# कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में नौ दिनों तक शक्ति, कला और ज्ञान की अनूठी परंपराएं

> दक्षिण भारतीय राज्यों में नवरात्रि केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि मैसूर का नादा हब्बा, गुड़ियों का बोम्माइ कोलु, आयुध पूजा और केरल का विद्यारंभम इसे सांस्कृतिक मेल-मिलाप का महापर्व बनाते हैं।

**Type:** article · **Category:** ट्रेंड्स · **Published:** 2026-10-06 · **Source:** TrendKia
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**Tags:** दक्षिण भारत नवरात्रि, मैसूर दशहरा, बोम्माइ कोलु, आयुध पूजा, विद्यारंभम, नादा हब्बा, विजयादशमी

भारत के उत्तरी हिस्सों में नवरात्रि की पहचान जहां मुख्य रूप से नौ दिनों के उपवास, डांडिया, गरबा और विजयादशमी पर रावण दहन से जुड़ी होती है, वहीं प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में इस पावन पर्व का स्वरूप पूरी तरह अलग और अनूठा नजर आता है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में यह नौ दिवसीय उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर कला, संगीत, सामाजिक सौहार्द और ज्ञान के सम्मान का केंद्र बन जाता है। इस दौरान पूरा दक्षिण भारत अपनी ऐतिहासिक विरासत और जीवंत परंपराओं के भव्य रंगों में सराबोर दिखाई देता है।

## विजयनगर साम्राज्य की विरासत और मैसूर का नादा हब्बा
कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी मैसूर में नवरात्रि का पर्व राजसी ठाट-बाट के साथ मनाया जाता है। यहां इसे राज्य उत्सव के रूप में मान्यता प्राप्त है और स्थानीय भाषा में इसे नादा हब्बा कहा जाता है। इस ऐतिहासिक आयोजन की जड़ें विजयनगर साम्राज्य के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी हुई हैं। इन नौ दिनों के दौरान पूरे मैसूर नगर को किसी नववधू की तरह रोशनी और फूलों से सजाया जाता है।

उत्सव का मुख्य आकर्षण विजयादशमी के दिन आयोजित होने वाला विश्वप्रसिद्ध जुलूस होता है। इस भव्य यात्रा में माता चामुंडेश्वरी की सोने की प्रतिमा को स्वर्ण मंडित अंबारी में रखकर एक सजे-धजे मुख्य हाथी की पीठ पर विराजमान कराया जाता है। यह विशाल शोभायात्रा ऐतिहासिक मैसूर पैलेस के प्रांगण से आरंभ होकर बन्नुमंतप मैदान तक पहुंचती है। उत्सव के दिनों में मैसूर पैलेस को लाखों-करोड़ों रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगाया जाता है, जिसका दीदार करने के लिए देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लाखों सैलानी मैसूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही पूरे शहर में शास्त्रीय संगीत, पारंपरिक नृत्य और विशाल सांस्कृतिक प्रदर्शनियों का सिलसिला लगातार चलता रहता है।

## घरों में सजती है सीढ़ीनुमा गुड़ियों की प्रदर्शनी बोम्माइ कोलु
तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के घरों में नवरात्रि के दौरान सबसे मनमोहक और आत्मीय परंपरा कोलु अथवा बोम्माइ कोलु की देखने को मिलती है। यह आयोजन परिवारों और पड़ोसियों के बीच संवाद और स्नेह को गहरा करने का माध्यम बनता है।

इस परंपरा के तहत घरों के बैठक कक्ष में लकड़ी अथवा स्टील के पाटे की मदद से विषम संख्या में सीढ़ियां बनाई जाती हैं, जैसे कि 3, 5, 7, 9 या उससे भी अधिक पायदान। इन सीढ़ियों पर टेराकोटा, पक्की मिट्टी और लकड़ी से निर्मित बेहद खूबसूरत पुतलों और गुड़ियों को व्यवस्थित ढंग से सजाया जाता है। इनमें देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा रामायण और महाभारत जैसे महान पौराणिक ग्रंथों के प्रसंग, पूज्य संतों के जीवन दृश्य और दैनिक जनजीवन के कामकाज को दर्शाने वाले रूपांकन शामिल होते हैं।

