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  "type": "article",
  "title": "इंजीनियरिंग के बाद पैर में उभरा कैंसरयुक्त ट्यूमर, कृत्रिम अंग के सहारे पटना में शिक्षिका बनीं शम्मी सिंह",
  "summary": "कॉलेज पूरा होते ही पैर में ट्यूमर का पता चलने और अंग कटने के बाद शम्मी सिंह ने हार नहीं मानी। निशुल्क प्रोस्थेटिक पैर की मदद से वह अब दिल्ली पब्लिक स्कूल में बच्चों को विज्ञान पढ़ा रही हैं।",
  "content": "इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब एक युवा पेशेवर अपनी करियर की नई शुरुआत करने का सपना देख रहा होता है, तब जीवन की एक अप्रत्याशित चुनौती सब कुछ बदल सकती है। पटना की शम्मी सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कॉलेज की पढ़ाई खत्म करते ही उन्हें पैर में ट्यूमर का पता चला। लगातार इलाज और ऑपरेशनों के बावजूद बीमारी दोबारा लौट आई, जिसके चलते डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए पैर काटने का कठोर कदम उठाना पड़ा। इस भारी संकट के बाद भी उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया और कृत्रिम पैर के सहारे आज एक निजी स्कूल में सक्रिय शिक्षिका के रूप में नई मिसाल पेश कर रही हैं।\n\nसाल 2020 में सामने आया गंभीर ट्यूमर का संकट\nशम्मी सिंह का जीवन उस वक्त पूरी तरह बदल गया जब साल 2020 में वैश्विक कोरोना महामारी के दौर में वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर घर लौटी थीं। उसी समय उनके पैर में एक गांठ या ट्यूमर का पता चला। परिजनों और डॉक्टरों ने तत्काल इलाज शुरू किया, लेकिन स्थिति में सुधार होने के बजाय ट्यूमर की स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई। बीमारी की गंभीरता को देखते हुए जनवरी 2021 में उनका पहला ऑपरेशन कराया गया। दुर्भाग्य से यह सर्जरी पूरी तरह सफल नहीं रही और कुछ समय बाद संक्रमण और गांठ का प्रभाव फिर से बढ़ने लगा।\n\nसाल 2022 में वही ट्यूमर दोबारा उसी जगह पर उभर आया। गहन चिकित्सकीय जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह ट्यूमर कैंसरयुक्त था। चूंकि यह बार-बार लौट रहा था और शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ था, इसलिए डॉक्टरों ने आगे की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रभावित पैर को काटने का निर्णायक फैसला लिया। आखिरकार 2 जुलाई 2022 को शम्मी का वह पैर सर्जरी के जरिए शरीर से अलग कर दिया गया। एक होनहार इंजीनियर के लिए यह बेहद दर्दनाक मोड़ था, लेकिन उन्होंने खुद को एक एम्प्यूटी के तौर पर स्वीकार करते हुए नई जिंदगी के लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया।\n\nरिकवरी का कठिन सफर और निशुल्क कृत्रिम अंग की मदद\nसर्जरी के बाद का समय किसी भी व्यक्ति के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। शम्मी ने अपने ऑपरेशन के बाद करीब एक पूरा साल रिकवरी और घाव भरने की प्रक्रिया में बिताया। यह एक ऐसा दौर था जब हताशा, अनिश्चितता और अवसाद सामने आकर खड़े हो गए थे, मगर उन्होंने कभी अपनी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। इसी कठिन समय में उन्हें एक ऐसी सामाजिक संस्था की जानकारी मिली, जो शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को दोबारा पैरों पर खड़ा करने के लिए आधुनिक चिकित्सा सेवाएं मुहैया कराती है।\n\nशम्मी 17 अप्रैल 2023 को पहली बार पटना के आईएसबीटी के नजदीक संचालित भारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर पहुंचीं। इस केंद्र पर दिव्यांगजनों को दी जाने वाली सुविधाओं के तहत उन्हें आधुनिक प्रोस्थेटिक पैर पूरी तरह निशुल्क प्रदान किया गया। इसके लिए उनसे एक भी रुपया नहीं लिया गया। शम्मी बताती हैं कि इस कृत्रिम पैर के मिलने से केवल उनके चलने-फिरने की शारीरिक क्षमता ही वापस नहीं आई, बल्कि उनका वर्षों पुराना आत्मविश्वास और आत्मनिर्भर बनने की ललक भी पूरी तरह लौट आई।