पश्चिमी चंपारण के उपेंद्र कुशवाहा ने ढाई लाख से शुरू किया था मशरूम का काम, आज सालाना टर्नओवर पहुंचा दो करोड़ रुपये पश्चिमी चंपारण के उपेंद्र कुशवाहा ने कोविड महामारी के दौरान नौकरी न मिलने पर मशरूम की खेती शुरू की और आज वह 2 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना टर्नओवर हासिल कर रहे हैं। बिहार के एक युवा उद्यमी ने आधुनिक खेती के क्षेत्र में सफलता की एक अनोखी इबारत लिखी है। पश्चिमी चंपारण के नौतन इलाके के रहने वाले 32 वर्षीय उपेंद्र कुशवाहा आज अपने क्षेत्र में मशरूम किंग के नाम से मशहूर हो चुके हैं। महज पांच साल पहले करीब 2.50 लाख रुपये की मामूली पूंजी के साथ बटन मशरूम की खेती शुरू करने वाले उपेंद्र ने आज अपने कारोबार को इस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि उनका सालाना टर्नओवर दो करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। एक बेरोजगार ग्रेजुएट से सफल कृषि उद्यमी बनने का उनका यह सफर वाकई कमाल का है। महामारी के संकट को बनाया अवसर कृषि क्षेत्र में बैचलर की डिग्री हासिल करने के बाद, उपेंद्र कुशवाहा नौकरी की तलाश में अपने घर लौटे थे। साल 2019 के आखिर में जब कोविड 19 महामारी की शुरुआत हुई, तो उनके बाहर जाकर नौकरी करने के सारे रास्ते बंद हो गए। इस संकट के समय उन्होंने हार मानने के बजाय अपने गांव में ही रहकर खुद का कोई काम शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने मशरूम उत्पादन को अपना जरिया बनाने की सोची, जिसमें कम समय और कम जगह में बेहतर कमाई की गुंजाइश थी। मशरूम की खेती शुरू करने से पहले उपेंद्र ने इसका बाकायदा प्रशिक्षण लिया ताकि वह बारीकियाँ समझ सकें। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने एक छोटी सी मड़ई में केवल 50 बैग लगाकर अपने काम की शुरुआत की। इस शुरुआती ढांचे और तैयारी में उनका करीब ढाई लाख रुपये का निवेश हुआ। चूंकि बटन मशरूम लगाने के लगभग 45 दिनों के भीतर फसल देने लगता है, इसलिए दो से तीन महीनों में ही उन्हें अपनी लागत और मुनाफे का गणित समझ में आ गया। मड़ई से पक्के प्लांट तक का सफर कारोबार में मुनाफा दिखने के बाद उपेंद्र ने अपने काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने मड़ई की जगह कंक्रीट के पक्के यूनिट्स का निर्माण कराया। जब उनका यह कारोबार 2.50 लाख रुपये से बढ़कर 50 लाख रुपये के टर्नओवर पर पहुंच गया, तब उन्होंने अपनी यूनिट्स की संख्या बढ़ाई और खुद मशरूम के स्पॉन बैग्स भी तैयार करने लगे। बेहतर गुणवत्ता और लगातार आपूर्ति की वजह से जिले भर के मशरूम व्यापारी उपेंद्र के साथ जुड़ते चले गए, जिससे उनके कारोबार को एक नई गति मिली। आज उपेंद्र को मशरूम के इस व्यवसाय में पांच साल से ज्यादा का समय हो चुका है और उनका सालाना टर्नओवर दो करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है। उन्होंने 1800 मशरूम बैग्स की क्षमता वाली लगभग 8 अत्याधुनिक यूनिट्स तैयार की हैं। इन यूनिट्स से हर 45 दिन का फसल चक्र पूरा होने पर लगभग 12 टन मशरूम की पैदावार होती है। अब उपेंद्र के मशरूम की मांग केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बिहार के विभिन्न जिलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक अपने उत्पाद की सप्लाई कर रहे हैं। इसका आप पर असर यह सफलता की कहानी दर्शाती है कि कैसे आधुनिक कृषि तकनीकों और स्थानीय उद्यमिता के जरिए बेहद कम पूंजी में मुनाफे वाला कारोबार खड़ा किया जा सकता है। • उद्यमियों के लिए अवसर: मशरूम की खेती कृषि व्यवसाय में कदम रखने का एक बेहद किफायती जरिया है क्योंकि इसकी फसल सिर्फ 45 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके चलते नए व्यवसाय पारंपरिक फसलों की तुलना में बहुत तेजी से कमाई करना शुरू कर सकते हैं। • बिहार के किसानों के लिए: उपेंद्र कुशवाहा का आधुनिक कंक्रीट यूनिट पारंपरिक खेती से हटकर अधिक मुनाफा देने वाली नकदी फसलों की तरफ बढ़ने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है। पश्चिमी चंपारण के स्थानीय किसान अब आसानी से उच्च गुणवत्ता वाले मशरूम किट प्राप्त कर सकते हैं, जिससे उन्हें बाहरी सप्लायर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। • क्षेत्रीय व्यापारियों