# रोहित रॉय के बयानों से TV इंडस्ट्री में खलबली, छोटे पर्दे को बताया भूलने वाला माध्यम और कहा कि फिल्म स्टार्स में होती है असली शालीनता

> अभिनेता रोहित रॉय ने टेलीविजन इंडस्ट्री के कलाकारों और काम करने के तौर-तरीकों पर तीखा हमला बोलते हुए इसे एक अस्थाई माध्यम करार दिया है और फिल्म स्टार्स को उनसे बेहतर बताया है।

**Type:** article · **Category:** टीवी · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/tv/rohit-roy-ke-bayanon-se-tv-indastri-men-khalabali-chhote-parde-ko-bataya-bhulane-vala-madhyama-aura-kaha-ki-philma-starsa-men-hoti-31402 · **Language:** Hindi
**Tags:** रोहित रॉय, टेलीविजन, बॉलीवुड, स्वाभिमान सीरियल, TV एक्टर्स, मनोरंजन जगत

1990 के दशक में भारतीय TV पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले अभिनेता रोहित रॉय ने एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को लेकर एक नया विवाद छेड़ दिया है। छोटे पर्दे के जरिए अपार लोकप्रियता हासिल करने और घर-घर में पहचाने जाने के बावजूद, इस अभिनेता ने TV को एक अस्थाई और आसानी से भुला दिया जाने वाला माध्यम करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने TV कलाकारों की तुलना बॉलीवुड फिल्म स्टार्स से करते हुए उन्हें शालीनता के मामले में कमतर बताया है। उनके इस बेबाक बयान ने मनोरंजन जगत में TV कलाकारों और फिल्म स्टार्स के बीच दशकों से चली आ रही ऊंच-नीच की खाई को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

भारतीय मनोरंजन उद्योग में अक्सर यह देखा गया है कि TV कई बड़े कलाकारों के लिए एक बड़ा लॉन्चपैड रहा है, जहां से उन्होंने फिल्मों का रुख किया। इसके बावजूद दोनों माध्यमों के कलाकारों के दर्जे में बड़ा अंतर माना जाता रहा है। कसौटी जिंदगी की में मिस्टर बजाज जैसे यादगार किरदार को निभाने वाले रोहित रॉय ने इस बार इसी संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी है, जिसके बाद से TV इंडस्ट्री से जुड़े कई लोग और उनके प्रशंसक इस तीखी आलोचना को लेकर आपत्ति जता रहे हैं।

## क्लास और सार्वजनिक व्यवहार में बड़ा अंतर
यूट्यूब चैनल काइंडली कास्ट को दिए गए एक इंटरव्यू में, रोहित रॉय से उस स्पष्ट वर्गीकरण और भेदभाव के बारे में पूछा गया था जो TV और फिल्म कलाकारों के बीच देखा जाता है। इस पर बिना किसी संकोच के उन्होंने कहा कि TV के कलाकारों में वह खास क्लास और ग्रेस नहीं दिखाई देता जो फिल्म स्टार्स में स्वाभाविक रूप से नजर आता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह अंतर केवल उनके अभिनय में ही नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक जीवन में खुद को पेश करने के तरीके में भी साफ झलकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जब भी कोई फिल्म स्टार किसी सार्वजनिक स्थान पर कदम रखता है, तो उनका बाहर आना और लोगों से मिलना बेहद गरिमापूर्ण, स्टाइलिश और शांत तरीके से होता है। उनके हाव-भाव में एक अनोखा ग्रेस होता है जो हर किसी पर अपना प्रभाव छोड़ता है। इसके विपरीत, उन्होंने दर्शकों से TV कलाकारों के किसी भी सामूहिक कार्यक्रम या अवॉर्ड शो को देखने की अपील की। रोहित के अनुसार, TV कलाकारों के बात करने, चलने और व्यवहार करने के तरीके में यह अंतर तुरंत और बेहद स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो उनकी प्रस्तुति में शालीनता की कमी को दर्शाता है।

## सोशल मीडिया और पैपराजी कल्चर पर करारा प्रहार
रोहित रॉय ने अपनी इस आलोचना को केवल सामान्य व्यवहार तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने आज के दौर के पैपराजी कल्चर और सोशल मीडिया पर दिखने वाली होड़ पर भी निशाना साधा। उन्होंने TV कलाकारों के अजीबोगरीब पहनावे और कैमरों के सामने ध्यान आकर्षित करने की उनकी कोशिशों की कड़ी निंदा की। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ कैमरों के सामने अजीब हरकतें करने या पैपराजी के लिए तस्वीरें खिंचवाने से कोई सच्चा स्टार नहीं बन जाता और न ही इससे कोई पेशेवर सम्मान हासिल किया जा सकता है।