नौ दिनों की शाम होते ही महिलाएं और नन्हें बच्चे पारंपरिक वस्त्र पहनकर पास-पड़ोस और रिश्तेदारों के घरों में कोलु देखने जाते हैं। इस अवसर पर घरों में भक्ति संगीत और पारंपरिक गीतों की प्रस्तुतियां होती हैं। आने वाले मेहमानों को प्रसाद दिया जाता है और महिलाओं को आदरपूर्वक उपहार स्वरूप तांबूलम भेंट किया जाता है, जिससे समाज में परस्पर प्रेम और मेल-जोल की भावना मजबूत होती है।

## आयुध पूजा और सरस्वती आराधना से श्रम और ज्ञान को नमन
दक्षिण भारतीय राज्यों में नवरात्रि के अंतिम तीन दिनों का विशेष महत्व होता है, जिन्हें पूर्ण रूप से विद्या, कला और आजीविका के साधनों के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित किया गया है।

महा अष्टमी और महानवमी की पावन तिथियों पर घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, दुकानों और कार्यस्थलों पर आयुध पूजा का विधान संपन्न किया जाता है। इस दिन संगीत से जुड़े वाद्ययंत्रों, अध्ययन की पुस्तकों, कंप्यूटरों, काम में आने वाले औजारों और रोजमर्रा के आवागमन के साधनों जैसे कार और बाइक की गहन सफाई की जाती है। तत्पश्चात उन सभी उपकरणों की विधि-विधान से पूजा की जाती है।

यह विधान इस गहरे विचार को स्थापित करता है कि मानव जीवन को सुगम बनाने और भरण-पोषण की राह दिखाने वाले हर एक उपकरण के प्रति इंसान को सदा कृतज्ञ रहना चाहिए। इसके साथ ही विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की आराधना कर ज्ञान और विवेक का आशीर्वाद मांगा जाता है।

## केरल में नन्हें बच्चों की शिक्षा का श्रीगणेश और विद्यारंभम
केरल में नवरात्रि उत्सव का समापन विजयादशमी के पावन दिन पर एक अत्यंत पवित्र और भावुक संस्कार के साथ होता है, जिसे विद्यारंभम के नाम से जाना जाता है। इस दिन समाज के 2 से 3 वर्ष की आयु के छोटे बच्चों को औपचारिक रूप से अक्षर ज्ञान और विद्या के संसार में प्रवेश कराया जाता है।

मंदिरों के परिसरों में अथवा विद्वान आचार्यों के सानिध्य में एक विशेष थाली या तश्तरी में चावल अथवा बालू रेत रखी जाती है। बच्चे की तर्जनी उंगली को पकड़कर उस पर पवित्र मंत्र 'ॐ हरि श्री गणपति नमः' लिखवाया जाता है। इस प्रकार नौनिहालों के अध्ययन की विधिवत शुरुआत कराई जाती है। दक्षिण भारत की यह समग्र नवरात्रि महज एक उपासना पद्धति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संजोकर रखी गई कला, परस्पर कृतज्ञता और बौद्धिक मूल्यों का अनुपम उत्सव सिद्ध होती है।

## इसका आप पर असर
दक्षिण भारत के इन सांस्कृतिक आयोजनों से आम नागरिकों के पारिवारिक जीवन, यात्रा योजनाओं और बच्चों की शिक्षा पर सीधा असर पड़ता है।

- **पर्यटन और यात्रा:** नवरात्रि और दशहरे के दौरान मैसूर पैलेस की भव्य रोशनी और जंबो सवारी देखने के लिए लाखों पर्यटक आते हैं। अगर आप मैसूर जाने की योजना बना रहे हैं, तो होटल और परिवहन की बुकिंग पहले से करा लें ताकि भीड़ में परेशानी न हो।
- **पारिवारिक व सामाजिक मेल-जोल:** कोलु उत्सव के दौरान शाम के समय पड़ोसियों और रिश्तेदारों के घर जाने की परंपरा सामाजिक संबंधों को नया जीवन देती है। इस अवसर पर तांबूलम उपहार देने और साथ मिलकर लोकगीत गाने से सामुदायिक एकता मजबूत होती है।
- **व्यावसायिक व कामकाजी उपकरणों की सुरक्षा:** आयुध पूजा के दिन दफ्तरों, दुकानों, वाहनों और औजारों की अनिवार्य सफाई और पूजा की जाती है। यह रस्म कामगारों और व्यापारियों को अपने आजीविका के साधनों की मरम्मत और रखरखाव पर ध्यान देने का मौका देती है।
- **शिशु शिक्षा का आरंभ:** विजयादशमी के दिन केरल में विद्यारंभम के जरिए छोटे बच्चों का अक्षर ज्ञान शुरू कराने की विशेष महत्ता है। माता-पिता अपने दो से तीन साल के बच्चों के पहले शैक्षणिक कदम के लिए मंदिरों और योग्य आचार्यों के पास इस दिन पहुंचते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
दक्षिण भारत में नवरात्रि का यह विशिष्ट स्वरूप सदियों पुरानी राजशाही परंपराओं, स्थानीय लोककलाओं और ज्ञान आधारित दर्शन के ऐतिहासिक मेल के कारण विकसित हुआ।

