ब्रज में मोर के आकार में फैला है गिरिराज, जानें गोवर्धन पर्वत से जुड़े पांच अनसुने रहस्य मथुरा के पास स्थित पवित्र गोवर्धन पर्वत न केवल श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का केंद्र रहा है, बल्कि इससे जुड़ी कई पौराणिक मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं को अचंभित करती हैं। मथुरा के निकट ब्रज क्षेत्र में स्थित गोवर्धन पर्वत को हिंदू आस्था में अत्यंत पावन और पूजनीय स्थान प्राप्त है। जब भी इस पर्वत की चर्चा होती है, भगवान श्रीकृष्ण की वह अलौकिक बाल लीला सहज ही याद आ जाती है जिसमें उन्होंने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठिका यानी सबसे छोटी उंगली पर पूरे पर्वत को उठा लिया था। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु गिरिराज जी के दर्शन करने और उनकी सप्तकोसीय परिक्रमा पूरी करने देश-विदेश से पहुंचते हैं। हालांकि इस पूज्य पर्वत की बनावट, इसके उद्भव और इससे जुड़े पवित्र सरोवरों को लेकर कई ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनसे अधिकांश लोग पूरी तरह परिचित नहीं हैं। मोर की आकृति में बसा है पावन गिरिराज पर्वत गोवर्धन पर्वत के भौगोलिक और आध्यात्मिक स्वरूप को लेकर एक बहुत ही अनोखी धार्मिक अवधारणा मानी जाती है। लोक मान्यताओं के अनुसार संपूर्ण गिरिराज पर्वत का आकार एक बैठे हुए मोर जैसा दिखाई देता है। इस मान्यता में पर्वत के विभिन्न पड़ावों और आसपास के धार्मिक स्थलों को मोर के शारीरिक अंगों के रूप में देखा जाता है। इसके अनुसार राधाकुंड और श्यामकुंड मोर की दोनों आंखों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं दानघाटी को मोर की गर्दन के रूप में और पूंछड़ी का लौठा नामक स्थल को मोर के सुंदर पंखों अथवा पूंछ के रूप में माना जाता है। इस प्रकार समूची परिक्रमा मोर की आकृति के इर्द-गिर्द मानी जाती है। मन की शक्ति से गोवर्धन में अवतरित हुई मानसी गंगा गोवर्धन धाम के हृदय स्थल में स्थित मानसी गंगा सरोवर के प्रकट होने के पीछे एक अत्यंत भावुक कथा जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार नंद बाबा और माता यशोदा की वृद्धावस्था में पवित्र गंगा नदी में स्नान करने की तीव्र अभिलाषा थी। उस समय गोकुल और ब्रज से गंगा तट तक की लंबी दूरी तय करना उनके शारीरिक स्वास्थ्य के लिहाज से काफी कठिन था। अपने माता-पिता की इस इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने योगबल और मन के संकल्प से गोवर्धन में ही मां गंगा का आह्वान कर उन्हें प्रकट कर दिया। चूंकि यह पवित्र जलधारा भगवान श्रीकृष्ण के मन के संकल्प से प्राकट्य में आई थी, इसलिए इस पावन सरोवर का नाम मानसी गंगा पड़ा। राधाकुंड और श्यामकुंड के निर्माण की अद्भुत गाथा वैष्णव परंपरा में राधाकुंड और श्यामकुंड का स्थान सर्वोच्च माना गया है और इनके निर्माण की कथा भी अत्यंत रोचक है। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने कंस द्वारा भेजे गए अरिष्टासुर नामक राक्षस का संहार किया था, जिसने एक विशाल बैल का रूप धारण कर रखा था। गोवंश के वध के दोष निवारण के लिए श्रीराधा रानी ने श्रीकृष्ण से समस्त तीर्थों के पवित्र जल में स्नान करने का आग्रह किया। तब श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी के प्रहार से धरती को छूकर तुरंत एक कुंड तैयार किया और समस्त पवित्र नदियों के जल को वहां बुलाकर