डिजिटल युग के इस दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने बिना नाम लिए सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहने वाली एक महिला का उदाहरण दिया, जो अपने बेहद कम कपड़ों और बोल्ड अवतार के लिए चर्चा में रहती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि कोई खुद को इस रूप में पेश करके क्या हासिल करना चाहता है। उनके अनुसार, इस तरह के तरीकों से लोग कभी किसी को सम्मान की नजर से नहीं देखते। दर्शक उनके वीडियो या फोटो देखकर कुछ पलों का मनोरंजन भले ही कर लें, लेकिन उनके दिलों में ऐसे लोगों के लिए कभी कोई वास्तविक आदर या सम्मान नहीं पनपता, क्योंकि स्टारडम कभी भी सस्ते तरीकों से नहीं कमाया जा सकता।

## टेलीविजन को क्यों कहा डस्टबिन मीडियम?
जब रोहित रॉय से पूछा गया कि क्या वे खुद TV कलाकारों के खिलाफ होने वाले इस सामाजिक सौतेले व्यवहार को सही ठहरा रहे हैं, तो उन्होंने बहुत ही बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने सिनेमा को टेलीविजन से कहीं ऊपर रखा और TV को एक 'डस्टबिन मीडियम' कहा, जिसे लोग वक्त के साथ भुला देते हैं। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने भारतीय सिनेमा की शोले, दीवार और गॉन विद द विंड जैसी ऐतिहासिक फिल्मों का हवाला दिया, जिन्हें रिलीज के दशकों बाद भी आज पूरी दुनिया में याद किया जाता है।

दूसरी तरफ, उन्होंने कहा कि हालांकि TV पर कई बेहतरीन और ऐतिहासिक धारावाहिक बने हैं, लेकिन समय के साथ दर्शकों के दिमाग से वे पूरी तरह गायब हो चुके हैं। अपने इस दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा: "सिनेमा तो सिनेमा है, यह भावी पीढ़ियों के लिए बनता है और हमेशा याद रखा जाता है।" हालांकि, इस कड़ी आलोचना के बीच उन्होंने इस बात पर खुशी और संतोष जताया कि उनके अपने ऐतिहासिक TV शो स्वाभिमान के कुछ छोटे-छोटे क्लिप आज भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दिखाई दे जाते हैं, जिससे उन्हें बहुत खुशी मिलती है।

## मनोरंजन उद्योग में सौतेला व्यवहार
अपने लंबे करियर के अनुभवों को साझा करते हुए रोहित रॉय ने माना कि TV कलाकारों को हमेशा से फिल्म इंडस्ट्री में दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता रहा है। उन्होंने पुष्टि की कि TV से जुड़े लोगों के साथ हमेशा से एक सौतेला व्यवहार होता आया है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि TV कलाकार हर रोज दर्शकों के ड्राइंग रूम में नजर आते हैं, जिससे उनका आकर्षण और रहस्य खो जाता है, जबकि फिल्म स्टार्स खुद को काफी सीमित और विशिष्ट रखते हैं।

हालांकि, उन्होंने TV इंडस्ट्री के पक्ष में एक सकारात्मक बात भी कही। उन्होंने कहा कि जो TV कलाकार वास्तव में बेहद प्रतिभाशाली और अपने काम में माहिर हैं, उन्हें इंडस्ट्री में सम्मान जरूर मिलता है। भले ही उन्हें फिल्म स्टार्स की तरह विशाल और जादुई स्टारडम न मिल पाए, लेकिन उनके हुनर की कद्र हमेशा की जाती है। उनके अनुसार, व्यक्तिगत स्तर पर सम्मान होने के बावजूद, व्यवस्थागत स्तर पर यह भेदभाव मनोरंजन जगत की एक कड़वी हकीकत है।

## रोहित रॉय का करियर और बड़ी फिल्में
रोहित रॉय ने अभिनय की दुनिया में अपना पहला कदम 1990 के दशक में दूरदर्शन के बेहद चर्चित और कल्ट सीरियल स्वाभिमान से रखा था, जिसने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया था। इसके बाद उन्होंने कुसुम, भाभी और देश में निकला होगा चांद जैसे कई ब्लॉकबस्टर धारावाहिकों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं और खुद को छोटे पर्दे के सबसे बड़े चेहरों में स्थापित किया।

अपने करियर को और ऊंचाई देने के लिए उन्होंने बाद में बॉलीवुड फिल्मों का रुख किया। फिल्मों में उन्होंने कातिल, फैशन और शूटआउट एट लोखंडवाला जैसी कई बड़ी और बहुचर्चित फिल्मों में अभिनय किया। दोनों ही क्षेत्रों में काम करने के उनके इसी अनुभव के कारण आज वे इन दोनों माध्यमों के बीच के अंतर और कलाकारों की मानसिकता पर इतनी बेबाकी से अपनी राय रख पा रहे हैं।

## इसका आप पर असर
यह विवाद इस बात को प्रभावित करता है कि दर्शक TV कलाकारों की साख को किस तरह देखते हैं और इससे मनोरंजन उद्योग में कास्टिंग के तरीके भी बदल सकते हैं।

