उधमपुर में घायल पिता का सहारा बनीं बंजीत और देविंदर, बस और ऑटो चलाकर संभाल रहीं घर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर में पिता के चोटिल होने के बाद बंजीत कौर और देविंदर कौर ने बस और ऑटो की कमान संभाल ली है, जहां वे काम के साथ पढ़ाई जारी रखकर पूरे परिवार का खर्च उठा रही हैं। जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले की दो सगी बहनों ने पारिवारिक संकट के समय ऐसी मिसाल कायम की है जो सामाजिक सोच को नई दिशा दे रही है। जब परिवार के मुखिया किसी गंभीर हादसे के चलते कमाने की स्थिति में नहीं रहे, तब उनकी दो बेटियों ने घर की आर्थिक गाड़ी को रुकने नहीं दिया। बंजीत कौर और देविंदर कौर नाम की ये दो बहनें आज सड़कों पर स्कूल बस और तिपहिया ऑटो चलाकर न केवल अपने घर का खर्च उठा रही हैं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। समाज की रूढ़िवादी धारणाओं को दरकिनार करते हुए दोनों बहनों ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत और हौसला किसी जेंडर के दायरे में बंधा नहीं होता। पिता के साथ हुआ हादसा और घर पर गहराया संकट बंजीत और देविंदर का परिवार सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता है। उनके पिता स्कूल बस चलाकर और दिन के बाकी समय में ऑटो रिक्शा चलाकर पूरे परिवार का भरण-पोषण करते थे। पिता की यह दूरदर्शिता थी कि उन्होंने अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले ही बस और ऑटो दोनों की ड्राइविंग सिखा दी थी। उनका स्पष्ट मानना था कि बेटियों को किसी भी परिस्थिति में दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और मुश्किल वक्त आने पर वे अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी हो सकें। लेकिन कुछ समय पहले अचानक एक अप्रिय घटना घटी। सीढ़ियों से उतरते वक्त पिता का संतुलन बिगड़ गया और वे नीचे गिर पड़े। इस गंभीर हादसे में उनके एक बाजू में गहरी चोट आई, जिसके चलते उनका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। हाथ में आई इस चोट के कारण डॉक्टरों और शारीरिक कमजोरी ने उन्हें भारी स्टेयरिंग थामने और गियर बदलने से रोक दिया। परिवार के पास आय का कोई दूसरा जरिया नहीं था, जिससे रोजमर्रा के घरेलू खर्च, दवाइयों और राशन का गहरा संकट खड़ा हो गया। बेटियों ने आगे बढ़कर थामी गाड़ियों की कमान घर में अचानक आए इस आर्थिक संकट के सामने दोनों बहनों ने हिम्मत नहीं हारी। लाचारी में बैठने के बजाय बंजीत कौर और देविंदर कौर ने तत्काल फैसला लिया कि वे अपने पिता के पहियों को रुकने नहीं देंगी। पिता द्वारा सिखाई गई ड्राइविंग की तालीम को उन्होंने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। सुबह के समय जब स्कूली बच्चों को स्कूल पहुंचाना होता है, तो वे स्कूल बस की स्टेयरिंग संभालती हैं। इसके बाद दिन के समय जब आम सवारियों की आवाजाही होती है, तब वे शहर की सड़कों पर ऑटो चलाकर परिवार के लिए पैसे कमाती हैं। काम के बीच किताबों से नाता नहीं तोड़ा भारी वाहनों को चलाने और दिनभर सड़कों की धूप-धूल झेलने के बावजूद इन दोनों बहनों ने अपनी शिक्षा को पीछे नहीं छूटने दिया। उन्होंने अपने दैनिक जीवन में काम और पढ़ाई के बीच गजब का संतुलन बनाया है। जब वे ऑटो स्टैंड पर या स्कूल के बाहर अगली सवारी अथवा ट्रिप का इंतजार करती हैं, तब वे खाली समय गपशप में बर्बाद नहीं करतीं। उस दौरान उनके हाथों में