# शिक्षा की अनोखी अलख: तेंदुए और जंगली जानवरों के डर के बीच रोजाना पांच किलोमीटर पैदल चलकर इकलौती छात्रा को पढ़ाने पहुंचते हैं जीवन मिठारी

> महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के एक दुर्गम गांव में 55 वर्षीय शिक्षक जीवन मिठारी पिछले 13 सालों से हर रोज घने जंगलों से गुजरकर जिला परिषद स्कूल पहुंचते हैं, जहां केवल एक ही छात्रा पढ़ने आती है।

**Type:** article · **Category:** ट्रेंड्स · **Published:** 2026-09-13 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/trends/shiksha-ki-anokhi-alakh-tendue-aur-jangli-jaanvaron-ke-dar-ke-beech-rojana-paanch-kilometer-paidal-chalkar-iklauti-chhatra-ko-padh-31922 · **Language:** Hindi
**Tags:** कोल्हापुर न्यूज़, प्रेरणादायक शिक्षक, जीवन मिठारी, ग्रामीण शिक्षा, महाराष्ट्र न्यूज़, प्राथमिक विद्यालय

कल्पना कीजिए एक ऐसे सफर की, जहां हर मोड़ पर मौत का साया मंडराता हो, जहां झाड़ियों के पीछे से कभी भी एक तेंदुआ छलांग लगा सकता है या विशालकाय जंगली गौर रास्ता रोक सकता है। ऐसी खतरनाक परिस्थितियों में जहां आम इंसान कदम रखने से भी कतराए, वहां एक 55 साल के शिक्षक पिछले 13 वर्षों से हर दिन पांच किलोमीटर का पैदल सफर तय कर रहे हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में यह किसी फिल्मी पटकथा जैसी लगने वाली कहानी हकीकत की जमीन पर रोज जी जा रही है। जिला परिषद के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने वाले जीवन मिठारी हर सुबह घने जंगलों के बीच से होकर गुजरते हैं, ताकि वहां इंतजार कर रही अपनी इकलौती नन्हीं छात्रा को अक्षर ज्ञान दे सकें। जहां आधुनिक युग में शिक्षक सुगम रास्तों और आरामदायक वाहनों की मांग करते हैं, वहीं मिठारी सर के लिए हर दिन की सुबह एक नया इम्तिहान लेकर आती है।

 

## कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और कावळटेक धनगरवाड़ा का एकांत

यह असाधारण कहानी महाराष्ट्र और सिंधुदुर्ग जिले की सीमा के पास बसे गगनबावड़ा तालुका के कावळटेक धनगरवाड़ा गांव की है। यह इलाका पश्चिमी घाट की पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा एक बेहद ही दुर्गम और दूर-दराज का क्षेत्र है। इस गांव की विडंबना यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी यहां बिजली की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। इतना ही नहीं, इस बस्ती तक पहुंचने के लिए कोई पक्की या कच्ची सड़क भी मौजूद नहीं है। यदि कोई व्यक्ति किसी वाहन से इस गांव की तरफ जाना चाहे, तो सबसे नजदीकी सड़क भी इस गांव से लगभग ढाई किलोमीटर दूर ही खत्म हो जाती है। इसके बाद का पूरा रास्ता ऊबड़-खाबड़, पथरीला और घने पेड़ों से घिरा हुआ है, जहां केवल पैदल चलकर ही पहुंचा जा सकता है।

 

## सम्मानजनक पद छोड़कर दुर्गम चुनौती को चुनने की दास्तान

जीवन मिठारी के इस स्कूल में आने की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। यह कोई प्रशासनिक मजबूरी या सजा के तौर पर मिली पोस्टिंग नहीं थी, बल्कि उन्होंने स्वयं इस चुनौतीपूर्ण जीवन को चुना था। बात 26 जुलाई, 2013 की है, जब उन्होंने खुद आगे बढ़कर इस सुदूर स्कूल में अपना तबादला करवाया था। उस समय वह कोल्हापुर जिला प्राइमरी टीचर्स कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन जैसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पद पर कार्यरत थे। प्रशासनिक गलियारों में उनका अच्छा-खासा रुतबा था। अक्सर समाज में यह आलोचना की जाती थी कि जो शिक्षक पहुंच वाले या वरिष्ठ होते हैं, वे हमेशा सुगम और शहरी इलाकों में ही बने रहते हैं और कठिन पोस्टिंग से बचते हैं। इस बात ने जीवन मिठारी के स्वाभिमान और कर्तव्यबोध को झकझोर दिया। उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित करने का संकल्प लिया और जानबूझकर सबसे कठिन माने जाने वाले इस स्कूल की राह चुनी।

