{
  "type": "article",
  "title": "इंटरनेट के बढ़ते साये में साइबर सुरक्षा की तालीम मातृभाषा में देना क्यों है जरूरी",
  "summary": "देशभर में इंटरनेट और स्मार्टफोन का इस्तेमाल तेजी से फैल रहा है, जिसके साथ डिजिटल धोखाधड़ी के खतरे भी लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर सुरक्षा की शिक्षा को केवल अंग्रेजी तक सीमित रखने के बजाय क्षेत्रीय भाषाओं में दिया जाना चाहिए ताकि आम लोग आसानी से जागरूक हो सकें।",
  "content": "सुबह की पहली चाय की चुस्की लेने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक, आज के समय में हमारा पूरा दिन और रात इंटरनेट के चक्रव्यूह के चारों ओर ही घूमते रहते हैं। जब भी किसी को ऑनलाइन सामान मंगवाना होता है, अपने मित्रों या परिवारजनों को पैसे भेजने होते हैं या फिर किसी सरकारी योजना का फॉर्म भरना होता है, तो लोग पलक झपकते ही चंद क्लिक्स के जरिए यह सब पूरा कर लेते हैं। इंटरनेट ने आम इंसान की जिंदगी को वाकई बेहद आसान बना दिया है और हर काम को मुट्ठी में ला खड़ा किया है। लेकिन इस चमकदार डिजिटल दुनिया के ठीक पीछे एक ऐसा गहरा काला अंधेरा भी अपनी बाहें फैलाए बैठा है, जो किसी भी मेहनत करने वाले इंसान की पूरी जिंदगी की कमाई को चंद पलों में ही पूरी तरह साफ कर सकता है।\n\nजैसे-जैसे हमारे देश के दूर-दराज के इलाकों और गांवों तक स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट का दायरा लगातार फैलता जा रहा है, वैसे-वैसे ऑनलाइन ठगी करने वालों के नए और शातिर तरीके भी लगातार सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह मान लेना कि केवल देश के कोने-कोने तक इंटरनेट की लाइनें बिछा देने से ही सारा काम पूरा हो जाता है, बिल्कुल गलत होगा। इस विषय पर डेक्सियन के स्ट्रैटेजिक इनिशिएटिव्स के वाइस प्रेसिडेंट और इंडिया कंट्री हेड कुमार राजगोपालन का साफ तौर पर यह कहना है कि डिजिटल भारत की असली और सच्ची ताकत तभी साबित मानी जाएगी, जब हमारे देश का हर एक आम नागरिक बिना किसी डर के और पूरी सूझबूझ के साथ इंटरनेट का इस्तेमाल करने में सक्षम हो सके।\n\nमातृभाषा में हो सुरक्षा की तालीम\nकुमार राजगोपालन के अनुसार, आज के समय में देश की सबसे बड़ी और अहम जरूरत यह है कि साइबर सुरक्षा से जुड़ी शिक्षा को केवल अंग्रेजी भाषा या फिर भारी-भरकम और पेचीदा तकनीकी शब्दों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इस बेहद जरूरी जानकारी को देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से आम आदमी तक पहुंचाया जाना बेहद आवश्यक है। जब तक हमारे घरों के माता-पिता, समाज के बुजुर्ग लोग और छोटे कस्बों या गांवों के युवा अपनी खुद की भाषा में साइबर फ्रॉड करने वालों के नापाक पैंतरों को नहीं समझ लेते, तब तक डिजिटल भारत का यह बड़ा सपना अधूरा ही माना जाएगा। आइए जानते हैं कि किस तरह से अपनी मातृभाषा में मिलने वाली यह डिजिटल साक्षरता देश के हर नागरिक को इन ऑनलाइन ठगों से सुरक्षित रख सकती है।\n\nभाषा की दीवार और ठगों का जाल\nआज देश के करोड़ों लोग अपने हाथों में स्मार्टफोन लेकर धड़ल्ले से उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन अंग्रेजी भाषा पर मजबूत पकड़ न होने की वजह से कई बार सीधे-साधे लोग इन ऑनलाइन घोटालों का बहुत आसानी से शिकार बन जाते हैं। बैंक की ओर से आने वाली जरूरी चेतावनियां या फिर वन टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी से जुड़े संदेश अंग्रेजी में लिखे होने के कारण आम लोग उनका असली मतलब ठीक से नहीं समझ पाते हैं। अगर यही सभी जरूरी चेतावनियां और साइबर सुरक्षा से जुड़े नियम हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली या फिर मराठी जैसी लोकप्रिय स्थानीय भाषाओं में समझाए जाएं, तो लोगों को यह साफ तौर पर पता चल जाएगा कि उन्हें किस संदिग्ध लिंक पर क्लिक करना है और किसे अपनी निजी और गुप्त जानकारी भूलकर भी नहीं बतानी है। भाषा की यह आसान पहुंच ही लोगों को इन साइबर हमलों से बचा सकती है।