# अवध दरबार 1858: लॉर्ड कैनिंग ने बांटी थीं 198 सनदें, सुल्तानपुर के तालुकेदारों की कहानी

> 1858 में लखनऊ के अवध दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने अवध के 198 तालुकेदारों को सनदें प्रदान की थीं, जिनमें सुल्तानपुर के 25 प्रभावशाली जमींदार भी शामिल थे।

**Type:** article · **Category:** उत्तर प्रदेश · **Published:** 2026-06-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttar-pradesh/avadha-darabara-1858-lorda-kaininga-ne-banti-thin-198-sanaden-sultanapura-ke-tal-1818 · **Language:** Hindi
**Tags:** सुल्तानपुर, अवध दरबार, लॉर्ड कैनिंग, तालुकेदार, इतिहास, ब्रिटिश राज

## 1857 की क्रांति के बाद का अवध और सुल्तानपुर
उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति बल्कि अपने समृद्ध ऐतिहासिक अतीत के लिए भी जाना जाता है। इस क्षेत्र पर प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल का गहरा प्रभाव रहा है। 19वीं शताब्दी के दौरान जब यह क्षेत्र अवध दरबार का हिस्सा था, तब यहां की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में बड़े बदलाव हुए। TrendKia के अनुसार, 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश शासन ने अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अवध में तालुकेदारों के साथ नए संबंध स्थापित किए।

## लॉर्ड कैनिंग और 198 सनदें
इतिहासकार राजेश्वर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘सुल्तानपुर इतिहास की झलक’ में दर्ज किया है कि लखनऊ में आयोजित अवध दरबार में गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग ने पूरे अवध क्षेत्र के 198 तालुकेदारों को आधिकारिक सनदें वितरित की थीं। इस सूची में सुल्तानपुर जिले के 25 प्रमुख तालुकेदार भी सम्मिलित थे। वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह बताते हैं कि यह घटनाक्रम उस समय के सत्ता समीकरणों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

## तालुकेदारों की सूची और विकास
अवध गजेटियर के तीसरे अध्याय में उन 25 तालुकेदारों का विवरण नाम सहित मौजूद है। समय के साथ यह संख्या बढ़ती गई और 19वीं सदी के अंत तक सुल्तानपुर में तालुकेदारों की तादाद बढ़कर 34 हो गई। शुरुआती सूची में शामिल कुछ प्रमुख नामों में बाबू इसराज सिंह (तालुका मेवपुर दहला), मेवपुर रुद्र प्रताप शाही (तालुका दियरा, अमहट धनौली), राजा बहादुर सिंह (तालुका शाहगंज), जमशेद अली खान (तालुका महोना), दरगाही सिंह (तालुका ऊचगांव), रानी हरनाथ कुंवर (तालुका कटारी), बाबू हरदत्त सिंह (तालुका सम्राटपुर), बीबी इलाही खानम (तालुका मनियारपुर), पाली ठकुराइन दरियाव कुंवर (तालुका गारबपुर), जबर सिंह और बैजनाथ सिंह (तालुका प्रतापपुर) शामिल थे।

## सत्ता का समीकरण और आम जनता
अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति ने इन तालुकेदारों को ब्रिटिश शासन का करीबी बना दिया। परिणामस्वरूप, ये जमींदार जमीनों के विशाल स्वामी बन गए, लेकिन इसके विपरीत आम जनता का शोषण बढ़ता चला गया। अंग्रेजों के समर्थन के कारण इन सामंतों के खिलाफ आवाज उठाना कठिन हो गया था, जिसके चलते 19वीं सदी के अंत तक सुल्तानपुर में कोई बड़ी जन-क्रांति या ऐतिहासिक घटना दर्ज नहीं हो सकी।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह ऐतिहासिक जानकारी औपनिवेशिक काल के दौरान भूमि स्वामित्व और प्रशासनिक ढांचे के बदलाव को समझने में मदद करती है।

**सुल्तानपुर में:** स्थानीय निवासियों के लिए यह उनके पूर्वजों के शासनकाल और जिले के जमींदारी इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

## सवाल-जवाब

### 1. 1858 में अवध दरबार के दौरान लॉर्ड कैनिंग ने कितनी सनदें बांटी थीं?
लॉर्ड कैनिंग ने पूरे अवध क्षेत्र के 198 तालुकेदारों को सनदें बांटी थीं।

### 2. सुल्तानपुर में कितने तालुकेदारों को पहली सूची में सनद मिली थी?
सुल्तानपुर जिले के 25 तालुकेदारों को उस समय सनद प्राप्त हुई थी।

### 3. 19वीं सदी के अंत तक सुल्तानपुर में तालुकेदारों की संख्या कितनी हो गई थी?
तालुकेदारों की संख्या 25 से बढ़कर 34 हो गई थी।

### 4. तालुकेदारों ने अंग्रेजों का समर्थन क्यों किया?
अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति का लाभ इन सामंतों को मिला, जिससे वे जमीन के बड़े मालिक बन गए।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._