\n\nकक्षा में घंटों खड़े रहकर विज्ञान पढ़ाती हैं शम्मी\nआज शम्मी सिंह केवल मुश्किलों से उबरने वाली एक आम महिला भर नहीं हैं, बल्कि समाज में प्रेरणा का बड़ा स्रोत बन चुकी हैं। वर्तमान में वह दिल्ली पब्लिक स्कूल में एक शिक्षिका के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। स्कूल में वह रोजाना घंटों पैरों पर खड़े रहकर बच्चों को विज्ञान पढ़ाती हैं और इसके साथ ही क्लास टीचर की अहम जिम्मेदारी भी पूरी निष्ठा से निभाती हैं। वह स्कूल के पाठ्येतर कार्यक्रमों और विभिन्न गतिविधियों में पूरी तत्परता के साथ भाग लेती हैं।\n\nशम्मी का कहना है कि आज वह अपने विद्यालय की सबसे सक्रिय टीचर्स में से एक हैं। उनका कृत्रिम पैर उनके दैनिक अध्यापन और जिम्मेदारियों के आड़े कभी नहीं आता। पहले वह अपने प्राकृतिक पैर के सहारे चलती थीं और अब कृत्रिम पैर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन बच्चों को सिखाने और अपने कर्तव्यों को निभाने के जज्बे में कोई अंतर नहीं आया है। सहकर्मी और छात्र भी उनके इस समर्पण को देखकर प्रेरित होते हैं।\n\nशिक्षिका की भूमिका के साथ सरकारी नौकरी का लक्ष्य\nविद्यालय में नियमित अध्यापन के साथ-साथ शम्मी अपनी आगे की तरक्की के लिए सरकारी सेवा की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं। वह स्पष्ट करती हैं कि वर्तमान समय में एक शिक्षिका के रूप में उनकी आमदनी इतनी अधिक नहीं है कि वह प्रोस्थेटिक लेग से जुड़े महंगे रखरखाव और बदलावों का खर्च स्वयं वहन कर सकें। उच्च गुणवत्ता वाले कृत्रिम अंगों की मरम्मत और उपकरण काफी खर्चीले होते हैं, इसलिए उन्हें अस्पताल से मिलने वाला निरंतर सहयोग बहुत सहारा देता है।\n\nवह बताती हैं कि जब भी प्रोस्थेटिक लेग में कोई तकनीकी दिक्कत आती है या मदद की जरूरत पड़ती है, तो वह संस्था के विवेक सर से सीधे संपर्क करती हैं। उन्हें हमेशा यह पक्का भरोसा रहता है कि उनकी समस्या का समाधान तुरंत किया जाएगा। संस्था का वातावरण हमेशा से बेहद सहयोगात्मक रहा है और वहां जरूरतमंदों को बिना किसी देरी के आवश्यक चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।\n\nदिव्यांगजनों के पुनर्वास में जुटा पटना का अस्पताल\nभारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर दिव्यांगों के कल्याण और उनके उपचार के लिए समर्पित एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र है। यह अस्पताल जन्मजात शारीरिक विकृतियों से लेकर हादसों या बीमारियों के कारण पैदा हुई शारीरिक कमियों को ठीक करने का कार्य करता है। संस्थान का व्यापक उद्देश्य पूरे समाज को दिव्यांगता की बेड़ियों से मुक्त कराकर जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाना है।\n\nइस केंद्र पर मरीजों के लिए प्रारंभिक जांच, आधुनिक ऑपरेशन, निशुल्क कृत्रिम अंग निर्माण, फिजियोथेरेपी और न्यूरोथेरेपी जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं पूरी तरह मुफ्त दी जाती हैं। यह अस्पताल पटना में न्यू आईएसबीटी के पास मेट्रो पिलर नंबर 181 के समीप स्थित है। यहां परामर्श और उपचार प्राप्त करने के लिए बुधवार को छोड़कर सप्ताह के अन्य सभी दिनों में सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच संपर्क किया जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर शारीरिक अक्षमताओं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को दोबारा आत्मनिर्भर बनने और निशुल्क चिकित्सा सहायता पाने की व्यावहारिक राह दिखाती है।\n\n• पटना और बिहार में: आर्थिक रूप से कमजोर दिव्यांगजन न्यू आईएसबीटी के पास स्थित संजय आनंद अस्पताल से जांच, सर्जरी और कृत्रिम अंग की मुफ्त सेवा ले सकते हैं। मरीज बुधवार को छोड़कर किसी भी दिन सुबह 10 से 1 बजे के बीच मेट्रो पिलर 181 के पास केंद्र पर संपर्क कर सकते हैं।\n• पूरे देश में: अंग गंवाने वाले युवाओं के लिए यह कहानी साबित करती है कि आधुनिक प्रोस्थेटिक्स के जरिए पूर्णकालिक पेशेवर करियर और अध्यापन संभव है। सही पुनर्वास केंद्र से जुड़कर मरीज अपने आत्मविश्वास को फिर से हासिल कर समाज की मुख्यधारा में लौट सकते हैं।\n• शिक्षकों और युवाओं के लिए: शारीरिक चुनौतियों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षाओं और स्कूल शिक्षण जैसी फील्ड नौकरियों में सफलता पाई जा सकती है। सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान ऐसी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के लिए जरूरी संसाधन और मंच उपलब्ध कराते हैं।