# सूखी लौकी से निकलती है रोशनी: बस्तर के तुंबा आर्ट ने कैसे बनाई अपनी अलग पहचान

> बस्तर में सूखी लौकी को तराशकर बनाए जाने वाले तुंबा आर्ट की मांग बढ़ रही है, लेकिन इसे गढ़ने वाले कारीगर घटते जा रहे हैं। एक तुंबा आर्ट 200 से 1000 रुपये तक में बिकता है।

**Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-06-13 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/sukhi-lauki-se-nikalati-hai-roshani-bastara-ke-tunba-arta-ne-kaise-banai-apani-a-382

## लौकी जो बन जाती है घर की शोभा
छत्तीसगढ़ के बस्तर की पहचान सिर्फ उसकी शिल्प कला और काष्ठ कला तक सीमित नहीं है। यहां एक और कारीगरी है जो सूखी लौकी को कलाकृति में बदल देती है — इसे तुंबा आर्ट कहा जाता है। इसमें लौकी की सतह पर बारीक नक्काशी उकेरी जाती है और फिर उसके भीतर लाइट लगा दी जाती है। जब यह जलती है तो नक्काशी से छनकर निकलती रोशनी पूरे कमरे को बेहद खूबसूरत बना देती है।

## बाजार में मांग, पर घटते कारीगर
देखने में आकर्षक यह कलाकृति घरों और कमरों की सजावट बढ़ा देती है, इसलिए बाजार में इसकी अच्छी-खासी मांग बनी रहती है। एक तैयार तुंबा आर्ट 200 से 1000 रुपये के बीच बिकता है। फिलहाल यह बस्तर में आसानी से मिल जाता है और ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है। आज यही कला कई कारीगरों के लिए रोजी-रोटी का जरिया बनी हुई है। विडंबना यह है कि मांग जहां बढ़ रही है, वहीं इसे बनाने वाले हाथों की संख्या लगातार सिमटती जा रही है।

## एक-एक टुकड़ा गढ़ने की लंबी प्रक्रिया
इस कला को गढ़ने वाली कारीगर इंदुमती रावना बताती हैं कि वे तुंबा आर्ट के साथ-साथ लकड़ी की काष्ठ कला का काम भी करती हैं। तुंबा आर्ट का आधार लौकी ही है — इसके लिए वे या तो खुद लौकी उगाती हैं या बाजार से खरीद लेती हैं। इसके बाद लौकी को अच्छी तरह सुखाया जाता है।

जब लौकी पूरी तरह सूख जाती है तो उसका भीतरी सारा गूदा निकाल दिया जाता है और सतह को घिसकर फिनिशिंग दी जाती है। फिर लोहे के औजारों को गर्म करके लौकी पर तरह-तरह की कलाकृतियां उकेरी जाती हैं, और हर अलग डिजाइन के लिए अलग औजार काम आता है। रोशनी बाहर छनकर निकल सके, इसके लिए जरूरी जगहों पर खास नक्काशी की जाती है। एक तुंबा आर्ट पर पूरा डिजाइन उतारने में करीब एक दिन लग जाता है।

## जगदलपुर की दुकान से देश-दुनिया तक
इंदुमती की दुकान जगदलपुर में है, जहां से अभी ज्यादातर स्थानीय लोग ही तुंबा आर्ट खरीदकर ले जाते हैं। इसके अलावा प्रशासन की ओर से भी उनके उत्पादों को बाहर के बाजारों तक पहुंचाने में मदद की जाती है। उन्होंने बताया कि काष्ठ कला का काम तो वे पहले से करती आ रही हैं, जबकि तुंबा आर्ट उन्होंने हाल ही में शुरू किया है और अभी तक उन्होंने किसी को इसका प्रशिक्षण नहीं दिया है।

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