फिल्म हनुमान अंश के लोकप्रिय भजन 'जिद पर आ गई पार्वती' का पौराणिक रहस्य, श्रीरामचरितमानस के बालकांड से जुड़ी है कथा फिल्म हनुमान अंश के बुंदेली लोक-भजन 'जिद पर आ गई पार्वती' में वर्णित कथा केवल एक साधारण हठ नहीं, बल्कि श्रीरामचरितमानस के बालकांड में उल्लेखित माता पार्वती की कठोर अपर्णा तपस्या, सप्तर्षियों की परीक्षा और भगवान शिव के प्रति उनके अखंड संकल्प का जीवंत निरूपण है। फिल्म हनुमान अंश का भक्ति से सराबोर सुप्रसिद्ध लोक-भजन 'जिद पर आ गई पार्वती' इन दिनों विभिन्न डिजिटल मंचों, सोशल मीडिया रील्स और संगीत प्रेमियों के बीच अत्यधिक वायरल हो रहा है। बुंदेली लोक शैली के मिठास भरे ग्रामीण सुरों और पारंपरिक वाद्यों के साथ पिरोया गया यह गीत किसी साधारण मान-मनौव्वल, सांसारिक हठ या लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन पौराणिक परंपरा के अत्यंत पावन और प्रेरणादायी प्रसंग को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। इस सुमधुर लोक-गीत की रचना, सुरीली गायकी और संगीत संयोजन साधु तिवारी द्वारा किया गया है। बुंदेली भाषा के सोंधेपन के कारण इस भजन में जहां एक ओर भारतीय लोक-संस्कृति की महक अनुभव होती है, वहीं दूसरी ओर इसमें छिपा आध्यात्मिक भाव श्रोताओं को अंतर्मन तक झकझोर देता है। गीत की मुख्य पंक्ति में जिस 'जिद' शब्द का बारंबार भावपूर्ण उल्लेख किया गया है, वह कोई सामान्य हठ या जिद नहीं है। वास्तव में, यह जगद्जननी माता पार्वती के उस अविचल धर्म-संकल्प, अखंड तपस्या और अटूट निष्ठा का प्रतीक है, जिसके बल पर उन्होंने त्रिलोकपति देवाधिदेव भगवान शिव को अपने स्वामी और पति के रूप में प्राप्त करने का दृढ़ प्रण लिया था। जब देवर्षि नारद के भविष्यवचन के पश्चात ऋषियों ने भी आकर उन्हें अपने मार्ग से विचलित करने का प्रयास किया, तब भी माता पार्वती अपने पथ से रंचमात्र भी नहीं डिगीं। लोकमानस में भक्ति की इसी पराकाष्ठा और दृढ़ संकल्प को 'जिद' की संज्ञा दी गई है। श्रीरामचरितमानस के बालकांड में निहित पौराणिक कथा का आधार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, इस कालजयी बुंदेली लोक-भजन का मूल आधार महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित पवित्र महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के बालकांड में विस्तार से मिलता है। इस पौराणिक आख्यान की पृष्ठभूमि प्रजापति दक्ष के विशाल यज्ञ और सती के देह त्याग की ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई है। पौराणिक विवरणों के अनुसार, जब दक्ष यज्ञ के दौरान प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव का घोर अपमान किया, तो अपने आराध्य और स्वामी के इस अनादर से अत्यंत व्यथित होकर माता सती ने योग अग्नि में अपने भौतिक शरीर की आहुति दे दी थी। परंतु देह त्यागने से पूर्व माता सती ने परमेश्वर से यह वरदान मांगा था कि उनके आने वाले प्रत्येक जन्म में उनका अव्यभिचारी अनुराग केवल और केवल भगवान शिव के पावन चरणों में ही बना रहे। इसी वरदान के परिणामस्वरूप सती का अगला जन्म हिमवान पर्वतों के राजा हिमराज और उनकी महारानी मैना के गृह में माता पार्वती के रूप में हुआ। बाल्यावस्था से ही पार्वती के मन में महादेव के प्रति नैसर्गिक प्रेम, भक्ति और अगाध श्रद्धा समाहित थी। जब एक बार देवर्षि नारद जी का आगमन हिमवान के राजमहल में हुआ और उन्होंने पार्वती की हस्तरेखाओं एवं भविष्य का सूक्ष्म अध्ययन किया, तो उन्होंने स्पष्ट भविष्यवाणी की कि पार्वती का विवाह सर्वसमर्थ भगवान शिव के साथ ही सम्पन्न होगा। देवर्षि नारद के इस फलादेश को माता पार्वती ने अपने जीवन का एकमात्र ध्येय और अविचल संकल्प स्वीकार कर लिया। तारकासुर के आतंक से मुक्ति और माता पार्वती की कठोर अपर्णा तपस्या उसी कालखंड में तारकासुर नामक अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राक्षस के अत्याचारों से तीनों लोक कांप रहे थे। ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए वरदान के कारण तारकासुर का संहार केवल और केवल भगवान शिव और माता पार्वती के ओजस्वी पुत्र द्वारा ही संभव था। परंतु दूसरी ओर, माता सती के विरह में भगवान शिव समस्त सांसारिक संबंधों से विरक्त होकर घोर वैराग्य में चले गए थे और हिमालय की कंदराओं में अखंड समाधि में लीन थे। ऐसी स्थिति में समस्त देवताओं के सामने एक विकट संकट उत्पन्न हो गया था। तारकासुर के अत्याचारों से सृष्टि को मुक्त कराने हेतु देवताओं ने शिव-पार्वती परिणय का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास आरंभ किया। अपने परम आराध्य भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने राजसी वैभव, आभूषण और राजमहल के समस्त सुख-सुविधाओं का पूर्णतः परित्याग कर दिया और घोर जंगलों में जाकर अत्यंत दुष्कर तपस्या प्रारंभ कर दी। उनकी साधना का स्तर अत्यंत कठोर और अद्वितीय था। तपस्या के प्रारंभिक चरण में उन्होंने केवल कंद-मूल, फल और जल ग्रहण किया। तत्पश्चात, उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया और केवल वृक्षों से स्वयं गिरकर आने वाले सूखे पत्तों का सेवन करके वर्षो तक तप करती रहीं। अंतिम चरण में उन्होंने सूखे पत्तों का सेवन भी पूरी तरह बंद कर दिया। पत्तों (पर्ण) को भी पूरी तरह त्याग देने के कारण पौराणिक ग्रंथों एवं शास्त्रों में माता पार्वती को अपर्णा का पावन नाम प्राप्त हुआ। उनकी इस अप्रतिम साधना से तीनों लोक कंपायमान हो उठे और अंततः आकाशवाणी हुई कि उनकी तपस्या सफल हुई है और उन्हें शिव की प्राप्ति अवश्य होगी। सप्तर्षियों द्वारा ली गई कठिन परीक्षा और शिव के औघड़ स्वरूप पर प्रश्न आकाशवाणी के पश्चात भी माता पार्वती की भक्ति की गहराई, प्रेम की निश्छलता और उनके संकल्प की अविचल क्षमता को परखने के लिए सप्तर्षि उनकी तपोभूमि में उपस्थित हुए। ऋषियों की यह मुलाकात साधारण वार्तालाप नहीं थी, बल्कि माता पार्वती के धैर्य और निष्ठा की सबसे बड़ी परीक्षा थी। सप्तर्षियों ने जानबूझकर माता पार्वती के सामने भगवान शिव के औघड़, विकट और अकिंचन स्वरूप का वर्णन करते हुए अनेक प्रश्न खड़े किए। ऋषियों ने तर्क दिया कि भगवान शिव चिता की भस्म अपने पूरे शरीर पर लगाते हैं, गले में जहरीले और भयंकर सर्पों का हार पहनते हैं, जटाधारी हैं, श्मशान घाटों और निर्जन पर्वतों में निवास करते हैं, दिगंबर अवस्था में रहते हैं तथा सांसारिक वैभव, संपत्ति और सुख-साधनों से सर्वथा विरक्त रहते हैं। सप्तर्षियों ने माता पार्वती को अत्यंत आत्मीयता से समझाया कि ऐसे अकिंचन, वैरागी और अनिकेत वर का चयन करने के बजाय उन्हें तीनों लोकों के स्वामी, परम वैभवशाली और सर्वगुण संपन्न भगवान विष्णु का चयन अपने पति के रूप में करना चाहिए। ऋषियों की इस परीक्षा का मूल उद्देश्य यह जानना था कि क्या पार्वती बाहरी स्वरूप, वेशभूषा और भौतिक साधनों से प्रभावित होकर अपने निर्णय से विचलित होंगी या उनका प्रेम सांसारिक सुखों से परे आध्यात्मिक धरातल पर स्थित है। माता पार्वती का अविचल संकल्प और शिव-पार्वती का पावन परिणय सप्तर्षियों की अनेक तार्किक बातों, शंकाओं और प्रलोभनों को सुनने के पश्चात भी माता पार्वती के चित्त में रंचमात्र भी संशय उत्पन्न नहीं हुआ। उन्होंने अत्यंत शांत, गंभीर और दृढ़ वाणी में सप्तर्षियों से कहा कि उनका मन पूरी तरह से महादेव के चरणों में समर्पित हो चुका है और अब वे किसी अन्य देव को अपने स्वामी के रूप में स्वीकार नहीं कर सकतीं। श्रीरामचरितमानस के इस प्रसंग में माता पार्वती का