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  "title": "हिमाचल का धर्मकोट कैसे बना यहूदी मुसाफिरों का दूसरा घर",
  "summary": "कांगड़ा की धौलाधार पहाड़ियों में बसा धर्मकोट विदेशी मुसाफिरों की पहली पसंद है, जहां हिब्रू संस्कृति, खास खानपान और शांति का अनोखा संगम देखने को मिलता है।",
  "content": "हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में कई ऐसे खूबसूरत कोने हैं जो मुख्य पर्यटन केंद्रों की भीड़भाड़ से बिल्कुल अलग अपनी खास पहचान बनाए हुए हैं। ऐसा ही एक शांत और अनूठा ठिकाना है कांगड़ा जिले की धौलाधार पर्वत श्रृंखला की गोद में बसा धर्मकोट गांव। धर्मशाला और मैक्लोडगंज के बेहद करीब होने के बावजूद यह जगह पर्यटकों को एक सर्वथा अलग दुनिया में ले जाती है। यहां आने वाले विदेशी सैलानियों, खासकर इजरायल से आने वाले मुसाफिरों के बीच यह गांव इस कदर लोकप्रिय है कि इसे मिनी इजरायल भी कहा जाने लगा है। दशकों से सुदूर मुल्कों से आने वाले मुसाफिर यहां हफ्तों और महीनों ठहरकर शांति, कला और सादगी भरे जीवन की तलाश करते हैं।\n\nमैक्लोडगंज की हलचल से परे एक शांत संसार\nधर्मकोट की भौगोलिक स्थिति बहुत दिलचस्प है। यह गांव राज्य की राजधानी शिमला से करीब 240 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसका सबसे नजदीकी बड़ा शहर धर्मशाला है, जबकि निकटतम हवाई संपर्क कांगड़ा के गग्गल में स्थित हवाई अड्डे से मिलता है, जो यहां से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। पर्यटन के नक्शे पर मशहूर मैक्लोडगंज से धर्मकोट की दूरी महज दो किलोमीटर है। लेकिन इस दो किलोमीटर के फासले में माहौल पूरी तरह बदल जाता है।\n\nधर्मशाला से ऊपर की तरफ बढ़ते हुए जब मैक्लोडगंज के तिब्बती प्रार्थना झंडे, सजे-धजे बाजार और मोमो तथा लाफिंग की खुशबू पीछे छूटने लगती है, तब धर्मकोट की सीमा में प्रवेश होता है। यहां पहुंचते ही रास्तों पर हिब्रू भाषा में लिखे साइनबोर्ड, छोटी-बड़ी बेकरियों की मौजूदगी और ताजी बेक की गई चल्लाह ब्रेड की सोंधी महक का अहसास होने लगता है। धर्मकोट के ठीक पास में भागसूनाग भी स्थित है। हैरानी की बात यह है कि मैक्लोडगंज से इतनी कम दूरी पर होने के बावजूद लाखों भारतीय सैलानी यहां की जानकारी न होने के चलते सिर्फ दो किलोमीटर पहले से ही वापस लौट जाते हैं।\n\nचरवाहों की बस्ती से अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनने का सफर\nधर्मकोट हमेशा से ऐसा नहीं था जैसा आज दिखाई देता है। अतीत में यह स्थानीय गद्दी चरवाहा समुदाय का एक शांत और पारंपरिक गांव हुआ करता था। उस दौर में स्थानीय लोगों का जीवन पूरी तरह मवेशी चराने, छोटी-मोटी खेती करने और दिहाड़ी मजदूरी पर टिका हुआ था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि दूरदराज का यह पहाड़ी कोना एक दिन वैश्विक मुसाफिरों का बड़ा केंद्र बन जाएगा।\n\nइस गांव में विदेशी यात्रियों के आने की शुरुआत का सीधा दस्तावेज तो कम ही मिलता है, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि इस पूरे बदलाव की नींव 1960 के दशक में पड़ी। उस समय परम पावन दलाई लामा ने धर्मशाला के मैक्लोडगंज को अपना निवास बनाया था। उनकी मौजूदगी ने दुनिया भर के विचारकों, साधकों और मुसाफिरों का ध्यान इस पहाड़ी क्षेत्र की ओर आकर्षित किया। यद्यपि इजरायल के यहूदी मुसाफिरों का तिब्बती बौद्ध धर्म से सीधा कोई संबंध नहीं था, फिर भी दलाई लामा की उपस्थिति से बने शांतिपूर्ण वातावरण ने विदेशी यात्रियों को यहां आने के लिए प्रेरित किया।\n\nहिब्रू भाषा, प्राइवेसी और स्थानीय जीवनशैली\nधीरे-धीरे विदेशी मुसाफिरों ने धर्मकोट को अपना ठिकाना बनाना शुरू किया। चूंकि विदेशी नागरिक सीधे जमीन नहीं खरीद सकते, इसलिए उन्होंने लंबी अवधि के लिए संपत्तियों को लीज पर लेना शुरू कर दिया। उनके साथ ही राजस्थान, पश्चिम बंगाल और गोवा जैसे भारत के अन्य राज्यों से आए कारोबारियों ने भी यहां जमीन लीज पर लेकर आतिथ्य और खानपान से जुड़े काम शुरू किए।