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  "title": "सुदूर ओडिशा के अखबार बेचने वाले शिक्षक द्विती चंद्र साहू को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नेशनल टीचर अवॉर्ड से नवाजा",
  "summary": "ओडिशा के रायगड़ा जिले के सुदूर स्कूल में बिना इंटरनेट और बिजली के नवाचार से पढ़ाने वाले शिक्षक द्विती चंद्र साहू को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024 प्रदान किया है।",
  "content": "अत्यधिक निर्धनता और संसाधनों का अभाव कभी भी उन लोगों की राह नहीं रोक सकता जिनके इरादे फौलादी होते हैं। ओडिशा राज्य के रायगड़ा जिले के अंतर्गत आने वाले दूरदराज पहाड़ी क्षेत्र कोटापेटा से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक की प्रेरणादायक यात्रा तय करने वाले शिक्षक द्विती चंद्र साहू का जीवन इस सिद्धांत को साबित करता है। बाल्यावस्था में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण उन्हें बचपन में काफी अभावों का सामना करना पड़ा। उनकी माताजी ने परिवार की जीविका चलाने के लिए दूसरों के घरों में बर्तन साफ करने का काम किया। वहीं द्विती चंद्र साहू ने स्वयं अपनी स्कूली पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए कई बार भूखे पेट रहकर सड़कों पर घूम-घूमकर अखबार बेचे।\n\nसंघर्ष और गरीबी से घिरा शुरुआती जीवन\nद्विती चंद्र साहू का पूरा बचपन गंभीर सामाजिक और आर्थिक संकटों के बीच बीता। पिता के आकस्मिक निधन के पश्चात परिवार में भोजन का संकट पैदा हो गया था और कई रातें भूखे पेट व्यतीत करनी पड़ती थीं। इसके बावजूद उनकी मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी और उनके इसी त्याग से प्रेरणा लेकर द्विती चंद्र साहू ने रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर अखबार बेचना शुरू किया। समाचार पत्र बेचकर मिलने वाले पैसों से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा जारी रखी और कभी अपनी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके।\n\nउच्च शिक्षा और शिक्षण कार्य का शुभारंभ\nकठिन संघर्ष के दिनों ने उन्हें शिक्षा के वास्तविक महत्व का बोध कराया। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उन्होंने पत्रकारिता का अध्ययन किया और फिर जनजातीय अध्ययन (ट्राइबल स्टडीज) विषय में अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी की। साल 2001 में शिक्षक प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने औपचारिक रूप से शिक्षण पेशे में कदम रखा। वह ओडिशा के रायगड़ा जिले में स्थित सरकारी हाई स्कूल, बिल्लेसू में बतौर शिक्षक तैनात हुए और केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रहने के बजाय बच्चों के सर्वांगीण विकास का संकल्प लिया।\n\nतकनीकी अभावों के बीच स्मार्ट शिक्षण का नवाचार\nरायगड़ा का बिल्लेसू क्षेत्र एक दुर्गम पहाड़ी इलाका है, जहां उस समय न तो निर्बाध बिजली आपूर्ति उपलब्ध थी और न ही इंटरनेट की सुविधा। इस बड़ी चुनौती के सामने झुकने के बजाय द्विती चंद्र साहू ने डिजिटल तकनीकों का अनोखा इस्तेमाल खोज निकाला। वह नियमित रूप से ऐसे स्थानों पर जाते थे जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध होता था। वहां से वे विभिन्न शैक्षणिक वीडियो डाउनलोड करते और फिर स्कूल वापस आकर अपने मोबाइल फोन और टैब की सहायता से बच्चों को दिखाते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्वयं कई ज्ञानवर्धक शैक्षणिक गेम बनाए और विद्यार्थियों के लिए आसान भाषा में पीडीएफ नोट्स तैयार किए।\n\nकंचे, कठपुतली और बाल अदालत से बनाई शिक्षा रोचक\nपत्रकारिता क्षेत्र के अपने अनुभवों का रचनात्मक उपयोग करते हुए उन्होंने अपनी कक्षा के माहौल को पूरी तरह इंटरैक्टिव बना दिया। गणित के कठिन सिद्धांतों को सिखाने के लिए वह कांच की गोलियों यानी कंचों का उपयोग करते हैं, जबकि भाषा के ज्ञान के लिए पपेट शो और फ्लैशकार्ड की सहायता लेते हैं। आदिवासी बच्चों की समझ को आसान बनाने के लिए उन्होंने द्विभाषी शिक्षा प्रणाली अपनाई, जिसमें स्थानीय कोवी भाषा और ओडिया भाषा की कहानियों एवं शब्दकोशों के माध्यम से पठन-पाठन कराया जाता है। इसके साथ ही उन्होंने विद्यार्थियों में बचत की आदत डालने के लिए 'अमा बैंक', कानूनी व नागरिक जागरूकता के लिए 'बाल अदालत' और एक छोटा 'आदिवासी संग्रहालय' भी स्थापित किया।