ताड़ के पत्तों पर उकेरी पारंपरिक कला, ओडिशा की बिस्मिता पाल ने खड़ा किया 60 लाख का कारोबार ओडिशा के किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली 30 वर्षीय बिस्मिता पाल ने पारंपरिक पटचित्र कला के दम पर सालाना 60 लाख रुपये के टर्नओवर वाला सफल व्यवसाय खड़ा किया है। ओडिशा के एक साधारण किसान परिवार में जन्मी बिस्मिता पाल ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर पारंपरिक हस्तकला के क्षेत्र में एक अलग पहचान स्थापित की है। जब वह महज 20 वर्ष की थीं, तब उन्होंने ताड़ के पत्तों पर ओडिशा की सदियों पुरानी पटचित्र कला को उकेरना शुरू किया था। शुरुआत में गांव और समाज के लोगों को उनका यह काम समझ नहीं आया और कई लोगों ने उनका उपहास भी उड़ाया। परिवार की पृष्ठभूमि खेती-किसानी से जुड़ी होने के कारण लोग यह मानते थे कि वह इस क्षेत्र में कोई खास मुकाम हासिल नहीं कर पाएंगी। तमाम सामाजिक संशयों और उपहास को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपनी कला साधना जारी रखी और अपने शिल्प को लगातार निखारती रहीं। शुरुआती संघर्ष और कला को निखारने का सफर पटचित्र निर्माण की यात्रा धैर्य और बारीक कारीगरी से भरी होती है। अपने शुरुआती दिनों में बिस्मिता को ताड़ के पत्तों पर एक एकल पटचित्र तैयार करने में 2 से 3 महीने का लंबा वक्त लग जाता था। इस जटिल माध्यम पर काम करने के लिए अत्यधिक एकाग्रता और समय की आवश्यकता होती थी। पिछले 10 वर्षों के निरंतर अभ्यास और गहरे अनुभव के बाद उन्होंने अपनी कार्यकुशलता में उल्लेखनीय सुधार किया है। अब वह एक सामान्य पटचित्र को मात्र 20 से 30 दिनों के भीतर पूरा कर लेती हैं। समय के साथ उनके काम की गति और गुणवत्ता दोनों में बड़ा बदलाव आया है। ताड़ के पत्तों और टसर सिल्क पर प्राकृतिक रंगों का जादू वर्तमान में 30 वर्ष की हो चुकीं बिस्मिता मुख्य रूप से दो प्रमुख माध्यमों पर पेंटिंग बनाती हैं, जिनमें सूखे ताड़ के पत्ते और टसर सिल्क शामिल हैं। उनकी इन कलाकृतियों में ओडिशा के आराध्य भगवान जगन्नाथ पुरी की छवियां और पारंपरिक धार्मिक कथाएं प्रमुखता से उकेरी जाती हैं। इन चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी प्रक्रिया पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है। इनमें किसी भी प्रकार के रासायनिक रंग का प्रयोग नहीं होता, बल्कि पूरी तरह से प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। कलाकृतियों में की जाने वाली महीन रेखाएं और बारीक नक्काशी ग्राहकों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। उनके संग्रह में कुछ पेंटिंग्स 20 से 30 दिनों में बनती हैं, जबकि अधिक विस्तृत और बड़े आकार के चित्रों को पूरा करने में करीब 1 महीने का समय लगता है। प्रदर्शनियों और ऑर्डर्स के दम पर 60 लाख का टर्नओवर बिस्मिता की कलाकृतियों की शुरुआती कीमत 3,000 रुपये है, जबकि उनके अधिकांश उत्पाद 3,000 से 4,000 रुपये के मूल्य दायरे में बिकते हैं। भारत सरकार द्वारा देश भर में आयोजित होने वाले शिल्प मेलों और प्रदर्शनियों में उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए स्टॉल आवंटित किए जाते हैं। इन दिनों वह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित एक सरकारी प्रदर्शनी में हिस्सा लेने पहुंची हुई हैं, जहां लोग उनकी कलाकृतियों को करीब से देखकर सराह रहे हैं। ग्राहकों की व्यापक मांग के चलते उनके कारोबार ने तेज गति पकड़ी है। पहले जहां