पहाड़ी धाम की थाली का गौरव: बिना प्याज़-टमाटर ऐसे तैयार करें क्रीमी और सुगंधित हिमाचली चना मदरा कांगड़ा और चंबा की पारंपरिक दावतों में परोसा जाने वाला चना मदरा गाढ़े फेंटे हुए दही, खड़े मसालों और उबले काबुली चने के अनोखे मेल से तैयार होता है। बिना प्याज़ या टमाटर के बनने वाली इस पारंपरिक पहाड़ी ग्रेवी को मलाईदार और दानेदार बनाने की पूरी विधि यहाँ समझें। हिमाचल प्रदेश की समृद्ध पाक कला सादगी और औषधीय मसालों के संतुलित उपयोग के लिए विख्यात है। पहाड़ी घाटियों में उत्सवों, वैवाहिक आयोजनों और शुभ अवसरों पर परोसी जाने वाली पारंपरिक दावत जिसे धाम कहा जाता है, उसमें चना मदरा का विशेष स्थान रहता है। कांगड़ा एवं चंबा की थालियों में सजने वाला यह शाही पकवान उत्तर भारतीय करी से बिल्कुल जुदा अंदाज़ में तैयार होता है। अधिकांश ग्रेवी वाले भारतीय व्यंजनों में जहाँ प्याज़, लहसुन और टमाटर का भारी आधार बनाया जाता है, वहीं इस हिमाचली व्यंजन में इन तीनों ही चीज़ों का कतई उपयोग नहीं किया जाता। इसकी मखमली बनावट और हल्की खटास का पूरा आधार गाढ़ा, मथा हुआ दही और धीमी आंच पर पके साबुत खड़े मसाले होते हैं। मदरा की थाली के लिए आवश्यक सामग्रियां इस व्यंजन को घर पर प्रामाणिक पहाड़ी शैली में तैयार करने के लिए रसोई में कुछ प्रमुख तत्वों का होना अनिवार्य है • काबुली चना: एक कप अच्छी गुणवत्ता वाले सूखे सफ़ेद चने। • गाढ़ा दही: लगभग दो कप ताजा और गाढ़ा दही, जिसका खट्टापन हल्का होना चाहिए। • खाना पकाने का तेल: दो बड़े चम्मच शुद्ध सरसों का तेल, जो पहाड़ी व्यंजनों को पारम्परिक तीखापन देता है। • साबुत खड़े मसाले: एक छोटा चम्मच साबुत जीरा, दो पत्ते तेजपत्ता, एक इंच लम्बा दालचीनी का टुकड़ा, तीन से चार लौंग, चार से पाँच दाने काली मिर्च, दो हरी छोटी इलायची तथा एक बड़ी काली इलायची। • पिसे हुए मसाले: आधा छोटा चम्मच पिसी हल्दी, आधा छोटा चम्मच पिसी लाल मिर्च, एक छोटा चम्मच सूखा धनिया पाउडर और आधा छोटा चम्मच पिसा गरम मसाला। • अन्य सहायक सामग्री: दो साबुत हरी मिर्च, स्वादानुसार सादा नमक और ग्रेवी के गाढ़ेपन को स्थिरता देने के लिए एक छोटा चम्मच चावल का महीन आटा। काबुली चनों को उबालने और पकाने की तैयारी शाही मदरा की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि चने भीतर तक कितने मुलायम हैं। सबसे पहले सूखे चनों को ताजे पानी से दो बार रगड़कर साफ कर लें ताकि ऊपरी धूल निकल जाए। इसके उपरांत एक गहरे बर्तन में भरपूर पानी डालकर इन्हें रातभर अथवा न्यूनतम छह से आठ घंटों के लिए भिगोने हेतु रख दें। जब चने पर्याप्त नमी सोखकर अपने सामान्य आकार से लगभग दुगुने हो जाएं, तब उस पानी को निथार दें और एक बार फिर धो लें। अब भीगे हुए चनों को प्रेशर कुकर में स्थानांतरित करें और इतना पानी डालें कि सभी दाने अच्छी तरह जलमग्न हो जाएं। इसमें एक चुटकी नमक मिलाकर कुकर का ढक्कन कस दें। मध्यम आंच पर रखकर लगभग चार से पांच सीटियां आने तक पकाएं। जब कुकर का भाप का दबाव स्वतः समाप्त हो जाए, तब ढक्कन खोलकर चने की नरमी परखें। ध्यान रहे कि चने उंगलियों के हल्के दबाव से दबने चाहिए, परंतु वे पूरी तरह गलकर भरता या पेस्ट में तब्दील नहीं होने चाहिए। मसालेदार मखमली दही का आधार तैयार करना दही ही इस व्यंजन की आत्मा है, अतः इसके चुनाव और मिश्रण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। अत्यधिक खट्टा दही मदरा के मूल स्वाद को बिगाड़ सकता है, इसलिए ताजे व गाढ़े दही का प्रयोग श्रेयस्कर रहता है। एक चौड़े कटोरे में दही निकालकर उसे मथनी या व्हिस्क की मदद से तब तक फेंटें जब तक कि वह बिल्कुल रेशमी और चिकना न दिखने लगे। चिकने दही में अब हल्दी, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर और गरम मसाला