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  "type": "article",
  "title": "उत्तर प्रदेश के इटियाथोक में मचान तकनीक से तोरई उगाकर लाखों बना रहे किसान शत्रुघ्न",
  "summary": "गोंडा जिले के इटियाथोक विकासखंड निवासी किसान शत्रुघ्न ने सीमित पढ़ाई और आर्थिक तंगी के बावजूद मचान विधि से तोरई की उन्नत खेती कर अपने पूरे परिवार के पालन-पोषण का मजबूत जरिया तैयार कर लिया है।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित विकासखंड इटियाथोक के गांवों में अब खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है। यहां के किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नकदी फसलों और सब्जियों की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसी क्षेत्र के रहने वाले प्रगतिशील किसान शत्रुघ्न ने अपनी लगभग एक बीघा जमीन पर तोरई की बुवाई की है। सही समय पर वैज्ञानिक देखभाल और बेहतर प्रबंधन के बल पर उनकी फसल में इस समय शानदार पैदावार देखने को मिल रही है। सब्जियों की इस लाभदायक खेती के जरिए वे न केवल अपना व्यवसाय चला रहे हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण भी बहुत सम्मानजनक तरीके से कर रहे हैं।\n\nमचान विधि और फसल की देखभाल की प्रक्रिया\nकिसान शत्रुघ्न ने तोरई की बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय मचान विधि का चयन किया है। इस तकनीक के तहत खेत में बांस और तारों की मदद से एक मजबूत ढांचा तैयार किया जाता है। जैसे-जैसे तोरई की बेलें बड़ी होती हैं, उन्हें इस मचान पर सहारा देकर ऊपर चढ़ा दिया जाता है। मचान पर फैलने के कारण बेलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे फल सड़ने या खराब होने से बच जाते हैं। इसके साथ ही फलों का आकार, चमक और गुणवत्ता भी बेहद आकर्षक बनी रहती है, जिससे बाजार में इनकी मांग बनी रहती है।\n\nअपनी इस फसल की देखभाल के लिए शत्रुघ्न रोज सुबह से ही खेत में सक्रिय हो जाते हैं। बीज की बुवाई से लेकर फसल तैयार होने तक हर चरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। समय-समय पर पौधों की सिंचाई, नियमित निराई-गुड़ाई और आवश्यकतानुसार खाद का संतुलन बनाए रखना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। पौधों में किसी भी तरह के रोग या कीट का प्रकोप न हो, इसके लिए वे फसल की नियमित निगरानी करते हैं। इस व्यवस्थित देखभाल का नतीजा यह है कि बेलों में तोरई की भरमार है और पैदावार काफी अच्छी हो रही है।\n\nदूसरे शहर की नौकरी छोड़ गांव में बनाया रोजगार\nशत्रुघ्न की जीवन यात्रा संघर्षों से भरी रही है। पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे बचपन में पढ़ाई-लिखाई पूरी नहीं कर सके थे। परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और आर्थिक तंगी दूर करने के लिए उन्हें अपना घर छोड़कर दूसरे शहर जाना पड़ा, जहां उन्होंने कुछ समय तक नौकरी की। हालांकि, शहर में काम करने के दौरान उन्हें यह अहसास हुआ कि पराए शहर में मेहनत करने से कहीं बेहतर अपने गांव में रहकर अपनी जमीन पर पसीना बहाना है। इसके बाद कुछ कारणों से उन्हें गांव वापस लौटना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने अपनी कृषि भूमि को ही स्थायी रोजगार का साधन बनाने का संकल्प लिया।\n\nलागत और कमाई का गणित\nतोरई की खेती में लगने वाले खर्च और संभावित मुनाफे के बारे में शत्रुघ्न बताते हैं कि एक बीघा खेत में तोरई की फसल तैयार करने में कुल 15 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इस कुल लागत में उन्नत किस्म के बीज खरीदने, खेत की जुताई, खाद, समय पर सिंचाई और मचान निर्माण समेत खेत की देखरेख की पूरी राशि शामिल होती है। शुरुआती चरण में लगभग 10 हजार रुपये की लागत से भी काम शुरू किया जा सकता है।