 

## पलायन की मार और सिमटती आबादी का दर्द

समय के क्रूर थपेड़ों ने इस गांव की तस्वीर को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। एक समय था जब कावळटेक धनगरवाड़ा में लगभग 70 से 100 परिवार रहा करते थे, और गांव बच्चों की किलकारियों से गूंजता रहता था। लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी, सड़क और बिजली के अभाव के कारण धीरे-धीरे लोगों ने यहां से पलायन करना शुरू कर दिया। रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में लोग शहरों की ओर रुख कर गए, जिससे यहां की आबादी नगण्य रह गई। वर्तमान समय में इस स्कूल के आधिकारिक रिकॉर्ड में केवल तीसरी कक्षा की एक छात्रा, स्वरा बोडके, का ही नाम दर्ज है। दिलचस्प बात यह है कि स्वरा की एक छोटी बहन भी हर रोज उसके साथ क्लास में बैठती है। चूंकि इस पूरी बस्ती में कोई आंगनवाड़ी केंद्र या प्राथमिक पाठशाला पूर्व केंद्र नहीं है, इसलिए वह भी अपनी बड़ी बहन के साथ स्कूल आ जाती है और ककहरा सीखने की कोशिश करती है।

 

## जंगली जानवरों के साये में जीवन और स्थानीय लोगों का संघर्ष

कावळटेक धनगरवाड़ा के निवासियों का जीवन बेहद कठिन है। यहां के लोग मुख्य रूप से जीविकोपार्जन के लिए पारंपरिक छोटी खेती, जंगलों से सूखी लकड़ियां इकट्ठा करने और जामुन तथा करवंद जैसे मौसमी जंगली फलों को बेचकर अपना गुजारा करते हैं। इस जंगली इलाके में खेती करना भी किसी जंग से कम नहीं है। फसलों को जंगली सूअरों, हिरणों और गौर से बचाने के लिए किसानों को अपने खेतों के चारों ओर बहुत मजबूत दोहरी बाड़ लगानी पड़ती है। बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चुनौती है। यदि इस स्कूल को बंद कर दिया जाए, तो बच्चों के पास अगला विकल्प धुंडावड़े गांव का स्कूल है, जो यहां से लगभग 5.5 किलोमीटर दूर स्थित है। इसका मतलब यह हुआ कि एक छोटे बच्चे को रोजाना आने-जाने में 11 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी, जो इस पथरीले और जंगली रास्ते पर पूरी तरह से अव्यावहारिक और खतरनाक है।

 

## कर्तव्य पथ पर अडिग और भविष्य की उम्मीदें

इतने कम दाखिले और बेहद विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जीवन मिठारी के हौसले में कोई कमी नहीं आई है। वह अपनी सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे हैं, जो मई 2029 में होनी तय है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका जज्बा युवाओं को मात देता है। वह मुस्कुराते हुए कहते हैं कि हर रोज का यह पांच किलोमीटर का कठिन पैदल सफर अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है और यह उनके लिए एक बेहतरीन कसरत की तरह है। हालांकि, वह स्कूल की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। उनका मानना है कि जंगली जानवरों के खतरे को देखते हुए इस छोटे से स्कूल परिसर के चारों तरफ एक मजबूत सुरक्षा दीवार का होना बेहद जरूरी है। जीवन मिठारी की यह तपस्या साबित करती है कि यदि मन में कुछ करने का सच्चा जज्बा हो, तो भौतिक असुविधाएं कभी भी मार्ग में बाधा नहीं बन सकतीं।

## इसका आप पर असर
यह समाचार भारत के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा और बुनियादी ढांचे की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है। इससे पता चलता है कि देश के सुदूर क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा देने के लिए आज भी असाधारण व्यक्तिगत प्रयासों की आवश्यकता होती है।

  - **राष्ट्रीय स्तर पर:** यह कहानी नीति निर्माताओं का ध्यान ग्रामीण इलाकों में स्कूल विलीनीकरण (मर्जर) नीतियों की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर खींचती है। जहां कम संख्या वाले स्कूलों को बंद करने से गरीब बच्चों के लिए शिक्षा का रास्ता पूरी तरह बंद हो सकता है।