को लाभ: बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल के थोक खरीदारों को अब भारी मात्रा में ताजे बटन मशरूम की लगातार आपूर्ति मिल रही है। स्थानीय स्तर पर मजबूत सप्लाई चेन होने से बाजार में कीमतें स्थिर रहती हैं और परिवहन का खर्च भी बचता है। • स्थानीय रोजगार का सृजन: इस तरह के कृषि व्यवसायों के विस्तार से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। स्थानीय युवाओं को खेती, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में अपने घर के पास ही काम मिल जाता है, जिससे पलायन थमता है। ऐसा क्यों हुआ एक छोटे किसान से क्षेत्र के मशरूम किंग बनने का उपेंद्र कुशवाहा का यह सफर उनके शैक्षणिक बैकग्राउंड, सही रणनीति और धीरे-धीरे किए गए आधुनिकीकरण का परिणाम है। • शैक्षणिक योग्यता: एग्रीकल्चर में बैचलर की डिग्री होने के कारण उपेंद्र को फसलों और पौधों की वैज्ञानिक समझ पहले से थी। इस तकनीकी ज्ञान ने उन्हें मशरूम के जटिल फसल चक्र को बेहतर ढंग से संभालने और उत्पादन बढ़ाने में मदद की। • व्यावसायिक प्रशिक्षण: जल्दबाजी में कदम उठाने के बजाय उपेंद्र ने खेती शुरू करने से पहले मशरूम उत्पादन का बाकायदा प्रशिक्षण लिया। इसी वजह से मड़ई में 50 बैग्स के साथ किया गया उनका पहला प्रयोग पूरी तरह सफल रहा और शुरुआती नुकसान से बच गया। • रणनीतिक विस्तार: केवल कच्चे मशरूम बेचने के बजाय उन्होंने स्पॉन बैग्स का निर्माण भी खुद शुरू कर दिया। इस कदम से उनका मुनाफा तो बढ़ा ही, साथ ही जिले के अन्य मशरूम उत्पादक भी सीधे उनके ग्राहक बन गए। • आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर: फूस की अस्थाई मड़ई से निकलकर कंक्रीट के आठ आधुनिक कंट्रोल्ड यूनिट्स बनाने से उनका उत्पादन मौसम के प्रभाव से सुरक्षित हो गया। इसी आधुनिक तकनीक की बदौलत वह आज हर 45 दिन में 12 टन मशरूम की बंपर हार्वेस्टिंग करने में सक्षम हैं। सवाल-जवाब 1. उपेंद्र कुशवाहा कौन हैं और वे कहां के रहने वाले हैं? उपेंद्र कुशवाहा बिहार के पश्चिमी चंपारण के नौतन के रहने वाले 32 वर्षीय एग्रीकल्चर ग्रेजुएट हैं, जो एक सफल मशरूम उद्यमी के रूप में प्रसिद्ध हैं। 2. उपेंद्र कुशवाहा ने मशरूम का कारोबार शुरू करने के लिए शुरुआत में कितना निवेश किया था? उन्होंने लगभग पांच साल पहले करीब 2.50 लाख रुपये के शुरुआती निवेश के साथ इस कारोबार की शुरुआत की थी। 3. वर्तमान में उपेंद्र कुशवाहा के मशरूम कारोबार का सालाना टर्नओवर कितना है? उनका मशरूम उत्पादन का कारोबार अब काफी बड़ा हो चुका है और इसका सालाना टर्नओवर दो करोड़ रुपये से अधिक है। 4. उपेंद्र कुशवाहा अपने मशरूम की सप्लाई किन राज्यों और जिलों में करते हैं? वे अपने मशरूम की सप्लाई बिहार के कई जिलों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे पड़ोसी राज्यों में करते हैं। 5. वे अपनी आधुनिक यूनिट्स से प्रति फसल चक्र में कितना मशरूम उत्पादन करते हैं? वे अपनी 8 आधुनिक यूनिट्स से हर 45 दिन का फसल चक्र पूरा होने पर लगभग 12 टन मशरूम की हार्वेस्टिंग करते हैं। प्रेरणा और सबक उपेंद्र कुशवाहा का यह सफर ग्रामीण भारत में शून्य से अपना कारोबार शुरू करने के इच्छुक लोगों के लिए बेहद प्रेरणादायक है। • पहले प्रशिक्षण लें: किसी भी तकनीकी काम में बिना जानकारी के कदम न रखें; पहले सही ट्रेनिंग लेने से शुरुआती असफलताओं और नुकसान का जोखिम बेहद कम हो जाता है। • छोटे स्तर से शुरुआत करें: केवल 50 बैग से शुरुआत करने की वजह से उपेंद्र को बड़ी पूंजी दांव पर लगाए बिना मशरूम उगाने की बारीकियों को समझने का मौका मिला। • वैल्यू चेन पर नियंत्रण: केवल मशरूम बेचने तक सीमित न रहकर खुद मशरूम किट (स्पॉन बैग) बनाना शुरू करना कारोबार को तेजी से बढ़ाने का सबसे सटीक तरीका साबित हुआ। • परिस्थितियों के अनुसार ढलें: महामारी के कारण जब नौकरी के रास्ते बंद हुए, तो उपेंद्र ने निराश होने के बजाय तुरंत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अवसरों का फायदा उठाने का फैसला किया। https://trendkia.com/success-stories/west-champaran-ke-upendra-kushwaha-ne-dhai-lakha-se-shuru-kiya-tha-masharuma-ka-kama-aja-salana-tarnaovara-pahuncha-do-karora-rupa-31252 TrendKia — Har trend, sabse pehle.