\n\nपरिमाल पाठशाला और पिटारा शिक्षण पेटी पहल\nबच्चों को मानसिक तनाव से मुक्त रखने और व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए द्विती चंद्र साहू ने 'परिमाल पाठशाला' नामक अभियान शुरू किया। इसके अंतर्गत शनिवार के दिन को 'फन डे' घोषित किया गया, जिसमें बिना किसी पढ़ाई के दबाव के बच्चों को व्यक्तिगत स्वच्छता, साफ-सफाई और सुरक्षा से जुड़े बुनियादी नियम सिखाए जाते हैं। इसके अलावा उन्होंने 'पिटारा शिक्षण पेटी' योजना तैयार की, जिसके माध्यम से कबाड़ व रीसाइकिल की गई वस्तुओं से बेहद कम लागत वाले शिक्षण उपकरण और टीचिंग मॉडल बनाए जाते हैं।\n\nराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा नेशनल टीचर अवॉर्ड 2024\nशिक्षा जगत में द्विती चंद्र साहू के इस अभूतपूर्व समर्पण, अनोखे शिक्षण प्रयोगों और ग्रामीण व आदिवासी बच्चों का जीवन संवारने के उनके इस जुनून को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 'नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024' के लिए चयनित किया। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से अलंकृत किया। यह सम्मान न केवल एक शिक्षक की लगन की जीत है, बल्कि उस हर मां के त्याग का प्रतिफल है जो अभावों से जूझकर अपने बच्चों को शिक्षित बनाती है।\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार देश भर के शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण स्थापित करता है।\n\n• भारत में: यह उपलब्धि साबित करती है कि बुनियादी ढांचे की कमी के बावजूद शिक्षक नवाचार के जरिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकते हैं। इससे देश भर के ग्रामीण व सरकारी स्कूलों में कम लागत वाले शिक्षण मॉडल अपनाने की प्रेरणा मिलती है।\n• ओडिशा में: रायगड़ा जिले और ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं (कोवी और ओडिया) में पढ़ाई कराने की इस पद्धति से ड्रॉपआउट दर घटाने में मदद मिलेगी। इससे राज्य के दूरदराज इलाकों में बच्चों की स्कूल में उपस्थिति और सीखने की क्षमता में सुधार होगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. द्विती चंद्र साहू कौन हैं?\nद्विती चंद्र साहू ओडिशा के रायगड़ा जिले के सरकारी हाई स्कूल, बिल्लेसू में कार्यरत एक नवाचारी शिक्षक हैं, जिन्हें नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024 मिला है।\n\n2. द्विती चंद्र साहू को कौन सा राष्ट्रीय सम्मान मिला है?\nउन्हें राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 'नेशनल अवॉर्ड फॉर टीचर्स 2024' से सम्मानित किया गया है।\n\n3. उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च कैसे उठाया?\nपिता के निधन के बाद गरीबी से जूझते हुए उन्होंने प्रतिदिन पैदल घूमकर अखबार बेचे और अपनी शिक्षा पूरी की।\n\n4. द्विती चंद्र साहू की शैक्षणिक योग्यता क्या है?\nउन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और जनजातीय अध्ययन (ट्राइबल स्टडीज) विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।\n\n5. बिना बिजली और इंटरनेट के वह बच्चों को कैसे पढ़ाते थे?\nवह नेटवर्क वाले इलाकों में जाकर एजुकेशनल वीडियो डाउनलोड करते थे और अपने फोन या टैब के जरिए स्कूल के बच्चों को दिखाते थे।\n\n6. कक्षा में शिक्षण के लिए वह किन अनूठे तरीकों का प्रयोग करते हैं?\nवह गणित सिखाने के लिए कंचों का, भाषा के लिए पपेट शो का और जनजातीय बच्चों के लिए स्थानीय कोवी व ओडिया भाषा की कहानियों का उपयोग करते हैं।\n\n7. 'अमा बैंक' और 'बाल अदालत' पहल क्या है?\nयह उनके द्वारा स्कूल में शुरू की गई अनूठी पहल हैं, जिसके जरिए बच्चों को बचत की आदत और नागरिक व कानूनी अधिकारों की जानकारी दी जाती है।\n\n8. 'पिटारा शिक्षण पेटी' क्या है?\nयह वेस्ट मटीरियल और रीसाइकल की गई चीजों से कम लागत वाले शिक्षण उपकरण और टीचिंग मॉडल बनाने की एक अनूठी पहल है।\n\nप्रेरणा और सबक\nद्विती चंद्र साहू का जीवन कठिन परिस्थितियों से उबरकर सफलता हासिल करने के कई महत्वपूर्ण सबक देता है।\n\n• परिस्थितियों को बाधा न बनने दें: बचपन में गरीबी और पिता का साया न होने के बावजूद उन्होंने अखबार बेचकर पढ़ाई पूरी की और सर्वोच्च मुकाम हासिल किया।\n• सीमित संसाधनों में समाधान खोजें: इंटरनेट न होने पर नेटवर्क क्षेत्र से वीडियो डाउनलोड कर पढ़ाने की उनकी तकनीक दिखाती है कि इच्छाशक्ति हो तो हर समस्या का समाधान संभव है।\n• संस्कृति और स्थानीय भाषा का सम्मान: जनजातीय बच्चों को उनकी अपनी 'कोवी' भाषा में सिखाकर उन्होंने साबित किया कि जुड़ाव ही प्रभावी शिक्षा की कुंजी है।\n• कबाड़ से रचनात्मकता: बेकार पड़ी वस्तुओं से शिक्षण उपकरण बनाकर उन्होंने दिखाया कि नवाचार के लिए बड़े बजट की जरूरत नहीं होती।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-09-02",
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