- **ऐतिहासिक विजयनगर साम्राज्य का प्रभाव:** मैसूर के नादा हब्बा का सीधा संबंध विजयनगर साम्राज्य की उस परंपरा से है जहां राज्य की समृद्धि और सैन्य शक्ति का प्रदर्शन उत्सव के रूप में होता था। उसी राजकीय परंपरा को बाद के शासकों ने आगे बढ़ाया और आज यह कर्नाटक का राजकीय पर्व बन चुका है।
- **शिल्प कला और संवाद की आवश्यकता:** बोम्माइ कोलु की शुरुआत घरों में हस्तशिल्प और टेराकोटा कला को जीवित रखने और समाज को जोड़ने के लिए हुई थी। सीढ़ियों पर गुड़ियों को सजाकर कथाएं सुनाने का यह तरीका आने वाली पीढ़ियों को संस्कृति सिखाने का माध्यम बना।
- **श्रम और जीविका के प्रति कृतज्ञता का दर्शन:** कृषि, शिल्प और अध्ययन पर निर्भर समाज में उन औजारों का सम्मान करना जरूरी माना गया जो आजीविका चलाते हैं। इसी सोच से महा अष्टमी और नवमी के दिन औजारों, किताबों और संगीत वाद्ययंत्रों की आयुध पूजा की प्रथा स्थापित हुई।
- **अक्षर दीक्षा का धार्मिक आधार:** विजयादशमी को विजय और किसी भी शुभ कार्य के आरंभ का सबसे उत्तम दिन माना जाता है। इसी आध्यात्मिक विश्वास के चलते केरल में नवजात बच्चों की पढ़ाई की शुरुआत के लिए विद्यारंभम संस्कार को इस तिथि से जोड़ा गया।

## सवाल-जवाब

### 1. कर्नाटक में मैसूर के दशहरे को किस नाम से जाना जाता है?
कर्नाटक में मैसूर के राजकीय दशहरा उत्सव को स्थानीय स्तर पर 'नादा हब्बा' कहा जाता है।

### 2. मैसूर में विजयादशमी के जुलूस में मुख्य आकर्षण क्या होता है?
सजे-धजे मुख्य हाथी पर सवार सोने की अंबारी में माता चामुंडेश्वरी की प्रतिमा विराजमान होती है, जो मैसूर पैलेस से बन्नुमंतप तक जाती है।

### 3. बोम्माइ कोलु उत्सव में सीढ़ियां किस क्रम में बनाई जाती हैं?
कोलु में लकड़ी या स्टील के पाटे पर 3, 5, 7, 9 या उससे अधिक विषम संख्या वाली सीढ़ियों पर गुड़ियों को सजाया जाता है।

### 4. आयुध पूजा के दिन किन चीजों की पूजा की जाती है?
इस दिन संगीत वाद्ययंत्रों, किताबों, कंप्यूटरों, औजारों और रोजमर्रा के वाहनों जैसे कार व बाइक को साफ करके उनकी पूजा की जाती है।

### 5. केरल में विद्यारंभम संस्कार किस दिन और किस उम्र के बच्चों के लिए होता है?
यह संस्कार विजयादशमी के दिन आमतौर पर 2 से 3 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए आयोजित किया जाता है।

### 6. विद्यारंभम के दौरान बच्चे थाली में क्या लिखते हैं?
बच्चे चावल या रेत से भरी तश्तरी में अपनी तर्जनी उंगली से 'ॐ हरि श्री गणपति नमः' लिखकर पढ़ाई की औपचारिक शुरुआत करते हैं।

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