\n\nआज गांव के स्थानीय निवासी भी हिब्रू भाषा सहजता से बोल और समझ लेते हैं। यहां आने वाले मुसाफिर अपनी प्राइवेसी को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। यही वजह है कि कई दुकानों और प्रतिष्ठानों पर साफ तौर पर लिखा देखा जा सकता है कि फोटो और वीडियो बनाना मना है। बहुत से विदेशी सैलानी एकांत और सुकून की तलाश में यहां आते हैं, इसलिए सोशल मीडिया की रील बनाने के लिए आने वाले पर्यटकों की भीड़ उन्हें रास नहीं आती। इसके अलावा सैलानियों की सुविधा के लिए गांव की कई दुकानों में मुद्रा विनिमय यानी पैसे बदलने की व्यवस्था भी उपलब्ध है।\n\nपारंपरिक चूल्हे से फलाफल और शक्शुका तक\nसमय के साथ गांव की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आया है। आज धर्मकोट में ऐसा परिवार खोजना मुश्किल है जो केवल पारंपरिक खेती या पशुपालन के सहारे गुजर-बसर कर रहा हो। पहले ग्राम पंचायत के रूप में संचालित होने वाला यह इलाका अब धर्मशाला नगर निगम के दायरे में आ चुका है।\n\nगांव के लगभग हर घर में होमस्टे, गेस्ट हाउस, कैफे या खानपान की व्यवस्था हो चुकी है। इन भोजनालयों में दुनिया भर के व्यंजन परोसे जाते हैं। इनमें खास तौर पर पारंपरिक यहूदी और मध्य-पूर्वी स्वाद जैसे फलाफल, पीटा ब्रेड और शक्शुका बेहद चाव से तैयार किए जाते हैं। कई विदेशी नागरिक तो यहां की संस्कृति में इस तरह रच-बस गए हैं कि उन्होंने यहां शादियां कीं और यहीं अपने परिवारों के साथ रह रहे हैं। वहीं एक बड़ी संख्या ऐसे सैलानियों की भी है जो पर्यटक वीजा पर आते हैं और वीजा अवधि पूरी होने के बाद छोटे अंतराल पर दोबारा लौट आते हैं।\n\nकला, योग और रोमांचक रास्तों का संगम\nधर्मकोट केवल खाने-पीने या सुस्ताने की जगह नहीं है, बल्कि यह रचनात्मक गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां के शांत पहाड़ों और ठंडी आबोहवा के बीच ज्वेलरी बनाने की दुकानें, संगीत सिखाने की कक्षाएं, पारंपरिक वाद्ययंत्र तैयार करने की कार्यशालाएं और योग के सत्र आयोजित होते हैं। दूर-दराज से आने वाले सैलानी इन कक्षाओं में शामिल होकर नई कलाएं सीखते हैं।\n\nएडवेंचर के शौकीनों के लिए भी धर्मकोट एक बेहतरीन पड़ाव है। यहां से मशहूर त्रियुंड ट्रेकिंग ट्रेल और लाका ग्लेशियर के रास्ते निकलते हैं। बेहद अनुभवी पर्वतारोहियों के लिए मून पीक की चढ़ाई का रास्ता भी इसी इलाके से जुड़ता है। इसके अलावा कांगड़ा जिले में ही पैराग्लाइडिंग के लिए विश्व प्रसिद्ध बीर-बिलिंग मौजूद है। हालांकि हाल के दिनों में ईरान के साथ संघर्ष के बाद इस सीजन में इजरायली सैलानियों के आगमन में कुछ कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद धर्मकोट अपनी प्राकृतिक सुंदरता, विशिष्ट पहचान और खुले माहौल के साथ हर उस मुसाफिर का स्वागत करने को तैयार रहता है जो शांति से पहाड़ों को जीना चाहता है।\n\nइसका आप पर असर\nपहाड़ों में शांत और गैर-पारंपरिक पर्यटन की तलाश कर रहे मुसाफिरों के लिए धर्मकोट एक अनूठा सांस्कृतिक और प्राकृतिक अनुभव प्रस्तुत करता है।\n\n• भारत में: देश भर से हिमाचल घूमने आने वाले मुसाफिर भीड़भाड़ से दूर एक शांत और वैश्विक माहौल वाले पहाड़ी गांव का अनुभव ले सकते हैं। यहां आने से पहले यात्रियों को स्थानीय सांस्कृतिक मर्यादाओं और प्राइवेसी से जुड़े नियमों का सम्मान करने की तैयारी रखनी चाहिए।\n• धर्मकोट और कांगड़ा में: स्थानीय निवासियों की आजीविका सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय और शांतिप्रिय घरेलू पर्यटन पर निर्भर है। पर्यटन के स्वरूप में बदलाव और इजरायली सैलानियों की संख्या में कमी से स्थानीय होमस्टे और कैफे संचालकों की मौसमी आय प्रभावित होती है।