आईफोन-18 की दीवानगी पर क्या बोले साइकेट्रिस्ट, रातभर लाइन में खड़े होने का सच आया सामने एप्पल का नया आईफोन बाजार में आते ही स्टोर्स के बाहर युवाओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। इस दीवानगी को लेकर दिल्ली के विशेषज्ञ ने बताया है कि यह कोई मानसिक बीमारी नहीं बल्कि समय के साथ बदलते शौक और इंसानी स्वभाव का हिस्सा है। बाजार में नए स्मार्टफोन के आते ही स्टोर के बाहर रातोंरात युवाओं का जमावड़ा लगना अब आम बात हो गई है। हाल ही में एप्पल द्वारा नया मॉडल लॉन्च किए जाने के बाद देश भर में ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां लोग स्टोर खुलने से पहले ही कतारों में डट गए। इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या यह पागलपन किसी मानसिक विकार का हिस्सा है या इसके पीछे सामाजिक होड़ की कोई और वजह छिपी है। विशेषज्ञ की राय और पुरानी यादें इस पूरे मामले पर दिल्ली के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश ने खुलकर चर्चा की है। उनका कहना है कि हर दौर में किसी न किसी वस्तु को लेकर लोगों में ऐसा ही क्रेज देखने को मिलता रहा है। यह केवल आज की पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि समय के साथ चीजें और ब्रांड बदलते रहे हैं लेकिन लोगों का उत्साह वैसा ही बना हुआ है। उन्होंने पुरानी पीढ़ियों का हवाला देते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी था जब साइकिल खरीदने के लिए दुकानों के चक्कर काटने पड़ते थे और कई-कई दिनों तक इंतजार करना होता था। समय के साथ बदलते शौक और स्टेटस सिंबल साइकिल के बाद मारुति कारों और टाइटन घड़ियों का दौर भी देश ने देखा है, जब लोग इन्हें पाने के लिए बेताब रहते थे। इसी तरह घरों में टेलीफोन का कनेक्शन लगवाने के लिए भी लंबी कतारों में लगना पड़ता था। आज के दौर में एसटीडी बूथ के बाहर खड़े होने के दिन मिलेनियल्स को अच्छी तरह याद होंगे। मनोचिकित्सक का मानना है कि इंसान के लिए जो चीज उस समय सबसे कीमती होती है, उसके प्रति उसका आकर्षित होना स्वाभाविक है। नए दौर में यह क्रेज खासतौर पर उन युवाओं में अधिक देखा जा रहा है जिनके पास नया-नया पैसा आया है और जो खुद को ब्रांडेड शूज या महंगे गैजेट्स के जरिए स्थापित करना चाहते हैं। सोशल मीडिया और क्षणिक सुख का खेल इस प्रवृत्ति की शुरुआत सत्तर के दशक के आसपास मानी जा सकती है जब मध्यम वर्ग के पास खर्च करने योग्य आय बढ़नी शुरू हुई थी। उस समय घड़ी और गाड़ी जैसे सामान स्टेटस सिंबल बन गए थे जो अब विकसित होकर आईफोन जैसे महंगे गैजेट्स तक पहुंच चुके हैं। आज के समय में सोशल मीडिया इस भावना को और अधिक हवा दे रहा है। लोग नए गैजेट के साथ तस्वीरें साझा करके यह दिखाना चाहते हैं कि जो चीज अभी आम लोगों के पास नहीं है, वह उनके पास आ चुकी है। इस तरह का प्रदर्शन एक खास प्रकार का क्षणिक आनंद और रोमांच देता है जो युवाओं को अपनी ओर खींचता है। कंपनियों की रणनीति और इंसानी फितरत विशेषज्ञ का स्पष्ट कहना है कि इसके पीछे कोई जटिल मानसिक बीमारी नहीं है। कंपनियां हर साल नए उत्पाद सीमित संख्या में बाजार में उतारकर इस रोमांच को बनाए रखती हैं और मानव स्वभाव ऐसा है कि वह दुर्लभ दिखने वाली चीजों की तरफ खिंचा चला जाता