से रसायन विज्ञान की ओर लगातार बना रहा. जब भी वे प्रयोगों या रासायनिक तत्वों के बारे में पढ़ते, उनकी जिज्ञासा और गहरी हो जाती थी. इसी स्वाभाविक लगाव को देखते हुए उन्होंने तय किया कि वे उच्च अध्ययन भी इसी विधा में करेंगे. अपनी कड़ी मेहनत के बूते उन्होंने देश के प्रतिष्ठित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में प्रवेश पाने में कामयाबी हासिल की. वहां उन्होंने रसायन विज्ञान विषय में बीएससी ऑनर्स की डिग्री हासिल की. उस दौर में बीएचयू जैसे नामी संस्थान की दहलीज पर कदम रखना उनके लिए एक असाधारण अवसर था, जिसे वे अपने अथक परिश्रम का सुखद परिणाम मानते हैं. सात महीने की सरकारी सेवा और जीवन का सबसे बड़ा जोखिम जब वे अपनी पढ़ाई के सिलसिले को आगे बढ़ा रहे थे, तभी उनके जीवन में एक नया मोड़ आया. उन्हें सरकारी तंत्र में टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर चयन का अवसर प्राप्त हुआ. पारिवारिक और सामाजिक दृष्टिकोण से यह एक सुरक्षित और सम्मानजनक आजीविका थी, लिहाजा उन्होंने कार्यभार ग्रहण कर लिया. उन्होंने इस पद पर लगभग सात महीने तक निष्ठा से काम भी किया, परंतु उनका मन फाइलों और तकनीकी सहायक की नियमित दिनचर्या में नहीं रमा. उनके अंतर्मन में हमेशा प्रोफेसर बनकर युवा पीढ़ी को ज्ञान बांटने और अकादमिक जगत में गहराई से उतरने की अभिलाषा मचलती रहती थी. अंततः उन्होंने वह कठिन निर्णय लिया जिसे आम लोग दुस्साहस मान सकते थे. उन्होंने सुरक्षित सरकारी नौकरी से किनारा कर लिया और एक बार फिर किताबों की दुनिया में पूरी तरह रम गए. डॉ. राम दुलारे स्वयं इस मोड़ को अपने जीवन का सबसे बड़ा जोखिम करार देते हैं, क्योंकि हाथ में आई सुनिश्चित नौकरी छोड़कर अनिश्चित भविष्य की ओर कदम बढ़ाना आसान नहीं होता. नौकरी छोड़ने के उपरांत उन्होंने एमएससी की पढ़ाई पर पूरा ध्यान केंद्रित किया, जिसके बाद उन्होंने बीएचयू से ही अपनी पीएचडी की उपाधि पूरी की और उच्च शिक्षा के अकादमिक मंच पर कदम रखा. रसायन विज्ञान की उपयोगिता और विद्यार्थियों के लिए करियर की राह अध्यापन के अपने अनुभव के आधार पर डॉ. राम दुलारे का स्पष्ट मानना है कि रसायन विज्ञान कोई ऐसा शुष्क विषय नहीं है जो सिर्फ किताबों के पन्नों या परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं तक सीमित रहे. यह विषय हमारे दैनिक जीवन के प्रत्येक पहलू में प्रत्यक्ष रूप से समाया हुआ है. प्रातकाल से लेकर रात्रि तक हम जिन वस्तुओं, औषधियों, खाद्य सामग्रियों का उपयोग करते हैं या जिन विशाल औद्योगिक कारखानों में विनिर्माण कार्य होते हैं, उन सभी की बुनियादी प्रक्रियाओं में रसायन विज्ञान की ही केंद्रीय भूमिका होती है. उनका कहना है कि विद्यार्थियों को इस विषय को केवल रटने के बजाय व्यावहारिक नजरिए से समझना चाहिए. वे छात्रों को बताते हैं कि रसायन विज्ञान में उच्चतर उपाधि अर्जित करने के बाद रोजगार के कई शानदार रास्ते खुलते हैं. जो विद्यार्थी नेट और जेआरएफ जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षाएं उत्तीर्ण करते हैं, उनके लिए शोध संस्थानों और महाविद्यालयों में अध्यापन के बेहतरीन अवसर सुलभ हो जाते हैं. इसके अतिरिक्त अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, दवा निर्माण कंपनियों, रासायनिक उद्योगों और प्रमुख अनुसंधान केंद्रों में भी योग्य विशेषज्ञों की निरंतर मांग बनी रहती है. बदलते दौर में शिक्षा की चुनौतियां और लक्ष्य के प्रति समर्पण अपने विद्यार्थी जीवन के दिनों को याद करते हुए डॉ. राम दुलारे साझा करते हैं कि उस समय शिक्षा का परिवेश और संसाधन आज की तुलना में बेहद सीमित और कठिन थे. जिस दौर में उन्होंने पढ़ाई की, उस समय कई ग्रामीण अंचलों में केवल हाईस्कूल या इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेना ही पूरे समाज में एक बड़ी उपलब्धि मान लिया जाता था. साधनहीनता और सूचना के अभाव के बीच उच्च शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ना विद्यार्थियों के लिए एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य हुआ करता था. ऐसे विपरीत माहौल में बीएचयू जैसी राष्ट्रीय संस्था तक पहुंचना उनके व्यक्तिगत जीवन का एक बेहद गौरवशाली मुकाम था. वर्तमान में वे गाजीपुर के पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर की जिम्मेदारी संभालते हुए विद्यार्थियों को रसायन विज्ञान का गहरा ज्ञान दे रहे हैं. उनकी पूरी जीवन यात्रा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत में ईमानदारी हो और आगे बढ़ने का धीरज बना रहे, तो सुरक्षित रास्तों से अलग हटकर उठाए गए साहसिक कदम भी जीवन को एक सार्थक मुकाम तक पहुंचा सकते हैं. इसका आप पर असर यह प्रेरक कहानी उन सभी विद्यार्थियों और युवाओं को मार्गदर्शन देती है जो सुरक्षित नौकरी और अपने वास्तविक सपनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहे हैं. • करियर चयन में स्पष्टता: केवल नौकरी की सामाजिक सुरक्षा देखकर संतुष्ट होने के बजाय अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करने का महत्व सामने आता है. छात्र अपने जुनून के अनुकूल क्षेत्र चुनकर अधिक संतुष्टि और दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं. • रसायन विज्ञान के अवसर: इस विषय में उच्च शिक्षा लेने वाले छात्रों के सामने अनुसंधान, अध्यापन और उद्योगों के दरवाजे खुलते हैं. नेट और जेआरएफ जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं उत्तीर्ण करके युवा विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं में आकर्षक पदों तक पहुंच सकते हैं. • कठिन परिस्थितियों में हौसला: सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण या छोटे कस्बों के विद्यार्थियों को इस अनुभव से आगे बढ़ने की हिम्मत मिलती है. विपरीत माहौल में भी नियमित अध्ययन और स्पष्ट लक्ष्य रखकर राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों में प्रवेश संभव है. • अध्ययन का व्यावहारिक दृष्टिकोण: विज्ञान को केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने का माध्यम मानने की मानसिकता में बदलाव की सीख मिलती है. छात्र रोजमर्रा के जीवन, दवाओं और औद्योगिक निर्माण में विषय की प्रासंगिकता को समझकर अपनी तैयारी को मजबूत बना सकते हैं. ऐसा क्यों हुआ डॉ. राम दुलारे द्वारा एक सुरक्षित सरकारी पद छोड़ने और पुनः उच्च