\n\nगांव और कस्بों तक पहुंचे जागरूकता अभियान\nयह बात किसी से छिपी नहीं है कि आज की डिजिटल क्रांति केवल बड़े महानगरों तक ही सिमट कर नहीं रह गई है। इसका विस्तार अब देश के सबसे छोटे और पिछड़े गांवों के नुक्कड़ों तक पहुंच चुका है। सड़क किनारे किसी छोटी सी दुकान पर ऑनलाइन भुगतान करने से लेकर खेतों और खलिहानों में खड़े होकर सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने वाले किसान तक, आज हर कोई इंटरनेट की इस दुनिया से जुड़ा हुआ है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि साइबर सुरक्षा से जुड़ी सही जानकारी सीधे गांवों के अंदर तक पहुंचे। इसके लिए नुक्कड़ नाटकों, कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों, छोटे और मनोरंजक वीडियो रील्स तथा स्कूलों के अंदर आयोजित होने वाली वर्कशॉप्स का बड़े पैमाने पर सहारा लिया जा सकता है। इन माध्यमों से लोग खेल-खेल में ही डिजिटल गार्डनिंग और मजबूत पासवर्ड बनाने के तरीकों के गुर आसानी से सीख सकेंगे।\n\nआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर और बच्चों-बुजुर्गों की सुरक्षा\nआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के इस नए दौर ने पूरे खेल को ही पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। आज के ठग ऐसी उन्नत तकनीकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी मदद से किसी भी इंसान की असली आवाज या उसके चेहरे को हूबहू नकली रूप में तैयार किया जा सकता है। ऐसे खतरनाक माहौल में ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले बच्चे और तकनीक के मामलों में थोड़े असहज रहने वाले बुजुर्ग लोग सबसे ज्यादा बड़े खतरे के दायरे में रहते हैं। यह बहुत जरूरी है कि हम अपने बच्चों को इस बात की सीख दें कि वे इंटरनेट की दुनिया में किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ चैट न करें। वहीं दूसरी तरफ, हमारे बुजुर्गों को भी यह बात बार-बार समझानी होगी कि बैंक का कोई भी असली अधिकारी बनकर फोन करने वाले हर शख्स को वे अपना पिन नंबर या कोई अन्य गुप्त जानकारी बिल्कुल न बताएं।\n\nसतर्क नागरिक ही बना सकते हैं मजबूत डिजिटल भारत\nदेश की सरकार का बहुप्रचारित डिजिटल इंडिया अभियान तभी पूरी तरह सफल माना जा सकता है, जब इस तकनीक का इस्तेमाल पूरी सुरक्षा के साथ किया जाए। केवल देश भर में हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचा देने या सस्ते डेटा पैक बांट देने भर से ही नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण पूरा नहीं हो जाता है। जब तक देश का बच्चा-बच्चा यह अच्छी तरह नहीं जान जाता कि इस वर्चुअल और आभासी दुनिया में अपनी खुद की प्राइवेसी की रक्षा कैसे करनी है, तब तक खतरा लगातार बना रहेगा। जब आम लोगों को उनकी अपनी मातृभाषा में ही साइबर एजुकेशन दी जाएगी, तभी वे बिना किसी भय के इन सभी डिजिटल सुविधाओं का पूरा लाभ उठा सकेंगे।