है। आजादी के समय एक रुपये के सिक्के को लेकर भी लोगों में ऐसा ही उत्साह था जब लोग उसे खर्च करने के बजाय संभालकर रखते थे। इसलिए इसे किसी पीढ़ी की बीमारी न मानकर इंसानी स्वभाव का एक सहज पहलू ही माना जाना चाहिए। इसका आप पर असर यह खबर सीधे तौर पर उन उपभोक्ताओं और तकनीक प्रेमियों को प्रभावित करती है जो नए गैजेट खरीदने के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं। • भारत में: बड़े महानगरों में स्टोर के बाहर लगने वाली कतारें और उत्पादों की भारी मांग से उपभोक्ताओं पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। • बाजार पर असर: सीमित मात्रा में उत्पाद लॉन्च करने की रणनीति के कारण गैजेट्स की कीमतें और उनका क्रेज बाजार में लगातार उच्च बना रहता है। • दैनिक जीवन: लोगों के बीच स्टेटस सिंबल की दौड़ बढ़ने से अनावश्यक खर्च और सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। • मानसिक स्वास्थ्य: उपभोक्तावादी संस्कृति के बीच यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार का रुझान कोई बीमारी नहीं बल्कि सामान्य मानवीय स्वभाव है। • भविष्य के रुझान: आने वाले समय में नए ब्रांड्स और उत्पादों के लॉन्च पर भी ऐसा ही उत्साह देखने को मिलता रहेगा। ऐसा क्यों हुआ नए उत्पादों के प्रति युवाओं में इस प्रकार की भारी दीवानगी और लंबी कतारों के पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं। • मानवीय स्वभाव: विशेषज्ञ बताते हैं कि दुर्लभ दिखने वाली वस्तुएं और रोमांचक अनुभव इंसानी प्रवृत्ति को स्वाभाविक रूप से अपनी ओर आकर्षित करते हैं। • सोशल मीडिया का प्रभाव: डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नई वस्तुएं साझा करने से मिलने वाली तात्कालिक स्वीकृति लोगों को ऐसे उत्पादों की खरीद के लिए प्रेरित करती है। • ऐतिहासिक परिपाटी: सत्तर के दशक से शुरू हुई मध्यम वर्ग की आय वृद्धि के साथ ही घड़ी और गाड़ी जैसे सामानों को लेकर क्रेज की संस्कृति पनपने लगी थी। • कंपनी नीतियां: निर्माता कंपनियां हर साल सीमित मात्रा में नए मॉडल जारी करके बाजार में उनके प्रति उत्सुकता और कृत्रिम कमी बनाए रखती हैं। सवाल-जवाब 1. आईफोन-18 लॉन्च होने पर युवाओं का व्यवहार कैसा देखा गया? युवाओं ने स्टोर के बाहर रातभर लाइनें लगाईं और नया फोन सबसे पहले पाने की होड़ में नजर आए। 2. इस विषय पर किस विशेषज्ञ से बात की गई है? दिल्ली के जाने-माने साइकेट्रिस्ट और इहबास के प्रोफेसर डॉ. ओमप्रकाश से बातचीत की गई है। 3. क्या नए गैजेट्स के प्रति यह दीवानगी कोई मानसिक बीमारी है? विशेषज्ञ के अनुसार यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि इंसानी स्वभाव और सामाजिक परिपाटी का हिस्सा है। 4. चीजों के प्रति ऐसा क्रेज किस दशक से शुरू हुआ था? चीजों के प्रति ऐसा क्रेज सत्तर के दशक के आसपास शुरू हुआ था जब मध्यम वर्ग के पास पैसा आना शुरू हुआ था। 5. कंपनियां ऐसे उत्पादों का क्रेज कैसे बनाए रखती हैं? कंपनियां हर साल नए उत्पाद सीमित मात्रा में लॉन्च करके लोगों के बीच रोमांच और उत्सुकता बनाए रखती हैं। https://trendkia.com/technology/why-youth-wait-all-night-for-new-iphone-psychiatrist-explains-the-craze-33313 TrendKia — Har trend, sabse pehle.