स्कूल में मैथ्स से डरने वाला यह लड़का आज चला रहा है भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी गणित के पेपर में सिर्फ 51 नंबर लाने वाले पवन कुमार चंदना ने इसरो की नौकरी छोड़कर आठ साल में स्काईरूट एयरोस्पेस को 1.1 बिलियन डॉलर की कंपनी बना दिया, और उनका विक्रम-1 रॉकेट अब कक्षा में स्थापित हो चुका है. स्कूल की क्लास में गणित का पेपर देखते ही जिस लड़के के हाथ-पैर कांपने लगते थे, वही आज देश के सबसे बड़े प्राइवेट स्पेस मिशन की कमान संभाले हुए है. हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना की अगुवाई में बना भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 अपनी तय कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया है. महज आठ साल के भीतर पवन ने इसरो की सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़कर देश को उसकी पहली 1.1 बिलियन डॉलर की स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी दे दी है, और अब दुनिया उन्हें भारत के एलन मस्क के तौर पर पहचानने लगी है. किसी प्राइवेट कंपनी के रॉकेट को कक्षा में स्थापित करना दुनिया की मुट्ठी भर कंपनियों के ही बस की बात रही है, और भारत की धरती से यह कारनामा पहली बार हुआ है. इस पूरी कहानी की खास बात यह है कि इसे अंजाम देने वाला शख्स कभी संख्याओं से इतना घबराता था कि गणित की क्लास उसके लिए किसी सजा से कम नहीं थी. गणित से डर, फिर IIT ने बदली सोच 1991 में हैदराबाद में जन्मे पवन चंदना का बचपन किसी खास प्रतिभाशाली छात्र जैसा नहीं रहा. उन्हें संख्याओं से इतना डर लगता था कि एक गणित के पेपर में वे सिर्फ 51 नंबर ही ला पाए और बड़ी मुश्किल से पास हुए थे. यह वह मोड़ था जहां उनके पिता ने हार नहीं मानी. उन्होंने बेटे का हौसला बढ़ाया और उसका दाखिला आईआईटी की कोचिंग क्लास में करवा दिया. यहीं से पवन के भीतर बैठा गणित का डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा और वे नंबरों के साथ खेलना सीख गए. कोचिंग के इन्हीं दिनों ने उनकी पूरी सोच को नई दिशा दे दी. पहले ही प्रयास में IIT, फिर रॉकेट साइंस की तरफ रुख कोचिंग के असर ने कमाल कर दिया. पवन ने अपनी पहली ही कोशिश में आईआईटी की परीक्षा पास कर ली और साल 2007 में आईआईटी खड़गपुर में दाखिला लिया, जहां से उन्होंने बीटेक और एमटेक दोनों डिग्रियां हासिल कीं. जिस दौर में उनके सहपाठी विदेश की मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों के सपने संजो रहे थे, पवन का ध्यान रॉकेट साइंस की दुनिया की ओर खिंचता चला गया. यही वह समय था जब उन्हें एहसास हुआ कि उनका असली जुनून जमीन से आसमान तक जाने वाली मशीनों में छिपा है, न कि किसी दफ्तर की मोटी तनख्वाह में. इसरो में सीखे अंतरिक्ष विज्ञान के गुर पढ़ाई पूरी होते ही 2012 में पवन इसरो से जुड़ गए और वैज्ञानिक के तौर पर अपना करियर शुरू किया. उन्होंने चंद्रयान मिशन में इस्तेमाल हुए भारत के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी एमके-3 पर काम किया और उसके सॉलिड बूस्टर सिस्टम के इंजीनियर रहे. इसके अलावा वे इसरो के स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल मिशन में डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर की भूमिका में भी रहे. उनके योगदान को देखते हुए इसरो ने उन्हें दो बार इनोवेशन अवॉर्ड से सम्मानित किया. यह वह दौर था जब पवन ने अंतरिक्ष इंजीनियरिंग की बारीकियां बेहद करीब से सीखीं, जो आगे चलकर उनके अपने उद्यम की नींव बनीं. सरकारी नौकरी छोड़ रखी स्काईरूट की नींव इसरो में काम के दौरान ही पवन को अंदाजा हो गया था कि आने वाले वर्षों में छोटे सैटेलाइट्स की मांग तेजी से बढ़ेगी और दुनिया को ऐसे रॉकेट चाहिए होंगे जो जरूरत पड़ने पर तुरंत लॉन्च हो सकें. इसी सोच के साथ उन्होंने अपने दोस्त नागा भरत डाका के साथ मिलकर जून 2018 में हैदराबाद में सरकारी नौकरी को अलविदा कहकर स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत की. दोनों का लक्ष्य बेहद स्पष्ट था, अंतरिक्ष यात्रा को इतना सहज बना देना कि वह किसी मोबाइल ऐप से कैब बुक करने जितना आसान लगे. उस दौर में भारत में प्राइवेट स्पेसफ्लाइट को लेकर कोई ठोस नीति मौजूद नहीं थी और स्पेस स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग जुटाने का कोई भरोसेमंद ढांचा भी नहीं था. इन तमाम अड़चनों के बावजूद दोनों दोस्तों ने दुनिया की सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग चुनौतियों में गिनी जाने वाली इस राह को चुना, जबकि उस वक्त ज्यादातर लोगों को उनकी कामयाबी पर भरोसा नहीं था. न कोई तैयार रास्ता था, न कोई गारंटी, फिर भी दोनों दोस्तों ने अपने आइडिया पर दांव लगाया. 