# सरगुजा की किरण यादव ने स्वच्छता दीदी से खेती तक तय किया सफर, दो एकड़ में की आलू की फसल

> छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्वच्छता अभियान से जुड़ी किरण यादव ने बचत के पैसों से दो एकड़ में आलू की खेती शुरू की है और समाज सेवा के साथ कृषि में नई पहचान बना रही हैं।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-08-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/saurguja-ki-kiran-yadav-moves-from-sanitation-worker-to-farming-21001 · **Language:** Hindi
**Tags:** किरण यादव, सरगुजा, छत्तीसगढ़, स्वच्छता दीदी, आलू की खेती, जैविक खेती, स्वयं सहायता समूह

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की ग्रामीण महिलाएं अब आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल पेश कर रही हैं। इसी कड़ी में स्वच्छता अभियान से जुड़ी किरण यादव ने अपनी मेहनत और लगन से एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने स्वच्छता दीदी के रूप में अपनी शुरुआत की थी और अब अभियान से होने वाली बचत का उपयोग खेती-किसानी सीखने के लिए कर रही हैं। उनका यह सफर इस बात का प्रमाण है कि महिलाओं में कुछ नया सीखने और आगे बढ़ने का जज्बा हो, तो वे हर क्षेत्र में अपनी जगह बना सकती हैं।

किरण यादव उन्नति स्वयं सहायता समूह के माध्यम से स्वच्छता अभियान में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा वह विभिन्न एनजीओ और समाज सेवा के कामों में भी अपना योगदान देती रही हैं। समूह से मिलने वाली बचत की रकम को उन्होंने यों ही खर्च करने के बजाय एक रचनात्मक दिशा देने का निर्णय लिया। उनके मन में कृषि कार्यों को बारीकी से समझने की इच्छा थी, जिसके चलते उन्होंने पहली बार खेती की दुनिया में कदम रखा और आलू उगाने का फैसला किया।

## दो एकड़ जमीन पर आलू की पहली फसल
अपने इस नए कृषि प्रयोग के तहत किरण यादव ने इस साल लगभग दो एकड़ जमीन पर आलू की बुवाई की है। इस पूरे कृषि कार्य में उनकी कुल लागत करीब 50 से 60 हजार रुपये आई है। हालांकि, अभी फसल पूरी तरह तैयार होने में कुछ वक्त बाकी है और इस बीच कीटों के प्रकोप के कारण कुछ पौधों को नुकसान भी पहुंच रहा है। फसल में आए इस शुरुआती संकट के चलते फिलहाल यह अनुमान लगाना कठिन है कि इस बार उन्हें कितना मुनाफा मिल पाएगा।

## कीट नियंत्रण के लिए जैविक जीवामृत का सहारा
आलू की फसल में कीटों के हमले को देखकर किरण की चिंता थोड़ी जरूर बढ़ी है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी है। फसल को इन कीटों से बचाने के लिए वह पारंपरिक और प्राकृतिक विधि यानी जीवामृत का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही हैं। इससे पहले भी उन्होंने मिर्च की खेती के दौरान जीवामृत का प्रयोग किया था, जिसके उन्हें काफी सकारात्मक और बेहतर परिणाम देखने को मिले थे।

किरण ने एक स्थानीय एनजीओ के जरिए जीवामृत तैयार करने की विशेष ट्रेनिंग ली थी। अब वह इसे बाजार से खरीदने के बजाय अपने घर पर ही खुद तैयार करती हैं। इस प्राकृतिक घोल को बनाने के लिए गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन जैसी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। मिर्च की फसल में इसके अच्छे असर को देखते हुए उन्हें पूरी उम्मीद है कि आलू की फसल को भी कीटों के प्रकोप से बचाने में यह नुस्खा मददगार साबित होगा। उनका मुख्य उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि खेती के हर पहलू को गहराई से सीखना और समझना है।

## इसका आप पर असर
**छत्तीसगढ़ में:** सरगुजा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को स्वरोजगार और खेती की नई तकनीक अपनाने की प्रेरणा मिलती है।

**भारत में:** स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए बचत के पैसों को कृषि और अन्य उत्पादक कार्यों में निवेश करने का एक सकारात्मक उदाहरण सामने आता है।

## सवाल-जवाब

### 1. किरण यादव मूल रूप से किस जिले की रहने वाली हैं?
किरण यादव छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की रहने वाली हैं।

### 2. किरण ने पहली बार कुल कितने क्षेत्रफल में आलू की खेती की है?
उन्होंने इस साल पहली बार लगभग दो एकड़ जमीन में आलू की खेती की है।

### 3. आलू की फसल उगाने में लगभग कितनी लागत आई है?
इस आलू की खेती में करीब 50 से 60 हजार रुपये की लागत आई है।

### 4. फसल को कीटों से बचाने के लिए किरण किस चीज़ का उपयोग कर रही हैं?
वह कीटों के प्रकोप से निपटने के लिए घर पर बने जैविक जीवामृत का उपयोग करने की तैयारी कर रही हैं।

### 5. जीवामृत बनाने के लिए किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है?
इसे तैयार करने में गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन जैसी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है।

## प्रेरणा और सबक
**12वीं के बाद कार्यशीलता:** पढ़ाई पूरी करने के बाद समाज सेवा और स्वच्छता अभियान से जुड़कर अपने पैरों पर खड़े होने की शुरुआत करना।

**बचत का सही इस्तेमाल:** स्वयं सहायता समूह से मिलने वाली बचत की रकम को निष्क्रिय रखने के बजाय कृषि और नए कौशल सीखने में लगाना।

**चुनौतियों से सीखना:** फसल में कीटों का प्रकोप आने पर घबराने के बजाय एनजीओ से ली गई ट्रेनिंग के आधार पर जैविक जीवामृत जैसे प्राकृतिक उपाय अपनाना।

**सीखने की ललक:** केवल पैसे कमाने की सोच रखने के बजाय किसी नए क्षेत्र में उतरकर उसे व्यावहारिक रूप से सीखने का जज्बा रखना।

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