अमेरिका में डेटा सेंटर्स के लिए गैस पावर प्रोजेक्ट्स में भारी उछाल ग्लोबल एनर्जी मॉमॉनिटर की नई रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में डेटा सेंटर्स के लिए प्रस्तावित गैस पावर क्षमता 2024 की शुरुआत के 4 गीगावाट से बढ़कर 2026 के मध्य तक 189 गीगावाट से अधिक हो गई है। ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर नामक शोध संस्थान द्वारा अमेरिका में गैस से चलने वाली ऊर्जा परियोजनाओं पर लगातार नजर रखी जा रही है। इस समूह ने अपनी एक नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि देश में केवल डेटा सेंटर्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार हो रहे गैस प्रोजेक्ट्स का आकार तेजी से बढ़ा है। साल 2024 के शुरुआती महीनों में यह आंकड़ा केवल 4 गीगावाट तक सीमित था, जो जनवरी 2025 के अंत तक बढ़कर 97 गीगावाट तक पहुंच गया। इसके बाद, साल 2026 के मध्य तक जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार यह ऊर्जा मांग पाइपलाइन अब 189 गीगावाट से भी आगे निकल चुकी है। जानकारी के लिए बता दें कि एक गीगावाट बिजली से लगभग दस लाख घरों को रोशन किया जा सकता है। डेटा सेंटर्स और गैस पावर का सीधा संबंध इस पूरी स्थिति पर बात करते हुए ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की शोध विश्लेषक जेनी मार्टोस ने बताया कि अमेरिका में गैस आधारित ऊर्जा का बुनियादी ढांचा अब सीधे तौर पर डेटा सेंटर्स के विस्तार से जुड़ चुका है और दोनों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पिछले दो वर्षों के दौरान डेटा सेंटर तैयार करने वाली कंपनियों ने ग्रिड से कनेक्शन मिलने में लगने वाले लंबे समय से बचने के लिए निजी ऊर्जा संयंत्रों का रुख किया है, जिन्हें बिहाइंड-द-मीटर प्लांट्स कहा जाता है। इस रणनीति का उद्देश्य आम बिजली उपभोक्ताओं पर भारी-भरकम बिलों का बोझ डालने से बचना भी है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में डेटा सेंटर्स का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है और यह एक बड़ा राजनीतिक व सामाजिक मुद्दा बन चुका है। ट्रंप प्रशासन की पहल और पर्यावरण पर असर ट्रंप प्रशासन ने तकनीकी कंपनियों को अपनी बिजली खुद जुटाने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसी कड़ी में एक स्वैच्छिक प्रतिज्ञा शुरू की गई है जिस पर माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, गूगल और ओपनएआई जैसी दिग्गज कंपनियों के अलावा कई रिपब्लिकन गवर्नरों और देश की प्रमुख यूटिलिटी कंपनियों ने हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि इतनी भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस आधारित ऊर्जा का उत्पादन करने से जलवायु को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका है, क्योंकि इनमें से कई संयंत्रों में बेहद कम कुशल टर्बाइनों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे कार्बन उत्सर्जन में भारी वृद्धि हो सकती है। रिपोर्टों के अनुसार, इनमें से कुछ गैस प्लांट्स को हर साल मध्यम और छोटे आकार के कई देशों से भी अधिक ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करने की अनुमति दी गई है। चीन और अमेरिका के ऊर्जा मॉडल में अंतर ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर दुनिया भर के देशों में ऊर्जा परियोजनाओं की निगरानी करती है, जिसमें दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस आयातक देश चीन भी शामिल है। चीन में गैस का एक बड़ा हिस्सा प्लास्टिक और उर्वरक जैसे उत्पादों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। हालांकि चीन के पास प्राकृतिक गैस संयंत्रों का एक सीमित बेड़ा है और पिछले कुछ वर्षों में वहां भी ऐसे संयंत्रों की संख्या बढ़ी है, जिसके चलते दशक के शुरुआती वर्षों में उसने गैस प्लांट निर्माण के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया था। लेकिन डेटा सेंटर बूम के चलते अमेरिका ने एक बार फिर चीन को पीछे छोड़ते हुए सबसे अधिक गैस प्रोजेक्ट्स पाइपलाइन वाला देश बनने का स्थान हासिल कर लिया है। यह पूरा बदलाव इस बात को उजागर करता है कि जिस चीन को ट्रंप प्रशासन द्वारा अक्सर एआई रेस में अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी माना जाता है, वह अपने डेटा सेंटर विस्तार के लिए गैस के बजाय अन्य विकल्पों पर अधिक निर्भर है। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के फेलो काइल चैन का कहना है कि चीन में डेटा सेंटर का पूरा बूम मुख्य रूप से रिन्यूएबल्स यानी सौर और जलविद्युत ऊर्जा पर आधारित है। चीन में बन रहे अधिकांश डेटा सेंटर्स को ऐसे ग्रामीण इलाकों में स्थापित किया जा रहा है जहां अतिरिक्त अक्षय ऊर्जा का उत्पादन आसानी से उपलब्ध हो जाता है। चैन के अनुसार ग्रिड पर रिन्यूएबल्स का यह विस्तार सरकार द्वारा ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया एक सुनियोजित कदम है। दीर्घकालिक चुनौतियां और अनिश्चितताएं काइल चैन का यह भी मानना है कि कम समय में डेटा सेंटर्स को ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए अमेरिका द्वारा गैस पावर का निर्माण करना शायद आर्थिक रूप से उचित लगे, खासकर तब जब उनके पास चीन जैसी सस्ती अक्षय ऊर्जा का विकल्प नहीं है। लेकिन इसके लिए भविष्य में पर्यावरण और देश के अपने स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश न करने के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की शोधकर्ता जेनी मार्टोस का यह भी कहना है कि इस समूह द्वारा ट्रैक की गई सभी परियोजनाएं जमीन पर नहीं उतरेंगी, क्योंकि कई प्रोजेक्ट्स पर अभी निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हुआ है। वित्तपोषण की अनिश्चितता, स्थानीय स्तर पर विरोध, डेटा संबंधी नियम, मोरेटोरियम और टर्बाइन उपकरणों की आपूर्ति से जुड़ी सीमाएं जैसे अनगिनत कारक इसमें बाधा बन सकते हैं। इसके बावजूद अगर ये सभी प्रोजेक्ट्स बन जाते हैं, तो आने वाले कई दशकों के लिए ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तय हो जाएगा। इसका आप पर असर भारत में: अमेरिका में डेटा सेंटर्स के लिए गैस आधारित ऊर्जा बढ़ने से वैश्विक स्तर पर जलवायु नीतियों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर असर पड़ सकता है, हालांकि इसका सीधा स्थानीय असर सीमित रहेगा। व्यापक प्रभाव: तकनीकी क्षेत्र में बिजली की बढ़ती मांग और ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों के उपयोग से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन और स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। सवाल-जवाब 1. अमेरिका में डेटा सेंटर्स के लिए गैस पावर प्रोजेक्ट्स कितने बढ़ गए हैं? ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की रिपोर्ट के अनुसार, डेटा सेंटर्स के लिए प्रस्तावित गैस पावर की मांग 2024 की शुरुआत के 4 गीगावाट से बढ़कर 2026 के मध्य तक 189 गीगावाट से अधिक हो गई है। 2. बिहाइंड-द-मीटर प्लांट्स क्या होते हैं? ये निजी ऊर्जा सुविधाएं होती हैं जिन्हें डेटा सेंटर निर्माता लंबे ग्रिड कनेक्शन समय से बचने और सीधे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तैयार करते हैं। 3. ट्रंप प्रशासन ने तकनीकी कंपनियों के लिए क्या पहल की है? प्रशासन ने एक स्वैच्छिक प्रतिज्ञा शुरू की है जिसके तहत माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, गूगल और ओपनएआई जैसी कंपनियों को अपनी बिजली खुद जुटाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। 4. चीन अमेरिका से किस प्रकार अलग ऊर्जा नीति अपना रहा है? चीन अपने डेटा सेंटर विस्तार के लिए गैस के बजाय मुख्य रूप से सौर और जलविद्युत जैसी अक्षय ऊर्जा पर जोर दे रहा है। https://trendkia.com/technology/data-centers-are-driving-an-alarming-gas-power-expansion-in-the-us-21609 TrendKia — Har trend, sabse pehle.