# उत्तराखंड के हरिद्वार में है 172 साल पुराना डैम कोठी पुल, ब्रिटिश काल के इस ऐतिहासिक निर्माण की कहानी

> हरिद्वार में गंग नहर पर बना 172 साल पुराना डैम कोठी पुल ब्रिटिशकालीन इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना है। भारी यातायात और उम्र के असर के कारण अब इस ऐतिहासिक ढांचे की सुरक्षा को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

**Type:** article · **Category:** यात्रा · **Published:** 2026-08-25 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/travel/uttarakhand-ke-haridwar-mein-hai-172-saal-purana-dam-kothi-pul-21809 · **Language:** Hindi
**Tags:** हरिद्वार, डैम कोठी पुल, गंग नहर, ब्रिटिश काल, उत्तराखंड इतिहास

हरिद्वार की पहचान सिर्फ पवित्र गंगा और धार्मिक स्थलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस शहर में कई ऐसी ऐतिहासिक इमारतें और पुल भी मौजूद हैं जो बीते दौर की दास्तां बयां करते हैं। इन्हीं धरोहरों में डैम कोठी पुल का नाम भी शामिल है जो गंग नहर के ऊपर खड़ा है। यह ब्रिटिशकालीन पुल करीब 172 साल पुराना है और इतने लंबे अरसे तक भारी आवाजाही का गवाह बनने के बावजूद आज भी अपनी जगह कायम है, हालांकि अब इसके ढांचे पर समय और उम्र का असर साफ दिखने लगा है।

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ऐतिहासिक ऊपरी गंग नहर की खुदाई का काम वर्ष 1842 में शुरू किया गया था। कर्नल सर प्रोबी कॉटले ने इस पूरी नहर परियोजना का खाका तैयार किया था। उनके कुशल मार्गदर्शन में लगभग 12 साल तक काम चला और साल 1854 में यह नहर बनकर पूरी तरह तैयार हो गई। उस दौर के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने इस बड़ी परियोजना का विधिवत उद्घाटन किया था। इसी निर्माण दौर में नहर के आसपास कई अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं भी बनाई गईं, जिनमें डैम कोठी पुल भी एक अहम हिस्सा था।

नहर के दोनों किनारों के बीच आवागमन को सुगम बनाने के लिए राज्य अतिथि गृह के नजदीक डैम कोठी पुल की मजबूत नींव रखी गई थी। यह पुल उस समय की मेहराबदार और ईंटों पर आधारित निर्माण शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इसे बनाने में विशेष पक्की लाल ईंटों के साथ-साथ चूने-सुर्खी के खास गारे का इस्तेमाल किया गया था। इसी मजबूत तकनीक की बदौलत यह पुल इतने लंबे समय तक पानी के तीव्र वेग और लगातार दबाव को आसानी से झेलता रहा।

वर्ष 1854 से लेकर 2026 तक इस ब्रिटिशकालीन पुल ने अपने 172 साल का सफर पूरा कर लिया है। लगभग पौने दो सौ वर्षों से यह पुल यात्रियों, श्रद्धालुओं, कांवड़ियों और स्थानीय निवासियों के आने-जाने का प्रमुख मार्ग रहा है। आज के आधुनिक कंक्रीट युग में भी प्राचीन इंजीनियरिंग का यह नमूना अपनी अनूठी पहचान बनाए हुए है। इतने लंबे अंतराल के बाद भी इसका मजबूती से खड़ा रहना इसके ऐतिहासिक महत्व और निर्माण की उत्कृष्टता को भली-भांति दर्शाता है।

लंबे समय तक भारी यातायात का बोझ उठाने के बाद अब इस 172 साल पुराने पुल के ढांचे पर उम्र के निशान उभरने लगे हैं। कई स्थानों पर ईंटें पुरानी हो चुकी हैं और पुल की मेहराबों पर भी कमजोरी साफ नजर आने लगी है। कुछ हिस्सों में तो चूना भी अपनी जगह से उखड़ने लगा है, जिससे इसकी तकनीकी स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ने लगी हैं। वाहनों के निरंतर दबाव के कारण यहां किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने का जोखिम भी बढ़ गया है.