डालकर भलीभांति फेंट लें। मसालों को पहले ही ठंडे दही में घोल देने से एक तो उनकी गांठें नहीं बनतीं और दूसरा तेल में जाकर उनके जलने का भय समाप्त हो जाता है। यदि दही बहुत अधिक सूखा या गाढ़ा प्रतीत हो, तो उसमें थोड़ा सा पानी मिलाया जा सकता है, यद्यपि इस बात का ध्यान रखें कि मदरा की पारंपरिक ग्रेवी पतली नहीं बल्कि गाढ़ी और लच्छेदार रखी जाती है। ग्रेवी में चिकनाई और सही ठहराव बनाए रखने के लिए इसी चरण पर एक छोटा चम्मच चावल का आटा भी अच्छी तरह मिलाया जा सकता है। सरसों के तेल में खड़े मसालों का सुवासित तड़का पारंपरिक पहाड़ी रसोई में खाना पकाने के लिए लोहे या पीतल की भारी कड़ाही का चलन रहा है। घर पर बनाते समय भी मोटे तले वाली कड़ाही का चयन करें ताकि ग्रेवी नीचे चिपके नहीं। कड़ाही में दो बड़े चम्मच सरसों का तेल डालकर तब तक गर्म करें जब तक कि उसमें से हल्का धुआं न उठने लगे। इस प्रक्रिया से सरसों के तेल का स्वाभाविक कड़वापन और तीखी गंध समाप्त हो जाती है। इसके पश्चात आंच को एकदम मंद कर दें और तेल का तापमान थोड़ा सामान्य होने दें। अब इस गुनगुने तेल में जीरा, तेजपत्ता, दालचीनी, लौंग, साबुत काली मिर्च, छोटी इलायची और बड़ी इलायची एक साथ डालें। इन साबुत मसालों को मंद आंच पर केवल कुछ क्षणों तक चटकने दें। जैसे ही गर्म तेल में मसालों की भीनी-भीनी खुशबू उभरने लगे, समझें कि तड़का दही को ग्रहण करने के लिए तैयार है। मसालों को अधिक देर तक न भूनें, अन्यथा वे जलकर पूरी ग्रेवी के स्वाद को कड़वा बना सकते हैं। दही पकाने की सही तकनीक और ग्रेवी का संयोजन इस पूरी विधि का सबसे संजीदा और नाजुक चरण दही को कड़ाही में डालना है। तेज आंच या अत्यधिक गर्म तेल में दही डालते ही उसके फटने और पानी अलग होने का जोखिम रहता है। अतएव आंच को न्यूनतम स्तर पर रखें और तैयार फेंटे हुए मसालेदार दही को एक हाथ से धीरे-धीरे कड़ाही में डालें, जबकि दूसरे हाथ से करछुल को बिना रुके निरंतर वृत्ताकार घुमाते रहें। जब तक कड़ाही के मिश्रण में पहला उबाल न आ जाए, तब तक चम्मच को चलाना बिल्कुल बंद न करें। एक बार जब ग्रेवी में बुलबुले उठने लगें और तेल किनारों पर चमकने लगे, तो इसका अर्थ है कि दही भली-भांति पक चुका है और फटने का खतरा टल चुका है। अब इसमें स्वादानुसार नमक और साबुत हरी मिर्चें डाल दें। नमक को शुरुआत में दही के साथ कभी न डालें, क्योंकि इससे भी दही के फटने की संभावना बढ़ जाती है। चनों का सम्मिलन और अंतिम दम उबलती हुई मखमली दही की ग्रेवी में अब पहले से उबाले गए काबुली चने पानी से अलग करके डाल दें। चनों को ग्रेवी के साथ अच्छी तरह मिला लें ताकि प्रत्येक दाने पर मसालों और दही का आवरण चढ़ जाए। यदि आवश्यकता महसूस हो, तो चनों के उबले हुए पानी का थोड़ा सा हिस्सा ग्रेवी की तरलता को संतुलित करने के लिए डाला जा सकता है। कड़ाही को ढक्कन से ढक दें और धीमी आंच पर आठ से दस मिनट तक पकने दें। इस धीमी प्रक्रिया से खड़े मसालों का संपूर्ण अर्क और दही की खटास चनों के भीतर तक समाहित हो जाती है। अंत में ढक्कन हटाकर देखें; जब सतह पर सुनहरी चमक दिखने लगे और ग्रेवी गाढ़ी होकर दानों से लिपट जाए, तब गैस बंद कर दें। तैयार हिमाचली शाही चना मदरा को गरमा-गरम बासमती चावल या पारंपरिक रोटियों के साथ परोसें। इसका आप पर असर इस पारंपरिक रेसिपी से दैनिक रसोई में बिना प्याज़ और टमाटर के भी स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन तैयार करने में मदद मिलती है। • रसोई के बजट में: जब बाज़ार में टमाटर और प्याज़ के भाव चढ़ जाते हैं, तब यह दही आधारित व्यंजन बिना अतिरिक्त ख़र्च के शानदार शाही दावत तैयार करने का बेहतरीन विकल्प देता है। इससे परिवारों को महंगाई के समय भी पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन