अगरतला के दुर्गाबाड़ी मंदिर में महा नवमी पर दी गई बलि, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का रखा गया ध्यान अगरतला के ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी मंदिर में महा नवमी के मौके पर कड़ी गोपनीयता के बीच पारंपरिक पशु बलि दी गई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कड़ाई से पालन किया गया ताकि आम जनता की नजरों से रस्में दूर रहें। अगरतला स्थित दुर्गाबाड़ी मंदिर में महा नवमी का पर्व पारंपरिक अनुष्ठानों और सख्त सुरक्षा के बीच मनाया गया। इस दौरान एक भैंसे और कई बकरों की बलि दी गई, जिसे मंदिर प्रशासन ने 149 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा बताया है। मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार के साथ यह धार्मिक विधि पूरी की गई, लेकिन इसे आम लोगों की नजरों से पूरी तरह ओझल रखा गया। सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय की गई गाइडलाइंस और शर्तों का पालन करते हुए इस पूरी प्रक्रिया को जनता की पहुंच से दूर स्क्रीन के पीछे अंजाम दिया गया। परंपरा और कानूनी इतिहास मंदिर के मुख्य पुजारी जयंत भट्टाचार्य ने इस अनुष्ठान को पूजा का केंद्रीय हिस्सा बताते हुए स्पष्ट किया कि इसके बिना यह विशेष पूजा अधूरी मानी जाती है। हालांकि, इस सदियों पुरानी प्रथा का कानूनी इतिहास काफी उलझा हुआ रहा है। साल 2019 में त्रिपुरा हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच, जिसकी अध्यक्षता तब के चीफ जस्टिस संजय करोल ने की थी, ने राज्य के सभी मंदिरों में पशुओं और पक्षियों की बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। इस आदेश के दायरे में प्रसिद्ध मां त्रिपुरा सुंदररी मंदिर भी शामिल था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी, लेकिन इसके साथ ही मंदिर प्रबंधन के लिए कुछ स्पष्ट शर्तें भी निर्धारित कर दीं, जिनका पालन अब किया जा रहा है। प्रसाद और शाही परंपराएं मंदिर के प्रभारी प्रदीप देबनाथ ने स्पष्ट किया कि देवी को अर्पित किए जाने वाले भोग का कोई निश्चित या तय मेनू नहीं होता है। उनके अनुसार, भक्त जो कुछ भी श्रद्धा के साथ दान करते हैं या बलि के रूप में लाते हैं, उसे देवी को समर्पित कर दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि इस मंदिर में मांस और मछली के प्रसाद पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। गौरतलब है कि दुर्गाबाड़ी मंदिर में होने वाले दुर्गा पूजा उत्सव का आयोजन पश्चिम त्रिपुरा जिला प्रशासन द्वारा सीधे तौर पर माणिक्य राजवंश की ओर से किया जाता है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को बनाए रखता है। दशमी की तैयारियां और विदाई महा नवमी के अनुष्ठान संपन्न होने के बाद अब सारा ध्यान आगामी दशमी के कार्यक्रमों पर केंद्रित हो गया है। पुजारी के अनुसार, दशमी की सुबह पुलिस प्रशासन की तरफ से मंदिर परिसर में देवी को औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। इसके बाद पवित्र कलश को एक भव्य शोभायात्रा के साथ उज्ज्वयंटा पैलेस ले जाया जाएगा, जहां शाही परिवार के सदस्य और वंशज मां दुर्गा को अपनी अंतिम विदाई देंगे। इस पूरी प्रक्रिया के साथ ही त्रिपुरा में इस साल के दुर्गा पूजा उत्सवों का पारंपरिक समापन होगा। इसका आप पर असर अगरतला और त्रिपुरा के स्थानीय निवासियों के लिए इस परंपरा का पालन धार्मिक मान्यताओं और कानूनी संतुलन को दर्शाता है। • त्रिपुरा में: स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत धार्मिक उत्सवों का संचालन कर रहे हैं। इससे प्रशासनिक नियमों और प्राचीन परंपराओं के बीच संतुलन बना रहता है। • आम जनता के लिए: अदालत के आदेशों के कारण संवेदनशील धार्मिक अनुष्ठानों को आम जनता की नजरों से दूर रखा जाता है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहती है। • उत्सव की निरंतरता: माणिक्य राजवंश की देखरेख में होने वाले इन आयोजनों से राज्य की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक रीति-रिवाज जीवित रहते हैं। • सुरक्षा और यातायात: ऐसे बड़े आयोजनों के दौरान स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा सुरक्षा के कड़े इंतजाम और यातायात नियंत्रण लागू किए जाते हैं। • धार्मिक स्वतंत्रता: यह मामला धार्मिक प्रथाओं और अदालती हस्तक्षेप के बीच के नाजुक दायरे को रेखांकित करता है, जिस पर श्रद्धालुओं की नजर रहती है। ऐसा क्यों हुआ दुर्गाबाड़ी मंदिर में पशु बलि की यह घटना सदियों पुरानी परंपराओं और हालिया न्यायिक हस्तक्षेप के टकराव और समाधान का परिणाम है। • ऐतिहासिक परंपरा: मंदिर प्रशासन के अनुसार यह अनुष्ठान पिछले 149 वर्षों से लगातार चला आ रहा है और इसे पूजा का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। • कानूनी हस्तक्षेप: साल 2019 में त्रिपुरा हाई कोर्ट द्वारा राज्यभर के मंदिरों में बलि पर रोक लगाए जाने के बाद यह मामला अदालतों में पहुंचा था। • सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट के प्रतिबंध पर रोक लगाए जाने के बाद मंदिर प्रबंधन को कुछ शर्तों के तहत यह प्रथा जारी रखने की अनुमति मिली। • गोपनीयता की शर्त: अदालत के आदेशों और सार्वजनिक संवेदनशीलता का सम्मान करने के लिए ही इस बार अनुष्ठान को पर्दे के पीछे संपन्न किया गया। सवाल-जवाब 1. दुर्गाबाड़ी मंदिर कहां स्थित है? दुर्गाबाड़ी मंदिर त्रिपुरा के अगरतला में स्थित है। 2. महा नवमी पर मंदिर में कौन से पशुओं की बलि दी गई? महा नवमी के मौके पर एक भैंसे और कई बकरों की बलि दी गई। 3. यह परंपरा कितने साल पुरानी है? मंदिर अधिकारियों के अनुसार यह परंपरा 149 साल पुरानी है। 4. किस अदालत ने पहले पशु बलि पर रोक लगाई थी? त्रिपुरा हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने 2019 में राज्य के मंदिरों में पशु बलि पर रोक लगाई थी। 5. हाई कोर्ट के आदेश पर किसने रोक लगाई थी? सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए त्रिपुरा हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी। 6. दुर्गा पूजा उत्सव का आयोजन कौन करता है? दुर्गाबाड़ी में दुर्गा पूजा का आयोजन पश्चिम त्रिपुरा जिला प्रशासन द्वारा माणिक्य राजवंश की ओर से किया जाता है। 7. दशमी के दिन पवित्र कलश को कहां ले जाया जाता है? दशमी के दिन पवित्र कलश को उज्ज्वयंटा पैलेस ले जाया जाता है। https://trendkia.com/tripura/agartala-durgabari-temple-observes-maha-nabami-with-animal-sacrifice-behind-screened-enclosure-49766 TrendKia — Har trend, sabse pehle.