\n• खानपान और संस्कृति के शौकीनों के लिए: पर्यटक यहां प्रामाणिक फलाफल, शक्शुका और चल्लाह ब्रेड जैसे पारंपरिक यहूदी व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं। यह स्थान उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो योग, संगीत और आभूषण बनाने जैसी कलाओं की कार्यशालाओं में भाग लेना चाहते हैं।\n• ट्रेकिंग और साहसिक यात्रियों के लिए: यह गांव त्रियुंड, लाका ग्लेशियर और मून पीक जैसे लोकप्रिय पर्वतारोहण मार्गों का मुख्य शुरुआती पड़ाव है। साहसिक खेलों में रुचि रखने वाले लोग यहां ठहरकर कांगड़ा के बीर-बिलिंग में पैराग्लाइडिंग का भी आनंद ले सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nधर्मकोट का एक साधारण चरवाहा बस्ती से अंतरराष्ट्रीय केंद्र में तब्दील होना दशकों की सांस्कृतिक, भू-राजनीतिक और पर्यटन गतिविधियों का परिणाम है।\n\n• दलाई लामा की धर्मशाला में उपस्थिति: वर्ष 1960 के दशक में दलाई लामा के मैक्लोडगंज आगमन ने इस पहाड़ी क्षेत्र को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित किया। उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति के चलते अंतरराष्ट्रीय मुसाफिरों ने कांगड़ा घाटी के शांत कोनों की खोज शुरू की।\n• एकांत और प्राकृतिक शांति की खोज: इजरायल से आने वाले मुसाफिरों को धर्मकोट का शांत पहाड़ी माहौल, ठंडी आबोहवा और सादगी भरा परिवेश बेहद पसंद आया। उन्होंने इसे अपनी जीवनशैली और विश्राम के अनुकूल पाते हुए लंबे समय तक ठहरने का ठिकाना बना लिया।\n• स्थानीय आतिथ्य और कारोबारी बदलाव: विदेशी यात्रियों की लंबी अवधि की जरूरतों को देखते हुए स्थानीय गद्दी समुदाय और अन्य राज्यों के कारोबारियों ने घरों को होमस्टे और कैफे में बदल दिया। स्थानीय लोगों द्वारा हिब्रू भाषा सीखने और यहूदी खानपान उपलब्ध कराने से यह संबंध और प्रगाढ़ होता गया।\n• हालिया भू-राजनीतिक प्रभाव: हाल के महीनों में ईरान के साथ संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय यात्राएं प्रभावित हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप चालू पर्यटन सीजन में धर्मकोट आने वाले इजरायली सैलानियों की संख्या में गिरावट देखी गई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. धर्मकोट को मिनी इजरायल क्यों कहा जाता है?\nयहां दशकों से बड़ी संख्या में इजरायली सैलानी आते हैं और लंबे समय तक ठहरते हैं, जिससे यहां हिब्रू साइनबोर्ड, यहूदी खानपान और एक खास सांस्कृतिक माहौल विकसित हो गया है।\n\n2. धर्मकोट मैक्लोडगंज से कितनी दूरी पर स्थित है?\nधर्मकोट मैक्लोडगंज से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर ऊपर पहाड़ियों में स्थित है।\n\n3. धर्मकोट पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा कौन सा है?\nसबसे नजदीकी हवाई अड्डा कांगड़ा जिले के गग्गल में स्थित है, जो धर्मकोट से लगभग 20 किलोमीटर दूर है।\n\n4. धर्मकोट में कौन से खास व्यंजन लोकप्रिय हैं?\nयहां के कैफे और भोजनालयों में फलाफल, पीटा ब्रेड, शक्शुका और ताजी चल्लाह ब्रेड जैसे पारंपरिक व्यंजन विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।\n\n5. धर्मकोट से कौन से प्रसिद्ध ट्रेकिंग ट्रेल जुड़े हुए हैं?\nधर्मकोट से मशहूर त्रियुंड ट्रेकिंग ट्रेल, लाका ग्लेशियर और मून पीक की चढ़ाई के रास्ते जुड़े हुए हैं।\n\n6. इस सीजन में इजरायली पर्यटकों की संख्या कम क्यों हुई है?\nईरान के साथ हुए युद्ध और तनावपूर्ण हालातों के चलते इस सीजन में इजरायली सैलानियों के आगमन में कमी दर्ज की गई है।",
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  "category": "यात्रा",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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