उनका सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपये के आसपास था, वहीं अब वह दोगुना होकर 60 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से बढ़ती मांग ओडिशा सहित देश भर से बिस्मिता को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही माध्यमों से कलाकृतियों के ऑर्डर प्राप्त होते हैं। गृह सज्जा के शौकीन लोग और कला प्रेमी इन पारंपरिक शिल्पों की बड़े पैमाने पर खरीदारी करते हैं। विशेष रूप से जब त्योहारों का सीजन आता है, तब घरों को सजाने और उपहार देने के लिए लोग उनके डिज़ाइनों को प्राथमिकता देते हैं। सरकारी प्रदर्शनियों के मंच और डिजिटल माध्यम के संगम ने उनकी पारंपरिक कला को एक लाभदायक और आत्मनिर्भर उद्यम में तब्दील कर दिया है। इसका आप पर असर पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक बाजार और सरकारी प्रदर्शनियों से जोड़कर ग्रामीण कारीगर करोड़ों का संगठित कारोबार खड़ा कर सकते हैं। • भारत में: देश भर के कला प्रेमियों को घर बैठे ताड़ के पत्तों और टसर सिल्क पर बने प्रामाणिक पटचित्र 3,000 से 4,000 रुपये में खरीदने का अवसर मिलता है। इसके जरिए खरीदार बिना बिचौलियों के सीधे पारंपरिक कारीगरों से जुड़कर स्वदेशी कला को बढ़ावा दे सकते हैं। • ओडिशा में: राज्य के पारंपरिक कलाकारों और किसान परिवारों के युवाओं को हस्तकला के जरिए सम्मानजनक आजीविका और लाखों का टर्नओवर हासिल करने का नया रास्ता दिखता है। स्थानीय कारीगर सरकारी प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए अपने पारंपरिक शिल्प को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकते हैं। • कला प्रेमियों के लिए: त्योहारों के सीजन में घर की सजावट के लिए पूर्णतः प्राकृतिक रंगों से बनी पर्यावरण-अनुकूल कलाकृतियां सीधे उपलब्ध होती हैं। इससे न केवल घर को पारंपरिक स्वरूप मिलता है बल्कि प्राकृतिक शिल्पकला का संरक्षण भी होता है। • ग्रामीण उद्यमियों के लिए: कम पूंजी में शुरू होने वाले पारंपरिक हुनर को धैर्य और निरंतरता से एक बड़े उद्यम में बदला जा सकता है। कारीगर अपने काम की गति और वितरण माध्यमों को सुधारकर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ बिस्मिता पाल की सफलता का मुख्य कारण पारंपरिक शिल्प में दक्षता हासिल करना, अपनी उत्पादन क्षमता में सुधार लाना और बिक्री के लिए सरकारी मेलों तथा ऑनलाइन माध्यमों का सही इस्तेमाल करना है। • कुशलता और समय प्रबंधन में सुधार: जिस पटचित्र को बनाने में पहले 2 से 3 महीने का समय लगता था, 10 साल के अनुभव के बाद बिस्मिता ने उसे 20 से 30 दिन में पूरा करना सीखा। इस तेज उत्पादन क्षमता के कारण वह ज्यादा ग्राहकों के ऑर्डर्स समय पर पूरे करने में सक्षम हुईं। • सरकारी प्रदर्शनियों का मंच मिलना: भारत सरकार द्वारा आयोजित देशव्यापी प्रदर्शनियों में स्टॉल मिलने से उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर सीधे खरीदार मिले। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में लोगों ने उनके काम को प्रत्यक्ष रूप से देखा और हाथों-हाथ खरीदारी की। • प्राकृतिक रंगों और भगवान जगन्नाथ की थीम का आकर्षण: पूरी तरह हाथों से तैयार नक्काशी और प्राकृतिक रंगों के प्रयोग ने उनकी पेंटिंग्स को विशिष्ट बना दिया। भगवान जगन्नाथ पुरी की प्रतिमा वाले डिज़ाइनों ने सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के कारण खरीदारों को अत्यधिक आकर्षित किया। • त्योहारी मांग और