पकाने में सहूलियत मिलती है। • व्रत और सात्विक भोजन में: जो लोग सात्विक भोजन पसंद करते हैं या विशिष्ट त्योहारों पर प्याज़ और लहसुन का परहेज़ रखते हैं, उनके लिए यह एक मुकम्मल प्रोटीन युक्त व्यंजन साबित होता है। इसमें उबले काबुली चने होने से शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और पोषण बिना किसी भारी मसाले के प्राप्त होता है। • खाना पकाने की तकनीक में: दही को फटने से बचाने का यह पारंपरिक तरीका सीखकर घरेलू रसोइये अन्य कई कढ़ी और ग्रेवी आधारित भारतीय व्यंजनों को भी बेहतर तरीके से बना सकते हैं। लगातार चम्मच चलाना और नमक अंत में डालना ग्रेवी को रेशमी बनावट देने का अचूक नियम है। • खानपान की विविधता में: अपने नियमित छोले या राजमा के ढर्रे से हटकर लोग हिमाचली संस्कृति के समृद्ध और हल्के स्वाद का आनंद घर बैठे ले सकते हैं। यह बच्चों और बड़ों दोनों के पाचन के लिए सुपाच्य और संतुलित विकल्प प्रस्तुत करता है। ऐसा क्यों हुआ हिमाचल प्रदेश की दुर्गम जलवायु और सांस्कृतिक परंपराओं ने इस विशेष व्यंजन शैली को जन्म दिया, जहाँ ताजी सब्जियों के अभाव में भी समृद्ध भोजन तैयार किया जाता रहा है। • भौगोलिक परिस्थितियां: पहाड़ी क्षेत्रों में कठोर सर्दियों के दौरान ताजी सब्जियां, प्याज़ और टमाटर आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, जिसके कारण स्थानीय लोग सूखे अनाजों, दालों और पशुपालन से मिलने वाले दूध-दही पर निर्भर रहते थे। इसी आवश्यकता ने बिना गीली सब्जियों के केवल सूखे काबुली चने, गाढ़े दही और खड़े मसालों से बनने वाले मदरा को जन्म दिया। • धाम की पारंपरिक रीति: हिमाचल के कांगड़ा और चंबा अंचलों में विवाह और शुभ उत्सवों पर बनने वाली सामुदायिक दावत 'धाम' को बोटी यानी पारंपरिक रसोइये तैयार करते हैं, जिसमें सात्विक नियमों के तहत प्याज़ और लहसुन का प्रयोग वर्जित होता है। सात्विक सिद्धांतों का पालन करते हुए भी समृद्ध स्वाद उत्पन्न करने के लिए खड़े मसालों और दही का यह अनूठा सम्मिश्रण विकसित किया गया। • दही पकाने का वैज्ञानिक आधार: दही में मौजूद प्रोटीन गर्म तेल और तेज आंच के संपर्क में आते ही थक्के बनकर फटने लगता है, जिसे रोकने के लिए पारंपरिक रसोइयों ने मथने, धीमी आंच पर पकाने और चावल के आटे का हल्का सहारा लेने की विधि स्थापित की। इस व्यवस्थित प्रक्रिया से दही बिना फटे एकसार और गाढ़ी मलाईदार ग्रेवी में बदल जाता है। सवाल-जवाब 1. क्या हिमाचली चना मदरा बनाने में प्याज़ या लहसुन का इस्तेमाल होता है? नहीं, पारंपरिक हिमाचली शाही चना मदरा की मुख्य पहचान ही यही है कि इसमें प्याज़, लहसुन या टमाटर का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता। 2. ग्रेवी पकाते समय दही फटने से कैसे रोका जाए? दही को पहले अच्छी तरह फेंटें, आंच बिल्कुल धीमी रखें, कड़ाही में डालते ही लगातार चम्मच चलाते रहें और नमक हमेशा अंत में उबाल आने के बाद ही डालें। 3. मदरा की ग्रेवी को गाढ़ा करने के लिए क्या मिलाया जाता है? ग्रेवी को सही बनावट और गाढ़ापन देने के लिए फेंटे हुए दही में एक छोटा चम्मच चावल का आटा मिलाया जा सकता है। 4. काबुली चने को उबालने से पहले कितनी देर भिगोना चाहिए? सूखे चनों को पकाने से पूर्व कम से कम 6 से 8 घंटे या पूरी रात के लिए पर्याप्त पानी में भिगोकर रखना आवश्यक है। 5. शाही चना मदरा किस राज्य का पारंपरिक व्यंजन है? यह मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश का मशहूर पारंपरिक व्यंजन है, जिसे विशेषकर कांगड़ा और चंबा की धाम दावतों में परोसा जाता है। https://trendkia.com/trends/himachal-ki-parnparika-thali-ka-gaurava-bina-pyaja-tamatara-aise-banaen-shahi-chana-madra-53217 TrendKia — Har trend, sabse pehle.