श्यामकुंड की स्थापना की। इसके बाद श्रीराधा रानी और उनकी सखियों ने अपने हाथों के सुंदर कंगनों से पास ही एक अन्य कुंड का निर्माण किया, जिसे राधाकुंड कहा गया। समय बीतने के साथ दोनों कुंडों का पवित्र जल परस्पर एकाकार हो गया। रामसेतु निर्माण और त्रेतायुग से जुड़ा विशेष प्रसंग गोवर्धन पर्वत की महत्ता केवल द्वापर युग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक प्राचीन लोककथा इसे त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और वीर हनुमान जी से भी जोड़ती है। कथा के अनुसार जब लंका पर चढ़ाई के लिए समुद्र पर विशाल सेतु बनाया जा रहा था, तब वानर सेना को भारी शिलाओं और पर्वतों की आवश्यकता थी। उसी क्रम में पवनपुत्र हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को उठाकर दक्षिण दिशा की ओर ले जा रहे थे। मार्ग में ही हनुमान जी को यह समाचार मिला कि सेतु निर्माण का कार्य संपूर्ण हो चुका है और अब अतिरिक्त पर्वतों की आवश्यकता नहीं है। इस पर हनुमान जी ने गोवर्धन पर्वत को वहीं ब्रज भूमि पर स्थापित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि सेवा का अवसर न मिलने से पर्वत अत्यंत दुखी हो गया था, तब भगवान श्रीराम ने आश्वासन दिया था कि द्वापर युग में वे श्रीकृष्ण अवतार लेकर स्वयं इस पर्वत को पूजेंगे और अपनी उंगली पर धारण करेंगे। ऋषि के श्राप के कारण नित्य घट रहा है पर्वत का आकार गिरिराज जी को लेकर एक अन्य पौराणिक मान्यता यह भी है कि यह पर्वत समय के साथ निरंतर छोटा होता जा रहा है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार प्राचीन काल में ऋषि पुलस्त्य गोवर्धन पर्वत के अनुपम सौंदर्य और दिव्यता से प्रभावित होकर उसे अपने साथ काशी ले जाना चाहते थे। पर्वत ने ऋषि के समक्ष यह वचनबद्ध शर्त रखी कि वे उसे मार्ग में जहां कहीं भी पहली बार भूमि पर रखेंगे, वह वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा और आगे नहीं बढ़ेगा। ऋषि जब ब्रज क्षेत्र से गुजर रहे थे, तो उन्होंने आवश्यक कार्यवश पर्वत को भूमि पर रख दिया। बाद में जब उन्होंने पर्वत को पुनः उठाने का प्रयास किया, तो पर्वत अपने वचन के अनुसार टस से मस नहीं हुआ। इस बात से कुपित होकर ऋषि पुलस्त्य ने गोवर्धन पर्वत को प्रतिदिन एक तिल के बराबर क्षीण होने और घटने का श्राप दे दिया। इसका आप पर असर गोवर्धन पर्वत से जुड़ी इन ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव उन लाखों तीर्थयात्रियों पर पड़ता है जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा और परिक्रमा की योजना बनाते हैं। • भारत में: देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं को गोवर्धन परिक्रमा के दौरान केवल एक पहाड़ नहीं बल्कि मोर स्वरूप में बसे आध्यात्मिक स्थलों के दर्शन का अवसर मिलता है। इससे लोग राधाकुंड, श्यामकुंड और मानसी गंगा जैसे पवित्र सरोवरों के धार्मिक महत्व को समझकर अपनी यात्रा का संपूर्ण लाभ उठा सकते हैं। • मथुरा में: स्थानीय स्तर पर ब्रज क्षेत्र में तीर्थयात्रियों की निरंतर आमद से पूजा सामग्री, धर्मशालाओं और परिवहन से जुड़े स्थानीय रोजगार को निरंतर बढ़ावा मिलता है। परिक्रमा मार्ग के प्रमुख पड़ावों जैसे दानघाटी और पूंछड़ी का लौठा पर श्रद्धालुओं के प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था पर स्थानीय प्रशासन का विशेष ध्यान रहता है। • श्रद्धालुओं के लिए: इन