सिर्फ 14 हजार रुपये की इस अनोखी मशीन ने बदल दी बिहार के मक्का किसानों की किस्मत, दिनभर में निकालती है 20 क्विंटल दाना बिहार के गया जिले में मक्का किसानों के लिए एक सस्ती थ्रेशिंग मशीन काफी मददगार साबित हो रही है, जिससे मजदूरी का खर्च घटने के साथ समय की भारी बचत हो रही है। बिहार में मक्के की खेती और थ्रेशिंग की बड़ी चुनौती भारत में मक्का उत्पादन के क्षेत्र में बिहार एक प्रमुख राज्य है, जिसका देश में तीसरा स्थान है। राज्य के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर मक्के की खेती की जाती है। इसी क्रम में दक्षिण बिहार के गया जिले के इमामगंज प्रखंड में स्थित भगहर गांव भी मक्के की खेती के लिए विशेष रूप से पहचान बना चुका है। इस छोटे से गांव में लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में मक्के की बुवाई की जाती है। हालांकि, फसल के पककर तैयार हो जाने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मक्के के भुट्टों से दानों को अलग करने यानी थ्रेशिंग की होती थी। इस पारंपरिक कार्य में श्रम और समय दोनों की भारी बर्बादी होती थी, लेकिन अब तकनीक ने इस काम को बेहद आसान बना दिया है। कम लागत वाली मक्का थ्रेशिंग मशीन बनी वरदान छोटे और सीमांत किसान जो 2, 5 या 10 बीघा जैसी सीमित भूमि पर मक्के की खेती करते हैं, उनके लिए बाजारों में उपलब्ध आधुनिक भारी मशीनें खरीदना व्यावहारिक नहीं था। इस समस्या को दूर करने के लिए बाजार में एक छोटी 'मक्का थ्रेशिंग मशीन' आई है, जो काफी लोकप्रिय हो रही है। इस उपयोगी मशीन की कीमत मात्र 14,000 रुपये के आसपास है, जो एक सामान्य स्मार्टफोन की कीमत से भी कम है। इस बेहद किफायती दाम के कारण छोटे किसान भी इसे आसानी से खरीद पा रहे हैं और अपने खेतों में इस्तेमाल कर रहे हैं। शानदार कार्यक्षमता और बिजली की बचत इस मशीन की कार्यक्षमता बेहद प्रभावशाली है। यह महज एक घंटे में लगभग 3 से 4 क्विंटल तक मक्के के दाने आसानी से निकाल सकती है। यह मशीन मुख्य रूप से 1 HP या 2 HP की छोटी इलेक्ट्रिक मोटर या फिर डीजल और पेट्रोल इंजन से संचालित होती है। भगहर गांव के स्थानीय किसान रवींद्र प्रसाद ने TrendKia को बताया कि इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम बिजली खपत है। अगर कभी बिजली चली भी जाए, तो इसे घर के साधारण इनवर्टर से भी आसानी से चलाया जा सकता है। शारीरिक कष्ट से मुक्ति और बढ़ेगा मुनाफा पहले के समय में जब किसान हाथों से मक्के के दाने निकालते थे, तो उन्हें भारी शारीरिक श्रम करना पड़ता था जिससे हाथों में छाले पड़ जाते थे। इसके अलावा, हाथों से दाना निकालने में मजदूरी पर होने वाला खर्च भी बहुत ज्यादा था। मैनुअल तरीके से दिनभर में केवल 3 से 4 क्विंटल दाना ही निकाला जा पाता था। वहीं, इस थ्रेशिंग मशीन की मदद से किसान बिना किसी अतिरिक्त मजदूर के घर बैठे ही दिनभर में 15 से 20 क्विंटल दाना निकाल लेते हैं। यही वजह है कि आज भगहर गांव के लगभग हर घर में यह मशीन देखने को मिल जाती है और इसने किसानों की जिंदगी को काफी आसान बना दिया है। इसका आप पर असर • भारत भर में: छोटे और सीमांत किसान इस तरह की कम लागत वाली कृषि मशीनों को अपनाकर अपनी परिचालन लागत को कम कर सकते हैं और श्रम की किल्लत से निपट सकते हैं। • बिहार में: गया और राज्य के अन्य मक्का उत्पादक जिलों के किसान कम समय और कम बिजली खपत में अपनी फसल तैयार करके सीधे बाजार में बेच सकते हैं, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा। सवाल-जवाब 1. मक्का उत्पादन में बिहार का देश में कौन सा स्थान है? मक्का उत्पादन के मामले में बिहार पूरे भारत में तीसरे स्थान पर आता है। 2. गया के किस गांव में बड़े पैमाने पर मक्के की खेती होती है? गया जिले के इमामगंज प्रखंड के भगहर गांव में लगभग 50 एकड़ भूमि पर मक्के की खेती की जाती है। 3. इस मक्का थ्रेशिंग मशीन की कीमत कितनी है? बाजार में इस मक्का थ्रेशिंग मशीन की कीमत लगभग 14,000 रुपये है, जो छोटे किसानों के लिए काफी किफायती है। 4. इस मशीन की कार्यक्षमता कितनी है और यह कैसे काम करती है? यह मशीन हर घंटे 3 से 4 क्विंटल और दिनभर में 15 से 20 क्विंटल दाना निकाल सकती है। यह 1 HP या 2 HP मोटर, डीजल-पेट्रोल इंजन या इनवर्टर से चलती है। https://trendkia.com/success-stories/sirpha-14-hajara-rupaye-ki-isa-anokhi-mashina-ne-badala-di-bihar-ke-makka-kisanon-ki-kismata-dinabhara-men-nikalati-hai-20-kvintal-2011 TrendKia — Har trend, sabse pehle.