डैम कोठी पुल पर बढ़ते हुए ट्रैफिक के दबाव को नियंत्रित करने और सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए इसके ठीक पास एक नए समानांतर पुल का निर्माण किया गया। वर्ष 2021 के हरिद्वार महाकुंभ के दौरान इस आधुनिक पुल का संचालन शुरू कर दिया गया था। इसके साथ ही हरिद्वार आने वाले पर्यटकों और यात्रियों के लिए यातायात की अलग व्यवस्था की गई, जिससे पुराने ब्रिटिशकालीन पुल पर वाहनों के दबाव को काफी हद तक कम करने में मदद मिली।

हरिद्वार की गंग नहर और इसके तटों पर बने तमाम ब्रिटिशकालीन पुलों का प्रशासनिक और तकनीकी अधिकार उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास सुरक्षित है। डैम कोठी पुल के रखरखाव और देखरेख की जिम्मेदारी भी इसी विभाग के कंधों पर है। विभाग के अभियंता समय-समय पर इस पुल के पिलरों और मेहराबों की तकनीकी समीक्षा करते हैं ताकि इसकी सुरक्षा स्थिति पर पैनी नजर रखी जा सके और जरूरी कदम उठाए जा सकें।

पुल की वर्तमान जर्जर हालत को देखते हुए उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने इसके एक छोर पर स्पष्ट चेतावनी बोर्ड भी लगा दिया है। इस बोर्ड के जरिए साफ निर्देश दिए गए हैं कि इस प्राचीन मार्ग से किसी भी तरह के भारी और मालवाहक वाहनों की आवाजाही पर पूरी पाबंदी है। वर्तमान में केवल हल्के वाहनों और दोपहिया चालकों को ही पूरी सावधानी बरतते हुए यहां से गुजरने की छूट दी गई है। बहती गंगा की धारा के ऊपर बना यह पुल आज भी लोगों के लिए एक उपयोगी रास्ता है, लेकिन इसकी सलामती के लिए तय नियमों का पालन करना अनिवार्य है.

करीब 172 साल का लंबा इतिहास समेटे हुए डैम कोठी पुल केवल एक आने-जाने का मार्ग मात्र नहीं है, बल्कि हरिद्वार की एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर भी है। आज के आधुनिक निर्माण कार्यों के बीच यह पुल हमें पुराने जमाने की उत्कृष्ट इंजीनियरिंग और निर्माण कला की याद दिलाता है। इतने लंबे समय से डटे इस ऐतिहासिक ढांचे को सुरक्षित रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। यदि समय पर इसका उचित संरक्षण किया जाए और यातायात से जुड़े नियमों का सख्ती से पालन हो, तो इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बचाया जा सकता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** ऐतिहासिक और ब्रिटिशकालीन संरचनाओं के संरक्षण तथा उनकी सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करने की जरूरत को रेखांकित करता है।

**उत्तराखंड में:** हरिद्वार आने वाले यात्रियों और स्थानीय लोगों को डैम कोठी पुल पर भारी वाहनों के प्रवेश निषेध और वैकल्पिक मार्गों के इस्तेमाल के नियमों का पालन करना होगा।

## सवाल-जवाब

### 1. डैम कोठी पुल कहाँ स्थित है?
डैम कोठी पुल उत्तराखंड के हरिद्वार में गंग नहर के ऊपर स्थित है।

### 2. डैम कोठी पुल का निर्माण कब हुआ था?
इस पुल का निर्माण कार्य वर्ष 1854 में ऊपरी गंग नहर परियोजना के पूरा होने के साथ किया गया था।

### 3. डैम कोठी पुल की देखरेख कौन सा विभाग करता है?
इस पुल की तकनीकी देखरेख और प्रशासनिक जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के पास है।

### 4. क्या इस पुराने पुल पर भारी वाहनों के जाने की अनुमति है?
नहीं, सुरक्षा कारणों से इस प्राचीन पुल पर भारी और लोडिंग वाहनों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक है।

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