# वृंदावन यात्रा के बाद बचे हुए सामान से बनाया था कान्हा जी का पहला झूला, सहारनपुर के अंकुर कुमार की अब महीने की कमाई लाखों में

> सहारनपुर के अंबेहटा पीर निवासी अंकुर कुमार ने फर्नीचर के बचे हुए रॉ मटेरियल से कान्हा जी के लिए झूला बनाना शुरू किया था। आज उनका यह घरेलू प्रयोग एक बड़े हस्तशिल्प कारोबार में बदल चुका है, जिसकी मांग दिल्ली और ऋषिकेश तक फैली हुई है।

**Type:** article · **Category:** सक्सेस स्टोरी · **Published:** 2026-08-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/success-stories/vrindavan-yatra-ke-bada-bache-hue-samana-se-banaya-tha-kanha-ji-ka-pahala-jhula-saharanpur-ke-ankur-kumar-ki-aba-mahine-ki-kamai-l-22794 · **Language:** Hindi
**Tags:** सहारनपुर, अंकुर कुमार, कान्हा जी के झूले, लड्डू गोपाल, हस्तशिल्प व्यापार, जन्माष्टमी, उत्तर प्रदेश समाचार

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार आते ही देशभर के बाजारों में लड्डू गोपाल के परिधान, झूले, सिंहासन और सजावटी सामानों की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित अंबेहटा पीर कस्बे के निवासी अंकुर कुमार के लिए यह पर्व भक्ति के साथ-साथ एक बहुत बड़ी व्यावसायिक सफलता का प्रतीक बन चुका है। कभी अपने पिता के साथ पारंपरिक लकड़ी के फर्नीचर के निर्माण में जूझ रहे अंकुर ने अपने कारखाने में पड़े बेकार रॉ मटेरियल से कान्हा जी का एक छोटा सा झूला तैयार किया था। उस एक प्रयोग ने उनके परिवार के आर्थिक हालातों को पूरी तरह बदलकर रख दिया। आज उनका परिवार लड्डू गोपाल के सिंहासन, झूले और बेड बनाकर हर महीने लाखों रुपये की कमाई कर रहा है।

## पारंपरिक फर्नीचर के कारोबार में आर्थिक तंगी और वृंदावन की यात्रा
अंकुर कुमार और उनके पिता कई वर्षों तक सामान्य घरेलू फर्नीचर बनाने का काम करते थे। हालांकि इस काम से होने वाली आय इतनी कम थी कि परिवार का दैनिक खर्च चलाना भी चुनौतीपूर्ण हो गया था। अंकुर का परिवार शुरू से ही भगवान श्रीकृष्ण का परम भक्त रहा है। लगभग सात साल पहले उनका पूरा परिवार धार्मिक दर्शन के लिए वृंदावन गया था। वहां से लौटते समय वे अपने साथ कान्हा जी (लड्डू गोपाल) की एक सुंदर मूर्ति घर लेकर आए। घर में मूर्ति स्थापित करने के बाद उनके सामने कान्हा जी के बैठने और विश्राम के लिए उचित व्यवस्था करने का प्रश्न उठा। बाजार से महंगा सिंहासन खरीदने के बजाय अंकुर ने अपनी कारपेंट्री कला का उपयोग करने का निर्णय लिया।

## बचे हुए रॉ मटेरियल से पहला झूला और पड़ोसियों की मांग
अंकुर ने अपने फर्नीचर कारखाने में बचे हुए लकड़ी के टुकड़ों, प्लाईवुड और कपड़े के कतरनों को इकट्ठा किया। इन सामान्य सामग्रियों का उपयोग करके उन्होंने अपने घर के कान्हा जी के लिए एक बेहद आकर्षक और मजबूत झूला तैयार किया। जब आसपास के पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने उनके घर आकर वह हस्तनिर्मित झूला देखा, तो वे उसकी बारीकी और सुंदरता से बहुत प्रभावित हुए। जल्द ही कुछ पड़ोसियों ने अंकुर से अपने कान्हा जी के लिए भी वैसा ही झूला बनाने का अनुरोध किया। अंकुर ने खुशी-खुशी उनके लिए भी झूले तैयार कर दिए। इसके बाद मुंह जबानी प्रचार के माध्यम से यह बात धीरे-धीरे पूरे इलाके में फैल गई और आसपास के लोगों से झूले तथा सिंहासन के ऑर्डर आने शुरू हो गए।