महान संकल्प प्रकट होता है, जिसमें वे स्पष्ट कहती हैं कि चाहे उन्हें इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करोड़ों जन्म क्यों न लेने पड़ें, वे केवल भगवान शिव का ही वरण करेंगी और यदि किसी कारणवश शिव उन्हें प्राप्त नहीं होते हैं, तो वे आजीवन अविवाहित और कुमारी रहना स्वीकार करेंगी, किंतु किसी अन्य के साथ परिणय सूत्र में नहीं बंधेंगी। माता पार्वती के इस अनन्य, निश्छल और अटूट प्रेम को देखकर सप्तर्षि भाव-विभोर हो गए। उन्होंने माना कि पार्वती की परीक्षा पूर्णतः सफल रही है। ऋषियों ने माता पार्वती को जगद्जननी और माया स्वरूपा स्वीकार करते हुए उनके चरणों में प्रणाम किया। इसके पश्चात सप्तर्षियों ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव को पार्वती की इस अनुपम तपस्या, निष्ठा और उनके अडिग निर्णय की पूरी गाथा सुनाई। पार्वती के इस अव्यभिचारी प्रेम को सुनकर महादेव भी अत्यंत प्रसन्न हुए। इसके पश्चात दोनों के शुभ विवाह की राह प्रशस्त हुई और शिव-पार्वती विवाह पौराणिक इतिहास की सबसे मंगलकारी घटना बन गया। साधु तिवारी का यह लोक-गीत इसी पावन पौराणिक गाथा को बुंदेली संस्कृति के माध्यम से जन-जन के हृदय तक पहुंचा रहा है। इसका आप पर असर यह समाचार किसी व्यावसायिक नीति परिवर्तन से न जुड़कर देश और विश्व भर के सनातन धर्म प्रेमियों एवं संगीत श्रद्धालुओं के जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है। • भारत भर में: सांस्कृतिक और धार्मिक संगीत प्रेमियों को बुंदेली लोक-भजन के माध्यम से श्रीरामचरितमानस के कठिन पौराणिक प्रसंगों को सरल और ग्राह्य रूप में समझने का अवसर मिलता है। इससे प्राचीन लोक कलाओं का संरक्षण होता है। • मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड में: क्षेत्रीय लोक भाषा बुंदेली और वहां की गायन शैलियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है, जिससे स्थानीय कलाकारों और लोक संगीत परंपराओं को नया प्रोत्साहन प्राप्त हो रहा है। • युवा पीढ़ी के लिए: इस प्रकार के ट्रेंडिंग गीतों के माध्यम से नई पीढ़ी पौराणिक ग्रंथों, भक्ति परंपराओं और प्राचीन भारतीय साहित्य के प्रति जागरूक हो रही है। • भक्ति एवं साधना मार्ग में: यह प्रसंग श्रद्धालुओं को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य और संकल्प पर अडिग रहने की व्यावहारिक सीख देता है। सवाल-जवाब 1. फिल्म हनुमान अंश के वायरल गाने का क्या नाम है? इस वायरल गाने का नाम 'जिद पर आ गई पार्वती' है, जो बुंदेली लोक-भजन की शैली में गाया गया है। 2. इस गीत को किसने लिखा और संगीतबद्ध किया है? इस लोकप्रिय भजन को साधु तिवारी ने लिखा, गाया और संगीतबद्ध किया है। 3. इस गीत की कथा का मुख्य स्रोत कौन सा पौराणिक ग्रंथ है? पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, इस गीत की कथा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के बालकांड पर आधारित है। 4. माता पार्वती को अपर्णा नाम क्यों मिला था? भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या के दौरान माता पार्वती ने अन्न, जल और अंत में सूखे पत्तों का भी त्याग कर दिया था, इसलिए उन्हें अपर्णा कहा गया। 5. सप्तर्षियों ने माता पार्वती की परीक्षा किस प्रकार ली थी? सप्तर्षियों ने भगवान शिव के श्मशान वासी, भस्मधारी और दिगंबर स्वरूप का हवाला देकर पार्वती को भगवान विष्णु से विवाह करने का सुझाव दिया था, जिसे पार्वती ने अस्वीकार कर दिया। https://trendkia.com/trends/film-hanuman-ansh-ke-lokapriya-bhajana-jida-para-a-gai-parvati-ka-pauranika-rahasya-shri-ramcharitmanas-ke-balakanda-se-juri-hai-k-26888 TrendKia — 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