16वीं सदी की महारी परंपरा के पतन से जन्मा गोटीपुआ, जानिए क्यों ओडिशा में केवल 14 वर्ष तक के लड़के ही बनते हैं नर्तक ओडिशा की सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर गोटीपुआ नृत्य का इतिहास 16वीं शताब्दी से जुड़ा है, जहाँ 14 वर्ष से कम आयु के लड़के महिला रूप धारण कर अत्यंत कठिन योग मुद्राओं में भगवान जगन्नाथ की भक्ति प्रकट करते हैं। ओडिशा की समृद्ध और ऐतिहासिक लोक कलाओं में गोटीपुआ नृत्य का स्थान अत्यंत अनूठा है। दर्पण के सामने खड़े होकर माथे पर चंदन का अलंकृत टीका, रेशमी साड़ी का कलात्मक घेरा, पैरों में छनकते घुंघरू और सोलह शृंगार से सजे ये नन्हे चेहरे किसी नर्तकी के नहीं, बल्कि 14 वर्ष से कम आयु के उन बाल कलाकारों के होते हैं जो भगवान जगन्नाथ की भक्ति में लीन हो जाते हैं। यह कोई आधुनिक मंच प्रदर्शन या नया फैशन नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी उस संघर्षशील लोक संस्कृति की जीवंत गाथा है जो आज भी ओडिशा की माटी में रची-बसी है। जब मंदिर की प्राचीन परंपराएं संकट में पड़ीं, तब इन मासूम बालकों ने न केवल इस नृत्य कला को पुनर्जीवित किया बल्कि इसे एक नई पहचान भी प्रदान की। महारी परंपरा का पतन और अखाड़ा संस्कृति का उदय इस अनूठी लोक कला की ऐतिहासिक जड़ें 16वीं शताब्दी में भोई राजवंश के राजा रामचंद्र देव के शासनकाल से जुड़ती हैं। उस समय पूरी स्थित प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान की नियमित सेवा और आराधना के लिए महारी या देवदासी परंपरा का प्रचलन था। महारी नर्तकियां मंदिर के प्रांगण में केवल भगवान जगन्नाथ के समक्ष ही नृत्य अर्पित करती थीं। हालांकि, समय बीतने के साथ विदेशी आक्रमणों, राजनीतिक उथल-पुथल और सामाजिक परिवर्तनों के कारण महारी प्रथा का धीरे-धीरे पतन होने लगा। समाज में देवदासियों के प्रति सम्मान घटने लगा, जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं और युवतियों ने सार्वजनिक स्थानों एवं मंदिरों के सामने नृत्य करने से खुद को पीछे खींच लिया। इस कठिन सामाजिक मोड़ पर कला और धार्मिक परंपरा को विलुप्त होने से बचाने के लिए ओडिशा में अखाड़ा संस्कृति की नींव रखी गई। महान वैष्णव संत श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा चलाए गए भक्ति आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए स्थानीय गुरुओं और समाज ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह तय किया गया कि छोटी उम्र के बालकों को स्त्री रूप में सजाकर भगवान जगन्नाथ के सामने नृत्य कराया जाएगा ताकि मंदिर की पावन कला अखंड बनी रहे। ओड़िया भाषा में 'गोटी' शब्द का अर्थ 'एक या अकेला' होता है और 'पुआ' का अर्थ 'लड़का' होता है। चूंकि प्रारंभ में एक अकेला बालक ही इस रूप में नृत्य प्रस्तुत करता था, इसलिए इस कला शैली का नाम गोटीपुआ पड़ा। स्त्री शृंगार और बंध कला की कठिन योग मुद्राएं गोटीपुआ नृत्य की सबसे विशिष्ट और विस्मयकारी विशेषता यह है कि इसमें केवल 14 वर्ष या उससे कम आयु के लड़के ही भाग ले सकते हैं। मंच पर प्रस्तुति देने से पूर्व ये बालक पूरी निष्ठा के साथ पारंपरिक महिलाओं की तरह साड़ी, आभूषण और चेहरे पर विशिष्ट चित्रकारी से अपना शृंगार करते हैं। गोटीपुआ केवल एक साधारण नृत्य नहीं है, बल्कि इसमें 'बंध कला' का समावेश होता है। बंध कला नृत्याभिनय, एक्रोबैटिक्स और अत्यंत कठिन योग मुद्राओं का एक अद्भुत सम्मिश्रण है। नर्तक अपने शरीर को इस सीमा तक लचीला और मोम जैसा सुघट्य बना लेते हैं कि वे पलक झपकते ही जटिल आकृतियों और मानवीय पिरामिडों की रचना कर देते हैं। प्रस्तुति के दौरान कलाकार भगवान श्री कृष्ण के रथ, खिलते हुए कमल के फूल तथा कालिया नाग दमन जैसी जटिल पौराणिक कथाओं को अपने शारीरिक संतुलन से जीवंत कर उठाते हैं। इस नृत्य के दौरान मध्यकालीन ओड़िया कवियों, विशेष रूप से बनमाली दास द्वारा रचे गए पारंपरिक भजनों का गायन किया जाता है। ये भजन मुख्य रूप से राधा और कृष्ण के निष्काम प्रेम, रासलीला और भगवान जगन्नाथ के प्रति अगाध भक्ति पर आधारित होते हैं। इस संगीतमय प्रस्तुति में पखावज, हारमोनियम और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की सुमधुर ध्वनियां वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। अखाड़ों में कठोर अनुशासन और 14 वर्ष में सेवानिवृत्ति