दोहरे बिक्री माध्यम: उन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से बिक्री शुरू की, जिससे ओडिशा के बाहर भी ग्राहक जुड़े। त्योहारों के मौसम में घर सजाने के लिए लोगों द्वारा की जाने वाली भारी खरीदारी ने उनके टर्नओवर को 30 लाख से बढ़ाकर 60 लाख रुपये तक पहुंचा दिया। सवाल-जवाब 1. बिस्मिता पाल कौन हैं और वह किस कला से जुड़ी हैं? बिस्मिता पाल ओडिशा की एक 30 वर्षीय पारंपरिक कलाकार और उद्यमी हैं, जो ताड़ के पत्तों और टसर सिल्क पर पटचित्र पेंटिंग बनाती हैं। 2. बिस्मिता पाल ने यह कला किस उम्र में शुरू की थी? उन्होंने 20 वर्ष की उम्र में ताड़ के पत्तों पर पटचित्र बनाना शुरू किया था। 3. वर्तमान में उनके कारोबार का वार्षिक टर्नओवर कितना है? उनका वार्षिक टर्नओवर पहले करीब 30 लाख रुपये था, जो अब बढ़कर 60 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। 4. उनकी कलाकृतियों की शुरुआती कीमत क्या है? उनकी कलाकृतियों की शुरुआती कीमत 3,000 रुपये है और ज्यादातर उत्पाद 3,000 से 4,000 रुपये के दायरे में बिकते हैं। 5. एक पटचित्र को तैयार करने में उन्हें कितना समय लगता है? शुरुआत में उन्हें 2 से 3 महीने लगते थे, लेकिन 10 साल के अनुभव के बाद अब वह 20 से 30 दिन में इसे पूरा कर लेती हैं, जबकि बड़ी पेंटिंग में लगभग 1 महीने का वक्त लगता है। 6. उनकी पेंटिंग्स में किस तरह के रंगों और विषयों का इस्तेमाल होता है? उनकी पेंटिंग्स पूरी तरह हाथों से और प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती हैं, जिनमें भगवान जगन्नाथ पुरी की प्रतिमा प्रमुखता से उकेरी जाती है। 7. वह अपने उत्पाद किन माध्यमों से बेचती हैं? वह अपने उत्पाद भारत सरकार द्वारा आयोजित देशव्यापी प्रदर्शनियों के स्टॉल के अलावा ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेचती हैं। प्रेरणा और सबक ओडिशा के एक किसान परिवार से निकलकर 60 लाख का हस्तशिल्प कारोबार खड़ा करने वाली बिस्मिता पाल का सफर हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो सामाजिक संशयों के बीच अपने हुनर पर भरोसा करता है। • लोगों के उपहास से न घबराएं: जब शुरुआत में लोगों ने बिस्मिता की कला का मजाक उड़ाया और उन्हें कमतर आंका, तब उन्होंने बहस करने के बजाय अपनी साधना जारी रखी। दूसरों की शंकाओं का सबसे सटीक जवाब अपनी सफलता से दिया जा सकता है। • धीमी शुरुआत को निरंतरता से निखारें: शुरुआती दौर में एक पेंटिंग बनाने में 2 से 3 महीने लगते थे, लेकिन 10 साल के लगातार अभ्यास ने उस समय को घटाकर 20 से 30 दिन कर दिया। हुनर और दक्षता रातोंरात नहीं आती, बल्कि वर्षों के दैनिक अभ्यास से सधती है। • अपनी पारंपरिक जड़ों को अपनी ताकत बनाएं: बिस्मिता ने किसी आधुनिक ट्रेंड के पीछे भागने के बजाय अपनी मिट्टी की प्राचीन पटचित्र कला और प्राकृतिक रंगों को अपनाया। स्थानीय और पारंपरिक विधाएं भी सही दिशा मिलने पर करोड़ों का बाजार बना सकती हैं। • सरकारी अवसरों और नए मंचों का पूरा लाभ उठाएं: उन्होंने केवल स्थानीय स्तर पर सीमित रहने के बजाय सरकारी प्रदर्शनियों और ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग कर अपने बाजार का विस्तार किया। मौकों को पहचानकर बाहर निकलना ही एक कलाकार को सफल उद्यमी बनाता है। https://trendkia.com/success-stories/tara-ke-patton-para-ukeri-parnparika-kala-odisha-ki-bismita-pal-ne-khara-kiya-60-lakha-ka-karobara-47790 TrendKia — Har trend, sabse pehle.