पौराणिक कथाओं को जानने के बाद परिक्रमा करने वाले भक्त हर प्रमुख पड़ाव के पीछे के इतिहास से जुड़ पाते हैं। वे राधाकुंड और मानसी गंगा में स्नान अथवा आचमन करते समय इन प्राचीन मान्यताओं का स्मरण कर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं। • धार्मिक पर्यटन के लिए: इस प्रकार की सांस्कृतिक कहानियां युवा पीढ़ी और पर्यटकों को पारंपरिक धरोहरों के प्रति जागरूक करती हैं। इससे स्थानीय स्तर पर धरोहरों के संरक्षण और पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर भी चेतना बढ़ती है। ऐसा क्यों हुआ गोवर्धन पर्वत से जुड़ी ये मान्यताएं सदियों पुरानी पौराणिक गाथाओं, वैष्णव ग्रंथों और ब्रज की समृद्ध लोक संस्कृति से विकसित हुई हैं। • वैष्णव भक्ति साहित्य का प्रभाव: मध्यकालीन संतों और आचार्यों ने ब्रज के प्राकृतिक भूगोल को आध्यात्मिक दृष्टि से जोड़कर देखा। इसी चिंतन के आधार पर गिरिराज जी के विभिन्न कोणों को मोर की सुंदर आकृति के रूप में व्याख्यायित किया गया। • तीर्थों की स्थापना की आवश्यकता: पौराणिक समय में वृद्ध परिजनों को दूरस्थ नदियों तक ले जाना दुष्कर था, जिसके कारण स्थानीय जलाशयों को गंगा और अन्य पवित्र नदियों का स्वरूप मानकर पूजने की परंपरा शुरू हुई। मानसी गंगा का प्राकट्य इसी जनभावना और कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। • पौराणिक कथाओं का समन्वय: रामायण और महाभारत काल की घटनाओं को एक साथ जोड़ने की परंपरा भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से रही है। हनुमान जी द्वारा पर्वत लाने और श्रीराम के वचन की कथा इसी सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाती है। • भूवैज्ञानिक बदलावों की व्याख्या: प्राकृतिक रूप से पर्वतों में होने वाले धीमे क्षरण अथवा भूवैज्ञानिक बदलावों को जनमानस में ऋषि के श्राप की कथा के माध्यम से समझाया गया। प्रतिदिन एक तिल घटने की मान्यता इसी प्राकृतिक बदलाव की लोक व्याख्या मानी जाती है। सवाल-जवाब 1. गोवर्धन पर्वत का आकार किस पक्षी जैसा माना जाता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गोवर्धन पर्वत की बनावट एक बैठे हुए मोर जैसी मानी जाती है। 2. मोर के आकार वाले गोवर्धन में राधाकुंड और श्यामकुंड क्या दर्शाते हैं? मान्यता के अनुसार राधाकुंड और श्यामकुंड को मोर की दोनों आंखों के रूप में देखा जाता है। 3. मानसी गंगा सरोवर का प्राकट्य कैसे हुआ था? कथा के अनुसार नंद बाबा और यशोदा मैया को गंगा स्नान कराने के लिए श्रीकृष्ण ने अपने मन के संकल्प से इसे प्रकट किया था। 4. राधाकुंड का निर्माण किसने और कैसे किया था? कथा के अनुसार अरिष्टासुर वध के बाद श्रीराधा रानी और उनकी सखियों ने अपने कंगनों से जमीन खोदकर इस कुंड को बनाया था। 5. रामायण काल में गोवर्धन पर्वत को कौन लेकर जा रहा था? रामसेतु निर्माण के समय पत्थरों की आवश्यकता पड़ने पर वीर हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को दक्षिण दिशा की ओर ले जा रहे थे। 6. ऋषि पुलस्त्य ने गोवर्धन पर्वत को क्या श्राप दिया था? भूमि पर रखे जाने के बाद पर्वत के न उठने से नाराज होकर ऋषि पुलस्त्य ने उसे प्रतिदिन एक तिल के बराबर घटने का श्राप दिया था। https://trendkia.com/trends/braj-men-mora-ke-akara-men-phaila-hai-giriraja-janen-govardhan-parvata-se-jure-pancha-anasune-rahasya-55472 TrendKia — Har trend, sabse pehle.