किताबें होती हैं। वे स्टेयरिंग के पीछे बैठकर ही अपने सिलेबस के पन्ने पलटती हैं और परीक्षा की तैयारी करती हैं। उनका पूरा दिन इसी तरह काम और पढ़ाई के दोहरे संघर्ष के बीच बीतता है। सामाजिक तानों और घूरती नजरों की परवाह नहीं आमतौर पर छोटे शहरों में महिलाओं को व्यावसायिक बस या ऑटो चलाते देखना आम नहीं माना जाता। शुरुआत में जब बंजीत और देविंदर ने ऑटो स्टैंड पर कदम रखा, तो लोगों ने उन्हें अचरज और घूरती नजरों से देखा। ऑटो स्टैंड पर खड़े अन्य चालकों और राहगीरों की ओर से तरह-तरह की फब्तियां और बातें भी सुनने को मिलीं। समाज का एक तबका हमेशा ऐसे कामों को महिलाओं के दायरे से बाहर मानता आया है। हालांकि इन दोनों बहनों ने इन तानों को अपने हौसले के आगे कभी रुकावट नहीं बनने दिया। उनका दृष्टिकोण बिल्कुल साफ और व्यावहारिक है। उनका कहना है कि जब परिवार पर मुसीबत आई थी, तब कोई दूसरा उनकी जरूरतें पूरी करने या चूल्हा जलाने नहीं आया था। ऐसे में जो लोग घर का खर्च नहीं चला सकते, उनकी बातों और तानों पर ध्यान देकर अपना रास्ता रोकने का कोई औचित्य नहीं है। इसी मजबूत इरादे के साथ वे हर दिन अपने काम पर निकलती हैं। चार बहनों का परिवार और भविष्य की तैयारी इस परिवार में कुल चार बेटियां हैं। पिता ने अपनी मेहनत से दो बड़ी बेटियों की शादी पहले ही संपन्न करा दी थी। अब घर में माता-पिता के साथ बंजीत और देविंदर ही रह रही हैं। वे न सिर्फ अपने घायल माता-पिता की देखभाल कर रही हैं और घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल रही हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अपनी शादी के लिए भी बचत कर रही हैं। दोनों बहनों का साफ कहना है कि वे अपने माता-पिता को कभी इस बात का मलाल नहीं होने देंगी कि उनके घर में कोई बेटा नहीं है। उन्होंने अपनी इच्छा और जिम्मेदारी से यह कर्तव्य अपने कंधों पर उठाया है और वे इसे पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। इसका आप पर असर उधमपुर की दो बहनों की यह कहानी भारतीय समाज में बेटियों की भूमिका, पारिवारिक आत्मनिर्भरता और संकट प्रबंधन को लेकर एक ठोस संदेश देती है। • भारत में: यह घटना उन परिवारों के लिए मार्गदर्शक है जो बेटियों को केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित मानते हैं। अपनी बेटियों को पहले से व्यावहारिक कौशल और ड्राइविंग सिखाकर कोई भी परिवार आपातकालीन संकटों से सुरक्षित रह सकता है। • उधमपुर में: स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक परिवहन स्टैंड पर महिलाओं की उपस्थिति सामान्य होने से अन्य युवतियों के लिए भी रास्ते खुलेंगे। इससे शहर के भीतर कामकाजी युवतियों के प्रति सामाजिक नजरिया अधिक सम्मानजनक और सुरक्षित बनेगा। • पारिवारिक वित्तीय सुरक्षा: एक ही सदस्य पर पूरी कमाई का बोझ होने के बजाय परिवार के अन्य सदस्यों का हुनरमंद होना वित्तीय संकट से बचाता है। जब अचानक कमाने वाला व्यक्ति चोटिल हो जाए, तो हुनरमंद बेटियां परिवार को कर्ज में डूबने से बचा सकती हैं। • शिक्षा और काम का तालमेल: यह उदाहरण साबित करता है कि घरेलू जिम्मेदारियां संभालने के लिए पढ़ाई छोड़ना अनिवार्य नहीं होता। सही समय प्रबंधन के जरिए काम के खाली पलों का इस्तेमाल उच्च शिक्षा जारी रखने में किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ परिवार पर यह संकट अचानक हुए एक घरेलू हादसे के कारण खड़ा हुआ, जिसने