\n\nशत्रुघ्न के अनुसार, यदि मौसम अनुकूल बना रहे, फसल में कोई बीमारी न लगे और स्थानीय मंडी में तोरई के उचित दाम मिल जाएं, तो एक बीघा जमीन से ही लाखों रुपये की शुद्ध कमाई की जा सकती है। सब्जियों की खेती में सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसमें तुड़ाई लगातार कई हफ्तों तक चलती है, जिससे किसान के हाथ में नियमित रूप से नकद पैसा आता रहता है।\n\nपारंपरिक खेती छोड़कर सब्जी उगाने का संदेश\nअपने अनुभव के आधार पर शत्रुघ्न का मानना है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए सब्जियों की खेती एक वरदान की तरह है। वे क्षेत्र के अन्य किसानों को भी सलाह देते हैं कि केवल गेहूं या धान जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें अपनी जमीन के कुछ हिस्से पर सब्जियों की खेती जरूर करनी चाहिए। कम जमीन वाले किसान भी यदि सही समय पर सिंचाई, खाद और निराई-गुड़ाई का ध्यान रखें और मचान तकनीक जैसी आधुनिक प्रणालियों को अपनाएं, तो वे अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं। आज तोरई की यह सफल खेती उनके परिवार की आजीविका का सबसे मजबूत आधार बन चुकी है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: छोटी जोत वाले किसानों के लिए पारंपरिक खाद्यान्न फसलों से हटकर मचान विधि द्वारा नकदी सब्जियों की खेती करना आमदनी दोगुनी करने का एक व्यावहारिक मॉडल पेश करता है।\n\nउत्तर प्रदेश (गोंडा) में: इटियाथोक क्षेत्र के स्थानीय किसान कम लागत और सीमित भूमि में तोरई जैसी सब्जियों की उन्नत खेती अपनाकर स्थानीय मंडियों से बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गोंडा के किसान शत्रुघ्न किस विधि से तोरई की खेती कर रहे हैं?\nशत्रुघ्न अपने खेत में बांस और तारों की मदद से मचान तैयार करके तोरई की खेती कर रहे हैं।\n\n2. एक बीघा जमीन में तोरई की फसल लगाने में कितनी लागत आती है?\nएक बीघा खेत में बीज, खाद, सिंचाई और देखभाल समेत कुल 15 से 20 हजार रुपये तक की लागत आती है।\n\n3. शत्रुघ्न ने दूसरे शहर की नौकरी छोड़कर खेती क्यों चुनी?\nघर की आर्थिक तंगी और कम पढ़ाई के कारण वे पहले शहर में नौकरी करते थे, लेकिन गांव लौटकर उन्होंने अपनी जमीन पर खेती को ही बेहतर रोजगार माना।\n\n4. तोरई की मचान विधि से खेती करने का क्या लाभ है?\nमचान पर बेल फैलने से फलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे फल सड़ने से बचते हैं और उनकी गुणवत्ता तथा बाजार भाव बेहतर मिलते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nप्रेरणा और महत्वपूर्ण सीख:\n\n• अपनी जमीन पर आत्मनिर्भरता: बाहर शहरों में मजदूरी करने के बजाय अपने गांव में ही उपलब्ध संसाधनों और भूमि का सही इस्तेमाल कर स्थायी रोजगार बनाया जा सकता है।\n• तकनीक से पैदावार में सुधार: पारंपरिक तरीकों की जगह मचान विधि जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने से फसल की गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों बढ़ते हैं।\n• समयबद्ध फसल प्रबंधन: सिंचाई, निराई-गुड़ाई और खाद का सही समय पर प्रयोग फसल को नुकसान से बचाता है और पैदावार अधिकतम करता है।\n• विविधीकरण से आर्थिक सुरक्षा: केवल गेहूं-धान पर निर्भर न रहकर सब्जियों जैसी नकदी फसलों को अपनाने से किसान को लगातार नकद आय मिलती रहती है।",
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  "category": "सक्सेस स्टोरी",
  "publishedAt": "2026-08-16",
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    "तोरई की खेती",
    "मचान विधि",
    "गोंडा समाचार",
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