## पुराना काम बंद कर स्थापित किया विशेष हस्तशिल्प व्यापार
लड्डू गोपाल के आसनों और झूलों की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए अंकुर और उनके परिवार ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने घाटे में चल रहे अपने सामान्य फर्नीचर के काम को पूरी तरह बंद कर दिया और अपना पूरा ध्यान कान्हा जी के बेड, झूलों और सिंहासनों के निर्माण पर केंद्रित कर दिया। पिछले छह वर्षों से वे नियमित रूप से इस काम को व्यावसायिक स्तर पर अंजाम दे रहे हैं। आज स्थिति यह है कि त्योहारी सीजन में मांग इतनी अधिक हो जाती है कि परिवार के सभी सदस्य मिलकर भी दिन-रात काम करके ऑर्डर पूरे नहीं कर पाते। सहारनपुर के अलावा उनके बनाए सामान की आपूर्ति ऋषिकेश, दिल्ली, करनाल और पड़ोसी राज्यों के विभिन्न शहरों में की जाती है।

## उत्पादों की विविधता, सामग्री और मूल्य दायरा
अंकुर कुमार द्वारा तैयार किए जाने वाले कान्हा जी के सिंहासनों और झूलों की श्रेणी 7 इंच से लेकर 3 से 4 फीट तक के विशाल आकारों में उपलब्ध है। वे ग्राहकों की पसंद और बजट के अनुसार कई अलग-अलग डिजाइनों में इन सामानों का निर्माण करते हैं। इन उत्पादों को तैयार करने के लिए मुख्य रूप से अच्छी गुणवत्ता की लकड़ी, प्लाईवुड, रंग-बिरंगे कपड़ों, सजावटी शीशों (दर्पण) और बिडिंग सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इनकी शुरुआती कीमत मात्र 150 रुपये से शुरू होकर 5,000 से 6,000 रुपये तक जाती है। जन्माष्टमी के सीजन से महीनों पहले ही अधिकांश स्टॉक की एडवांस बुकिंग हो जाती है, जिससे कारखाने में सामान तैयार होते ही तुरंत डिलीवर हो जाता है।

## इसका आप पर असर
यह खबर दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक कौशल और नवाचार के मेल से स्थानीय स्तर पर सफल स्वरोजगार खड़ा किया जा सकता है।

- **भारत में:** हस्तशिल्प और धार्मिक सजावटी सामानों के क्षेत्र में छोटे कारीगरों के लिए बड़े व्यावसायिक अवसर पैदा हो रहे हैं। त्योहारों के मौसम में स्वदेशी उत्पादों की मांग बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
- **उत्तर प्रदेश और सहारनपुर में:** सहारनपुर का लकड़ी उद्योग पारंपरिक फर्नीचर से आगे बढ़कर विशेष धार्मिक कलाकृतियों के क्षेत्र में नए बाजार तलाश रहा है। स्थानीय युवाओं के लिए अपनी पैतृक कला के माध्यम से बेहतर आजीविका कमाने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

## सवाल-जवाब

### 1. सहारनपुर के अंकुर कुमार कान्हा जी के लिए क्या-क्या बनाते हैं?
अंकुर कुमार और उनका परिवार कान्हा जी (लड्डू गोपाल) के लिए विशेष प्रकार के झूले, सिंहासन और बेड तैयार करते हैं।

### 2. इन झूलों और सिंहासनों की शुरुआती कीमत क्या है?
इन उत्पादों की शुरुआती कीमत 150 रुपये है और प्रीमियम डिजाइन के अनुसार यह 5,000 से 6,000 रुपये तक जाती है।

### 3. इन सामानों को बनाने के लिए किन सामग्रियों का उपयोग किया जाता है?
इनको तैयार करने के लिए लकड़ी, प्लाईवुड, सजावटी कपड़ा, शीशे (दर्पण) और बिडिंग सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

### 4. अंकुर कुमार के उत्पादों की मांग किन शहरों में सबसे अधिक है?
उनके बनाए सामान की भारी मांग ऋषिकेश, दिल्ली, करनाल और आसपास के विभिन्न राज्यों में रहती है।

## प्रेरणा और सबक
अंकुर कुमार की कहानी दर्शाती है कि सीमित संसाधनों और कठिनाइयों के बीच भी नए अवसरों का निर्माण किया जा सकता है।

- **बचे हुए संसाधनों का बेहतर उपयोग:** बेकार पड़े वेस्ट रॉ मटेरियल से पहला उत्पाद बनाकर उन्होंने कम लागत में नए विचार का परीक्षण किया।
- **ग्राहकों के फीडबैक पर त्वरित प्रतिक्रिया:** पड़ोसियों की मांग को पहचानकर उन्होंने पारंपरिक काम छोड़कर नए बाजार की ओर रुख किया।
- **विविधता और किफायती मूल्य निर्धारण:** 150 रुपये से लेकर 6,000 रुपये तक की रेंज रखकर उन्होंने हर वर्ग के ग्राहक को आकर्षित किया।

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