प्राथमिक कमाने वाले सदस्य को पूरी तरह असहाय कर दिया था। • सीढ़ियों से गिरना: परिवार के पिता सीढ़ियों से उतरते वक्त संतुलन खो बैठे और नीचे गिर पड़े, जिससे उनके एक बाजू में गहरी चोट आ गई। इस चोट के कारण वे बस और ऑटो का स्टेयरिंग घुमाने और शारीरिक मेहनत करने में असमर्थ हो गए। • पहले से दी गई ड्राइविंग तालीम: पिता ने अपने स्वस्थ रहते ही दोनों बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने की नीयत से बस और ऑटो चलाना सिखाया था। इसी पूर्व तैयारी की वजह से संकट के तुरंत बाद बेटियां बिना किसी देरी के सड़क पर वाहन उतार सकीं। • कमाई का एकमात्र साधन: परिवार की आय केवल बस और ऑटो की दैनिक आवाजाही पर टिकी थी। काम बंद होने का मतलब सीधे घर का चूल्हा और राशन बंद होना था, जिसने बेटियों को फौरन स्टेयरिंग संभालने पर मजबूर किया। सवाल-जवाब 1. बंजीत कौर और देविंदर कौर किस शहर की रहने वाली हैं? बंजीत कौर और देविंदर कौर जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले की रहने वाली हैं। 2. दोनों बहनों को बस और ऑटो चलाने की जरूरत क्यों पड़ी? सीढ़ियों से गिर जाने के कारण उनके पिता के बाजू में गहरी चोट लग गई थी, जिससे वे वाहन चलाने में असमर्थ हो गए थे और परिवार का खर्च चलाने के लिए बेटियों को कमान संभालनी पड़ी। 3. क्या दोनों बहनें काम के साथ-साथ पढ़ाई भी कर रही हैं? हां, दोनों बहनें काम के बीच जब भी समय मिलता है या सवारियों का इंतजार करती हैं, तब किताबें पढ़कर अपनी पढ़ाई जारी रखती हैं। 4. परिवार में कुल कितनी बहनें हैं? परिवार में कुल चार बेटियां हैं, जिनमें से दो बड़ी बेटियों की शादी पिता पहले ही करा चुके हैं। 5. दोनों बहनों को ड्राइविंग किसने सिखाई थी? उनके पिता ने उन्हें पहले ही आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बस और ऑटो चलाना सिखाया था। 6. ऑटो स्टैंड पर लोगों के तानों पर बहनों का क्या कहना है? बहनों का कहना है कि जब जरूरतें पूरी करने कोई नहीं आता, तो समाज के तानों और बातों पर ध्यान देने का कोई मतलब नहीं है। प्रेरणा और सबक बंजीत और देविंदर का यह संघर्ष दिखाता है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो, तो कोई भी काम छोटा नहीं होता और न ही कोई मजबूरी बड़ी होती है। • हुनर हमेशा काम आता है: पिता द्वारा सिखाई गई ड्राइविंग ने मुश्किल वक्त में परिवार को आर्थिक तबाही से बचा लिया। किसी भी व्यावहारिक हुनर को छोटा न समझें, संकट के समय वही सबसे बड़ी ढाल बनता है। • सामाजिक तानों से ऊपर उठें: समाज क्या कहेगा, इसकी परवाह किए बिना अपनी जरूरत और ईमानदारी की कमाई पर ध्यान देना चाहिए। जब परिवार मुश्किल में होता है तो ताने देने वाले मदद के लिए आगे नहीं आते। • समय प्रबंधन से हर सपना संभव: व्यस्त दिनचर्या और कठिन शारीरिक काम के बीच भी पढ़ाई के लिए समय निकाला जा सकता है। इच्छाशक्ति हो तो काम के बीच खाली मिले कुछ मिनट भी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त होते हैं। • बेटियों का दायित्वबोध: संतानों की जिम्मेदारी सिर्फ माता-पिता पर आश्रित रहने की नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उनका मजबूत सहारा बनने की भी होती है। https://trendkia.com/success-stories/udhampur-men-ghayala-pita-ka-sahara-banin-banjeet-aura-devinder-basa-aura-to-chalakara-snbhala-rahin-ghara-35403 TrendKia — Har trend, sabse pehle.