\n\nइसका आप पर असर\nसाइबर सुरक्षा की शिक्षा और भाषाई पहुंच का यह मुद्दा देश के हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता के दैनिक जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।\n\n• भारत में: देश भर में ऑनलाइन बैंकिंग और डिजिटल भुगतान का उपयोग करने वाले करोड़ों लोग भाषा की बाधा के कारण ठगी का शिकार बनते हैं। मातृभाषा में सुरक्षा निर्देश मिलने से आम नागरिक अनजाने लिंक और फर्जी संदेशों की पहचान आसानी से कर पाएंगे।\n• छोटे शहरों और गांवों में: ग्रामीण इलाकों और कस्बों के उन उपयोगकर्ताओं को विशेष सुरक्षा मिलेगी जो हाल ही में डिजिटल भुगतान से जुड़े हैं। स्थानीय भाषा में वर्कशॉप और नुक्कड़ नाटकों के जरिए लोग बिना डरे डिजिटल सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगे।\n• वित्तीय सुरक्षा: बैंक चेतावनियां और ओटीपी संदेश स्थानीय भाषाओं में मिलने से जीवनभर की गाढ़ी कमाई को ऑनलाइन ठगों से बचाने में मदद मिलेगी। इससे वित्तीय नुकसान के मामलों में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।\n• पारिवारिक सुरक्षा: बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष एआई सुरक्षा दिशा-निर्देशों से डीपफेक और नकली आवाज आधारित घोटालों से बचाव संभव होगा। परिवार के संवेदनशील सदस्य अनजान कॉल्स और धोखाधड़ी से सुरक्षित रहेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसाइबर अपराधों में लगातार हो रही वृद्धि और उन्नत तकनीकों के दुरुपयोग ने पारंपरिक सुरक्षा उपायों को नाकाफी बना दिया है।\n\n• स्मार्टफोन की व्यापक पहुंच: देश के कोने-कोने तक इंटरनेट और मोबाइल डेटा के विस्तार ने नए उपयोगकर्ताओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ा है, जो तकनीकी रूप से कम प्रशिक्षित हैं।\n• भाषा की बड़ी दीवार: अधिकांश सुरक्षा निर्देश और बैंक चेतावनियां केवल अंग्रेजी में होने के कारण आम लोग उनका अर्थ समझने में असमर्थ रहते हैं।\n• आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दुरुपयोग: एआई और डीपफेक तकनीक के उभरने से ठगों ने आवाज और चेहरे की नकल कर नए और खतरनाक फ्रॉड करना शुरू कर दिया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. साइबर शिक्षा को मातृभाषा में देने की मांग किसने उठाई है?\nयह मांग डेक्सियन के स्ट्रैटेजिक इनिशिएटिव्स के वाइस प्रेसिडेंट और इंडिया कंट्री हेड कुमार राजगोपालन ने उठाई है।\n\n2. अंग्रेजी की जानकारी न होने से लोग किस समस्या का शिकार होते हैं?\nअंग्रेजी न जानने के कारण लोग बैंक चेतावनियों और ओटीपी संदेशों को नहीं समझ पाते और ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार बन जाते हैं।\n\n3. गांवों तक साइबर सुरक्षा का संदेश पहुंचाने के लिए किन माध्यमों का सुझाव दिया गया है?\nइसके लिए नुक्कड़ नाटक, कम्युनिटी रेडियो, वीडियो रील्स और स्कूलों में वर्कशॉप्स का सहारा लेने का सुझाव दिया गया है।\n\n4. एआई के दौर में सबसे ज्यादा खतरे में कौन रहता है?\nऑनलाइन पढ़ाई करने वाले बच्चे और तकनीक से कम परिचित बुजुर्ग एआई के इस दौर में सबसे ज्यादा खतरे में हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/technology/why-cyber-security-education-must-shift-to-mother-tongues-in-the-ai-era-39852",
  "category": "तकनीक",
  "publishedAt": "2026-09-28",
  "tags": [
    "साइबर सुरक्षा",
    "डिजिटल भारत",
    "कुमार राजगोपालन",
    "ऑनलाइन फ्रॉड",
    "मातृभाषा",
    "एआई तकनीक",
    "डिजिटल साक्षरता"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}