1.1 बिलियन डॉलर की कंपनी और फोर्ब्स की लिस्ट में जगह आज स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न स्टार्टअप बन चुकी है. ब्लैकरॉक और टेमासेक जैसी दुनिया की बड़ी निवेश कंपनियों ने इसमें भरोसा जताते हुए पैसा लगाया है. मई 2026 में कंपनी को 60 मिलियन डॉलर की नई फंडिंग मिली, जिसके बाद स्काईरूट की कुल वैल्यूएशन करीब 1.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई. इस उपलब्धि के साथ पवन चंदना का नाम मशहूर फोर्ब्स 30 अंडर 30 एशिया लिस्ट में भी दर्ज हो चुका है. क्यों मिलती है भारत के एलन मस्क की उपाधि अमेरिका में एलन मस्क ने जिस तरह सरकारी एजेंसियों के दबदबे वाले स्पेस सेक्टर में स्पेसएक्स जैसी प्राइवेट कंपनी खड़ी करके नई इबारत लिखी, कुछ वैसा ही सफर पवन चंदना और उनकी टीम ने भारत की जमीन पर तय किया है. एक सरकारी वैज्ञानिक की नौकरी से निकलकर, बिना किसी नीति और फंडिंग सपोर्ट के, आठ साल के भीतर देश को उसकी पहली प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट कंपनी और पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न देना ही वजह है कि लोग अब पवन को इस उपाधि से नवाजने लगे हैं. गणित के डर से शुरू हुआ यह सफर आज देश के सबसे भरोसेमंद प्राइवेट स्पेस मिशन तक जा पहुंचा है. इसका आप पर असर • भारत में: यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत में प्राइवेट स्पेस कंपनियां अब सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर बड़े मिशन पूरे कर सकती हैं, जिससे इस सेक्टर में और निवेश और नई कंपनियां आने का रास्ता खुल सकता है. • हैदराबाद में: स्काईरूट एयरोस्पेस का मुख्यालय हैदराबाद में है, इसलिए कंपनी की बढ़ती वैल्यूएशन और फंडिंग से शहर में इंजीनियरिंग और स्पेस-टेक क्षेत्र में रोजगार के मौके बढ़ सकते हैं. सवाल-जवाब 1. विक्रम-1 क्या है? यह भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसे सफलतापूर्वक अपनी कक्षा में स्थापित किया गया है. 2. स्काईरूट एयरोस्पेस के फाउंडर कौन हैं? पवन कुमार चंदना ने अपने दोस्त नागा भरत डाका के साथ मिलकर स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की. 3. स्काईरूट की मौजूदा वैल्यूएशन कितनी है? मई 2026 में 60 मिलियन डॉलर की नई फंडिंग मिलने के बाद कंपनी की कुल वैल्यूएशन करीब 1.1 बिलियन डॉलर हो गई है. 4. पवन चंदना ने इसरो में क्या काम किया था? वे जीएसएलवी एमके-3 रॉकेट के सॉलिड बूस्टर सिस्टम इंजीनियर रहे और स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल मिशन में डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर काम किया. 5. स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना कब हुई? जून 2018 में हैदराबाद में सरकारी नौकरी छोड़कर इसकी स्थापना की गई. 6. स्काईरूट में किन बड़ी कंपनियों ने निवेश किया है? ब्लैकरॉक और टेमासेक जैसी दुनिया की बड़ी निवेश कंपनियों ने इसमें पैसा लगाया है. 7. पवन चंदना को किस लिस्ट में जगह मिली है? उनका नाम मशहूर फोर्ब्स 30 अंडर 30 एशिया लिस्ट में शामिल हो चुका है. 8. स्कूल के दिनों में पवन चंदना का गणित में प्रदर्शन कैसा था? वे संख्याओं से डरते थे और एक बार गणित के पेपर में सिर्फ 51 नंबर लाकर मुश्किल से पास हुए थे. प्रेरणा और सबक • डर को ताकत बनाएं: पवन ने गणित के डर को छिपाने के बजाय उस पर काम किया और आगे चलकर उसी विषय को अपने करियर का आधार बना लिया. • सही मार्गदर्शन जरूरी है: पिता के फैसले और सही कोचिंग ने पवन के भीतर का डर खत्म कर उन्हें नई दिशा दी. • भीड़ से अलग राह चुनें: जब बाकी दोस्त विदेश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों के पीछे थे, पवन ने अपने जुनून रॉकेट साइंस को चुना. • अनुभव पहले, उद्यम बाद में: उद्यमी बनने से पहले इसरो में सालों तक तकनीकी अनुभव लेकर पवन ने अपनी नींव मजबूत की. • अनिश्चितता में भी दांव लगाएं: बिना किसी नीति और फंडिंग सपोर्ट के, पवन और उनके दोस्त ने अपने आइडिया पर भरोसा करके शुरुआत की. https://trendkia.com/success-stories/skula-men-maithsa-se-darane-vala-yaha-laraka-aja-chala-raha-hai-bharat-ki-pahali-space-tech-yunikorna-knpani-8552 TrendKia — Har trend, sabse pehle.