  - **कोल्हापुर और सिंधुदुर्ग जिलों में:** यह वन क्षेत्रों और सीमावर्ती बस्तियों में तुरंत बिजली, पक्की सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

  - **वन्यजीव क्षेत्रों के पास रहने वाले लोगों के लिए:** यह स्कूली परिसरों में सुरक्षा दीवार (बाउंड्री वॉल) जैसी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था की मांग को मजबूत करता है ताकि बच्चे हिंसक जानवरों से सुरक्षित रह सकें।

## ऐसा क्यों हुआ
यह स्थिति मुख्य रूप से भौगोलिक अलगाव, बुनियादी ढांचे के अभाव और इसके कारण हुए भारी पलायन के कारण उत्पन्न हुई है।

  - **स्वैच्छिक कदम:** शिक्षक जीवन मिठारी ने 2013 में खुद इस दुर्गम जगह को चुना ताकि वे वरिष्ठ शिक्षकों के प्रति बनी इस धारणा को तोड़ सकें कि वे कठिन पोस्टिंग से बचते हैं।

  - **तीव्र पलायन:** गांव में बिजली, सड़क और रोजगार के अवसरों की कमी के चलते पूर्व में रहने वाले 70-100 परिवारों ने गांव छोड़ दिया, जिससे स्कूल में छात्रों की संख्या घटकर केवल एक रह गई।

  - **भौगोलिक अलगाव:** कावळटेक धनगरवाड़ा पश्चिमी घाट के अत्यंत घने जंगलों के बीच बसा है, जहां पक्की सड़क बनाना पर्यावरण और वन नियमों के कारण भी कठिन रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. जीवन मिठारी कौन हैं और वह कहां पढ़ाते हैं?
जीवन मिठारी महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के गगनबावड़ा तालुका के कावळटेक धनगरवाड़ा गांव में स्थित जिला परिषद प्राथमिक स्कूल में कार्यरत एक समर्पित शिक्षक हैं।

### 2. शिक्षक को रोजाना स्कूल पहुंचने के लिए कितनी दूरी तय करनी पड़ती है?
उन्हें रोजाना घने जंगलों के बीच से होकर लगभग पांच किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है।

### 3. इस स्कूल में कुल कितने छात्र नामांकित हैं?
इस स्कूल में आधिकारिक तौर पर केवल तीसरी कक्षा की एक छात्रा, स्वरा बोडके ही नामांकित है।

### 4. कावळटेक धनगरवाड़ा गांव में बिजली और सड़क की क्या स्थिति है?
इस गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है और स्कूल तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। सबसे नजदीकी सड़क भी स्कूल से लगभग ढाई किलोमीटर दूर समाप्त हो जाती है।

### 5. जीवन मिठारी ने इस दुर्गम स्कूल को खुद क्यों चुना था?
वे कोल्हापुर जिला प्राइमरी टीचर्स कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन थे, लेकिन वे इस धारणा को गलत साबित करना चाहते थे कि वरिष्ठ या रसूखदार शिक्षक कठिन और दुर्गम पोस्टिंग पर काम नहीं करते।

### 6. शिक्षक जीवन मिठारी कब सेवानिवृत्त होने वाले हैं?
जीवन मिठारी मई 2029 में अपनी सेवा से सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

## प्रेरणा और सबक
जीवन मिठारी का सफर हमें सिखाता है कि इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी परिस्थिति को अनुकूल बनाया जा सकता है।

  - **पदों की सुविधा से ऊपर कर्तव्य:** कोल्हापुर टीचर्स कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन जैसे प्रभावशाली पद को छोड़कर एक दुर्गम गांव का चुनाव करना सिखाता है कि वास्तविक सेवा जमीन पर काम करने से ही होती है।

  - **एक व्यक्ति का मूल्य:** स्कूल में केवल एक ही छात्रा होने के बावजूद अपनी जिम्मेदारी को कम न आंकना यह दर्शाता है कि हर एक बच्चे का भविष्य समान रूप से महत्वपूर्ण है।

  - **मुश्किलों को अवसर में बदलना:** खतरनाक जंगली रास्तों पर रोजाना 5 किलोमीटर चलने की मजबूरी को एक बेहतरीन कसरत और फिटनेस के अवसर के रूप में देखना सकारात्मक नजरिए की सीख देता है।

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