शिक्षा की ओर लौटने का मुख्य कारण उनका अध्यापन के प्रति गहरा लगाव और अकादमिक महत्वाकांक्षा थी. • स्वाभाविक रुचि का अभाव: टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर लगभग सात महीने तक कार्य करने के दौरान उन्होंने पाया कि उनका मन उस तकनीकी कार्य में नहीं रम रहा है. वे अपनी रचनात्मक ऊर्जा को उस सेवा में पूरी तरह उपयोग नहीं कर पा रहे थे. • अध्यापन और शोध का लक्ष्य: बचपन से ही रसायन विज्ञान के प्रति उनके मन में गहरा प्रेम था और वे कॉलेज या विश्वविद्यालय स्तर पर प्रोफेसर बनने का सपना देख रहे थे. इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए आगे की डिग्रियां प्राप्त करना आवश्यक था. • उच्चतर उपाधियों की आवश्यकता: प्रोफेसर बनने के लिए एमएससी और पीएचडी जैसी उच्चतम शैक्षिक योग्यताओं को पूरा करना अनिवार्य था. इसलिए उन्होंने अपनी नौकरी त्यागकर पूर्णकालिक अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करने का बड़ा कदम उठाया. सवाल-जवाब 1. डॉ. राम दुलारे वर्तमान में किस पद पर और कहां कार्यरत हैं? डॉ. राम दुलारे गाजीपुर के पीजी कॉलेज में रसायन विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. 2. उन्होंने कौन सी सरकारी नौकरी छोड़कर उच्च शिक्षा का रास्ता चुना था? उन्होंने टेक्निकल असिस्टेंट के पद पर मिली सरकारी नौकरी में लगभग सात महीने काम करने के बाद इस्तीफा दिया था. 3. डॉ. राम दुलारे ने अपनी स्कूली और उच्च शिक्षा कहां से पूरी की? उनकी शुरुआती स्कूली पढ़ाई मऊ में हुई और इसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बीएससी ऑनर्स और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की. 4. डॉ. राम दुलारे के अनुसार रसायन विज्ञान में उच्च शिक्षा के बाद क्या संभावनाएं हैं? उनके अनुसार छात्र नेट और जेआरएफ उत्तीर्ण कर अध्यापन और शोध में जा सकते हैं, साथ ही औद्योगिक इकाइयों, फार्मा कंपनियों और प्रयोगशालाओं में भी अवसर पा सकते हैं. प्रेरणा और सबक डॉ. राम दुलारे की जीवन यात्रा से ऐसे व्यावहारिक सूत्र मिलते हैं जिन्हें अपनाकर कोई भी युवा अपने करियर को नई ऊंचाई दे सकता है. • सपनों के लिए परिकलित जोखिम लें: यदि वर्तमान कार्यक्षेत्र में मन नहीं लग रहा है, तो सुरक्षित दायरे से बाहर निकलने का साहस जुटाना आवश्यक है. अपने सच्चे लक्ष्य के लिए उठाया गया सोचा-समझा कदम भविष्य में बड़ी सफलता का आधार बनता है. • विषय के प्रति व्यावहारिक दृष्टि रखें: किसी भी विधा या विज्ञान को केवल परीक्षा पास करने का साधन न बनाएं. जब आप पढ़ाई को रोजमर्रा की जिंदगी और उसके उपयोग से जोड़कर देखते हैं, तो समझ और सीखने की गति कई गुना बढ़ जाती है. • प्रतिकूलता में धैर्य बनाए रखें: सीमित साधनों और कठिन पारिवारिक या क्षेत्रीय परिस्थितियों के बावजूद अपने संकल्प से पीछे नहीं हटना चाहिए. निरंतर परिश्रम और धैर्य से बड़े से बड़े शैक्षणिक संस्थान की मंजिल हासिल की जा सकती है. https://trendkia.com/success-stories/sarakari-pada-tyagakara-shikshaka-banane-ki-thani-aba-ghazipur-men-yuvaon-ko-rasayana-vijnana-sikha-rahe-dr-ram-dulare-56219 TrendKia — Har trend, sabse pehle.