- **TV स्टार्स के प्रति नजरिया:** दर्शक अब सार्वजनिक कार्यक्रमों में TV कलाकारों के हाव-भाव और उनके पहनावे का अधिक बारीकी से विश्लेषण कर सकते हैं। इसका मतलब है कि कलाकारों पर अपनी ऑफ-स्क्रीन छवि को अधिक शालीन बनाए रखने का दबाव बढ़ेगा।
- **कास्टिंग के समीकरण:** फिल्म निर्माता लोकप्रिय TV कलाकारों को फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं देने में अधिक संकोच दिखा सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, बेहतरीन TV कलाकारों के लिए मुख्यधारा के बॉलीवुड प्रोजेक्ट्स में जगह बनाना और कठिन हो सकता है।
- **सोशल मीडिया रणनीतियां:** नए कलाकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए किए जाने वाले स्टंट्स पर पुनर्विचार कर सकते हैं। उन्हें केवल वायरल होने के बजाय दर्शकों के बीच अपना स्थायी सम्मान बनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
- **दर्शकों का वास्तविक सम्मान:** यह बहस साफ करती है कि दर्शक तात्कालिक मनोरंजन और वास्तविक कलात्मक प्रतिभा के बीच अंतर समझते हैं। लिहाजा, केवल क्लिकबेट या सनसनीखेज कंटेंट पर निर्भर रहने वाले कलाकारों के प्रशंसक समय के साथ कम हो सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता से भारतीय मनोरंजन जगत में गहराई से जमे ऊंच-नीच के भेदभाव के बारे में पूछा गया था। उनके बेबाक और बिना किसी झिझक के दिए गए जवाब ने सोशल मीडिया पर इस वायरल बहस को जन्म दे दिया।

- **इंडस्ट्री में मौजूद भेदभाव:** फिल्म स्टार्स को TV कलाकारों से श्रेष्ठ मानने का पुराना और गहरा पूर्वाग्रह इस चर्चा का मुख्य कारण बना। यह व्यवस्थागत अंतर भारतीय मनोरंजन जगत में कई दशकों से बना हुआ है।
- **पैपराजी कल्चर का उभार:** डिजिटल मीडिया और पैपराजी चैनलों के तेजी से बढ़ने के कारण कई कलाकार ध्यान खींचने के लिए हरकतों का सहारा लेते हैं। रोहित रॉय का इस चलन से परेशान होना ही उनकी इस तीखी टिप्पणी की वजह बना।
- **माध्यमों की प्रकृति में अंतर:** TV शोज के रोजाना आने वाले और जल्द खत्म होने वाले प्रारूप के मुकाबले सिनेमा की लंबी उम्र ने उन्हें यह तुलना करने पर मजबूर किया। दैनिक धारावाहिक नए शोज से बदल दिए जाते हैं, जबकि फिल्मों को सहेज कर रखा जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. रोहित रॉय ने किस माध्यम को 'डस्टबिन मीडियम' कहा है और क्यों?
रोहित रॉय ने टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' कहा है क्योंकि उनके अनुसार TV पर बने ऐतिहासिक शोज को लोग समय के साथ भूल जाते हैं, जबकि सिनेमा भावी पीढ़ियों के लिए बनता है और हमेशा याद रखा जाता है।

### 2. रोहित रॉय ने TV कलाकारों और फिल्म स्टार्स के सार्वजनिक व्यवहार में क्या अंतर बताया?
रोहित ने कहा कि फिल्म स्टार्स बहुत ही शालीनता, ग्रेस और स्टाइल के साथ बाहर आते हैं और उनका व्यवहार कूल होता है, जबकि TV कलाकारों के जमावड़े को देखकर उनके व्यवहार में एक स्पष्ट अंतर और गरिमा की कमी महसूस होती है।

### 3. रोहित रॉय ने सोशल मीडिया सेंसेशन और कपड़ों को लेकर क्या टिप्पणी की?
रोहित रॉय ने बिना नाम लिए एक सोशल मीडिया स्टार का जिक्र करते हुए कहा कि केवल कम कपड़े पहनने और कैमरों के सामने अजीबोगरीब हरकतें करने से दर्शकों का सम्मान नहीं मिलता, भले ही वे कुछ देर का मनोरंजन कर लें।

### 4. रोहित रॉय ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत किस शो से की थी?
रोहित रॉय ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1990 के दशक में दूरदर्शन के कल्ट शो 'स्वाभिमान' से की थी, जिसने उन्हें भारी लोकप्रियता दिलाई थी।

### 5. रोहित रॉय के प्रमुख TV शोज और फिल्में कौन सी हैं?
उनके प्रमुख TV धारावाहिकों में स्वाभिमान, कुसुम, भाभी और देश में निकला होगा चांद शामिल हैं, जबकि उन्होंने कातिल, फैशन और शूटआउट एट लोखंडवाला जैसी फिल्मों में भी काम किया है।

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