गोटीपुआ की कला में महारत हासिल करना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं होता। बालकों को मात्र 5 या 6 वर्ष की अल्प आयु में ही स्थानीय अखाड़ों में भेज दिया जाता है। अखाड़ों में गुरुओं की देखरेख में बच्चे वर्षों तक कठोर शारीरिक अभ्यास करते हैं ताकि उनका शरीर लोहे जैसा मजबूत और मोम जैसा लचीला बन सके। इसके साथ ही उन्हें शास्त्रीय ओडिसी संगीत, ताल शास्त्र और अभिनय का गहन प्रशिक्षण दिया जाता है। गोटीपुआ नृत्य प्रदर्शन की शुरुआत भगवान जगन्नाथ, भूमि माता और गुरुजनों की वंदना से होती है। इसके पश्चात नर्तक ओडिसी शैली के नियमों का पालन करते हुए अपनी आंखों की थिरकन, हस्त मुद्राओं और चेहरे के भावों से प्राचीन पौराणिक कथाओं का बखान करते हैं। चूंकि इस कला के प्रदर्शन में अत्यधिक शारीरिक स्टैमिना, लचक और निरंतर ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए 14 या 15 वर्ष की आयु सीमा पार करते ही नर्तकों को इस विधा से सेवानिवृत्त कर दिया जाता है। गोटीपुआ से रिटायर होने के बाद ये कलाकार अपने अनुभव के आधार पर आगे चलकर पेशेवर ओडिसी नर्तक बनते हैं या नए बालकों को शिक्षित करने के लिए गुरु का स्थान ग्रहण कर लेते हैं। इसका आप पर असर ओडिशा के गोटीपुआ नृत्य का यह ऐतिहासिक स्वरूप भारतीय लोक कलाओं और मंदिर परंपराओं के संरक्षण का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करता है। • भारत में: यह परंपरा देश की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और कठिन परिस्थितियों में कला को जीवित रखने के भारतीय दर्शन को रेखांकित करती है। इससे पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति और प्राचीन नृत्य शैलियों के प्रति जन-जागरूकता को मजबूती मिलती है। • ओडिशा में: यह नृत्य राज्य के सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय अखाड़ों के संरक्षण तथा बाल कलाकारों के प्रशिक्षण एवं रोजगार को सीधा संबल प्रदान करता है। पूरी और तटीय ओडिशा में यह कला स्थानीय पहचान, सामाजिक गौरव और धार्मिक विश्वास का अभिन्न हिस्सा है। सवाल-जवाब 1. गोटीपुआ नृत्य क्या है और यह किस राज्य से संबंधित है? गोटीपुआ ओडिशा का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जिसमें 14 वर्ष या उससे कम आयु के लड़के महिलाओं के वस्त्र और शृंगार धारण कर भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति प्रकट करते हैं। 2. ओड़िया भाषा में 'गोटीपुआ' शब्द का क्या अर्थ है? ओड़िया भाषा में 'गोटी' का अर्थ 'एक या अकेला' तथा 'पुआ' का अर्थ 'लड़का' होता है, अर्थात एक अकेला लड़का नर्तक। 3. गोटीपुआ नृत्य की शुरुआत कब और किसके शासनकाल में हुई थी? इस नृत्य परंपरा की शुरुआत 16वीं शताब्दी में भोई राजवंश के राजा रामचंद्र देव के शासनकाल के दौरान हुई थी। 4. गोटीपुआ नर्तकों को 14 वर्ष की आयु में क्यों रिटायर कर दिया जाता है? इस नृत्य में अत्यधिक शारीरिक लचीलेपन और कठिन बंध कला योग मुद्राओं की आवश्यकता होती है, जो उम्र बढ़ने के साथ कठिन हो जाती है, इसलिए 14 या 15 वर्ष में कलाकार रिटायर हो जाते हैं। 5. गोटीपुआ नृत्य प्रस्तुति में कौन से पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं? गोटीपुआ नृत्य के दौरान मुख्य रूप से पखावज, हारमोनियम और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाए जाते हैं। प्रेरणा और सबक गोटीपुआ कलाकारों की जीवन यात्रा कठिन अनुशासन, निरंतर साधना और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने की प्रेरणा देती है। • बचपन से कठोर अनुशासन: महज 5 या 6 वर्ष की उम्र में अखाड़ों में प्रवेश कर बच्चे वर्षों तक शारीरिक और संगीतमय अभ्यास में खुद को समर्पित कर देते हैं। • संकट काल में रचनात्मकता: जब प्राचीन परंपराएं विलुप्त होने के कगार पर थीं, तब समाज ने नया रास्ता निकालकर कला को जीवित रखा। • जीवनपर्यंत कला साधना: 14 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने के बाद भी ये नर्तक गुरु या ओडिसी कलाकारों के रूप में अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हैं। https://trendkia.com/trends/16vin-sadi-ki-mahari-parnpara-ke-patana-se-janma-gotipua-janie-kyon-odisha-men-kevala-14-varsha-taka-ke-larake-hi-banate-hain-nart-27027 TrendKia — Har trend, sabse pehle.