\n• स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में: कैंसर या ट्यूमर के मामलों में समय पर ली गई सर्जरी जान बचाने में निर्णायक साबित होती है। समय रहते कृत्रिम अंगों का सहारा लेने से मरीज बिना किसी सहारे के अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस आ सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nशम्मी सिंह को बार-बार लौटने वाले कैंसरयुक्त ट्यूमर के कारण अपना पैर गंवाना पड़ा, जिसके बाद निशुल्क पुनर्वास सेवाओं की मदद से उनका जीवन पटरी पर लौटा।\n\n• कैंसरयुक्त ट्यूमर का उभार: इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद वर्ष 2020 में उनके पैर में ट्यूमर का पता चला था। जनवरी 2021 में हुए ऑपरेशन के बाद भी यह गांठ पूरी तरह ठीक नहीं हुई और 2022 में दोबारा लौट आई।\n• जान बचाने के लिए विच्छेदन: चिकित्सकीय जांच में ट्यूमर के कैंसरयुक्त होने की पुष्टि हुई, जिसके शरीर में फैलने का खतरा था। डॉक्टरों ने संक्रमण और कैंसर के फैलाव को रोकने के लिए 2 जुलाई 2022 को पैर काटने का चिकित्सीय निर्णय लिया।\n• मुफ्त पुनर्वास की उपलब्धता: निजी स्तर पर आधुनिक प्रोस्थेटिक अंग अत्यधिक महंगे होने के कारण शम्मी ने पटना के संजय आनंद विकलांग अस्पताल का रुख किया। वहां 17 अप्रैल 2023 को उन्हें निशुल्क कृत्रिम अंग मिला, जिसने उन्हें सामान्य जीवन में लौटने में सक्षम बनाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. शम्मी सिंह को पैर में ट्यूमर का पता कब चला था?\nसाल 2020 में कोरोना महामारी के दौरान कॉलेज पूरा करने के बाद उन्हें अपने पैर में ट्यूमर का पता चला था।\n\n2. शम्मी सिंह का पैर किस तारीख को काटा गया था?\nट्यूमर के कैंसरयुक्त होने और बार-बार लौटने के कारण डॉक्टरों ने 2 जुलाई 2022 को उनका पैर काटा।\n\n3. उन्हें निशुल्क प्रोस्थेटिक लेग किस संस्थान से प्राप्त हुआ?\nउन्हें 17 अप्रैल 2023 को पटना स्थित भारत विकास एवं संजय आनंद विकलांग अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर से निशुल्क कृत्रिम पैर मिला।\n\n4. वर्तमान में शम्मी सिंह किस पद पर कार्यरत हैं?\nवर्तमान में वह दिल्ली पब्लिक स्कूल में विज्ञान विषय की शिक्षिका और क्लास टीचर के रूप में कार्यरत हैं।\n\n5. अध्यापन के अलावा वह किस चीज की तैयारी कर रही हैं?\nस्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ वह सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही हैं।\n\n6. संजय आनंद विकलांग अस्पताल पटना में कहां स्थित है और मिलने का समय क्या है?\nयह अस्पताल न्यू आईएसबीटी में मेट्रो पिलर 181 के पास स्थित है, जहां बुधवार को छोड़कर सप्ताह के सभी दिन सुबह 10 से 1 बजे तक संपर्क किया जा सकता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nशम्मी सिंह का सफर यह सिखाता है कि गंभीर शारीरिक क्षति और मानसिक हताशा के बावजूद अटूट इच्छाशक्ति से जीवन को नई दिशा दी जा सकती है।\n\n• चुनौतियों को स्वीकार करना: अंग गंवाने के बाद हालात से समझौता करने के बजाय उन्होंने खुद को एक एम्प्यूटी के रूप में स्वीकार कर आगे की तैयारी की। स्वीकार्यता ही मानसिक मजबूती और नए जीवन की पहली सीढ़ी होती है।\n• सामाजिक मदद का सदुपयोग: विपरीत परिस्थितियों में सही पुनर्वास संस्थानों की तलाश करना और उनकी मदद से अपने पैरों पर खड़ा होना बुद्धिमत्ता का परिचायक है। सही संसाधनों का उपयोग व्यक्ति को पुनः आत्मनिर्भर बना सकता है।\n• कार्यक्षेत्र में पूर्ण समर्पण: शारीरिक रूप से अक्षम होने के बाद भी उन्होंने खुद को किसी से कम नहीं आंका और स्कूल में सबसे सक्रिय शिक्षिका बनकर दिखाया। मेहनत और लगन से किसी भी शारीरिक कमी को पीछे छोड़ा जा सकता है।\n• निरंतर आगे बढ़ने की चाह: वर्तमान नौकरी के साथ सरकारी सेवा की तैयारी जारी रखकर उन्होंने साबित किया कि उपलब्धियों की कोई सीमा नहीं होती। कठिन से कठिन दौर में भी बड़े सपनों को जीवित रखना चाहिए।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-09-21",
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