# बहराइच में किसान बृजेश कुमार का नया प्रयोग, बिना किसी खाद के केले और धान की सह-फसली खेती से तैयार किया मॉडल

> उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में किसान बृजेश कुमार ने दो बीघे खेत में बिना रासायनिक या जैविक खाद डाले केले और धान की सफल सह-फसली खेती कर बेहद कम लागत में शानदार फसल उगाई है।

**Type:** article · **Category:** उत्तर प्रदेश · **Published:** 2026-09-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttar-pradesh/bahraich-men-kisana-brijesh-kumar-ka-naya-prayoga-bina-kisi-khada-ke-kele-aura-dhana-ki-saha-phasali-kheti-se-taiyara-kiya-modala-35631 · **Language:** Hindi
**Tags:** बहराइच, बृजेश कुमार, जीरो कॉस्ट खेती, सह फसली खेती, प्राकृतिक खेती, केला और धान

पारंपरिक खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं पर होने वाला लगातार बढ़ता खर्च आज कई किसानों की बड़ी परेशानी बन चुका है। ऐसे दौर में उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर तिवारी पुरवा गांव के किसान बृजेश कुमार ने एक अलग रास्ता चुनकर दिखाया है। आमतौर पर जहां किसान बेहतर पैदावार की उम्मीद में भारी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं बृजेश कुमार ने अपने दो बीघे खेत में बिना किसी रासायनिक या जैविक खाद की मदद के हरी-भरी फसल खड़ी कर दी है।

## केले और धान की सह-फसली खेती की व्यवस्था
बृजेश कुमार ने अपने खेत में केले और धान की सह-फसली खेती की विशेष तकनीक अपनाई है। इस योजना के तहत पूरे खेत में सुनियोजित कतारें बनाई गई हैं। खेत में एक कतार केले के पौधों की लगाई गई है और उन कतारों के बीच की खाली जमीन पर धान की दो से तीन कतारें रोपी गई हैं। इस तरीके से दोनों फसलें एक ही जमीन पर बिना किसी रुकावट के साथ-साथ विकसित हो रही हैं। वर्तमान में दोनों ही फसलों के पौधे पूरी तरह मजबूत और स्वस्थ नजर आ रहे हैं, जिससे जमीन की जगह और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हुआ है।

## नाममात्र के खर्च में लगभग जीरो-कॉस्ट का ढांचा
खाद, रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग पूरी तरह बंद करने से बृजेश कुमार का खेती पर होने वाला बड़ा खर्च बच गया है। इस पूरे प्रयास में उनकी जेब से सिर्फ बुनियादी चीजों पर ही नाममात्र का खर्च हुआ। उन्होंने धान के बीज पर ₹600 खर्च किए, जबकि धान की रोपाई कराने में ₹1,500 की मजदूरी लगी। इस प्रकार दो बीघे जमीन पर फसल तैयार करने में उनका कुल खर्च मात्र ₹2,000 से ₹3,000 के बीच आया है। यह आंकड़ा आज की सामान्य खेती की तुलना में बेहद कम है और शून्य लागत खेती का व्यावहारिक उदाहरण पेश करता है।

## कृषि अधिकारियों की सलाह और विचार की शुरुआत
इस अनोखे प्रयोग की शुरुआत कैसे हुई, इस पर किसान बृजेश कुमार बताते हैं कि जब कृषि अधिकारी गांव में आकर किसानों को जैविक खेती करने की सीख देते थे, तब उनके दिमाग में एक नया सवाल उठा। उन्होंने सोचा कि यदि खेत में रासायनिक या जैविक किसी भी प्रकार का बाहरी पोषण न डाला जाए, तब फसल का क्या परिणाम होगा। इसी जिज्ञासा और सोच के आधार पर उन्होंने यह कदम उठाया।

बृजेश कुमार का कहना है कि अत्यधिक रासायनिक खादों से तैयार होने वाली फसलों की तुलना में थोड़ा अंतर जरूर नजर आता है, लेकिन जितनी कम लागत इसमें लगी है, उसे देखते हुए पैदावार के नतीजे बेहद संतोषजनक और उत्साहवर्धक हैं। बिना किसी जहरीले रसायन के की जा रही इस खेती की चर्चा अब पूरे इलाके में हो रही है। किसान का मानना है कि फसल पकने पर यह तरीका उन्हें निश्चित तौर पर अच्छा मुनाफा देकर जाएगा।

## इसका आप पर असर
बहराइच के इस सफल प्रयोग से छोटे किसानों के लिए खेती की लागत घटाकर बचत बढ़ाने का एक नया व्यावहारिक रास्ता खुला है।

- **लागत में भारी बचत:** खाद और कीटनाशकों का खर्च हटने से दो बीघे में फसल की कुल लागत सिमटकर मात्र ₹2,000 से ₹3,000 रह गई है। इससे किसान रासायनिक उर्वरकों की बाजार में बढ़ती कीमतों और उधारी के बोझ से बच सकते हैं।
- **जमीन का दोहरा उपयोग:** केले की कतारों के बीच धान की दो से तीन लाइनें लगाने से एक ही खेत और समान समय में दो अलग-अलग फसलों की उपज मिलती है। किसान अपनी सीमित जोत से बिना अतिरिक्त जमीन खरीदे दोहरा उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
- **मिट्टी और स्वास्थ्य सुरक्षा:** किसी भी रासायनिक खाद या जहरीले पेस्टिसाइड का छिड़काव न होने से खेत की मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता सुरक्षित रहती है। साथ ही उपभोक्ताओं को रसायनमुक्त और जहरमुक्त खाद्यान्न प्राप्त होने की संभावना बनती है।
- **छोटे किसानों के लिए मॉडल:** सीमित बजट वाले किसान केवल बीज और रोपाई की मजदूरी लगाकर इस तकनीक को आजमा सकते हैं। प्रारंभिक कम निवेश के कारण फसल खराब होने या बाजार जोखिम की स्थिति में भी बड़ा आर्थिक नुकसान नहीं होता।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पहल सरकारी कृषि अधिकारियों की जैविक खेती की सलाह और किसान के मन में बिना किसी बाहरी खाद के फसल उगाने के विचार से शुरू हुई।

- **अधिकारियों की सलाह और जिज्ञासा:** कृषि विभाग के अधिकारी गांव पहुंचकर किसानों को जैविक खेती अपनाने के लाभ बताते थे। अधिकारियों की चर्चा सुनकर बृजेश कुमार के मन में सवाल उठा कि यदि खेत में जैविक या रासायनिक किसी भी तरह की खाद न डाली जाए तो परिणाम क्या होंगे।
- **रासायनिक खादों का बढ़ता दबाव:** सामान्य तौर पर किसान अच्छी फसल के लिए अंधाधुंध रासायनिक खाद और कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी। इस भारी लागत से मुक्ति पाने की सोच ने किसान को शून्य लागत मॉडल की तरफ प्रेरित किया।
- **सह-फसली खेती का व्यावहारिक तालमेल:** केले के पौधों के बीच खाली रहने वाली जमीन का सदुपयोग करने के लिए बीच में धान की दो से तीन कतारें रोपी गईं। इस व्यवस्थित बनावट के कारण दोनों फसलें एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना प्राकृतिक रूप से बढ़ने लगीं।

## सवाल-जवाब

### 1. यह अनोखी खेती किस जिले और गांव में की गई है?
यह खेती उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के मिर्जापुर तिवारी पुरवा गांव में किसान बृजेश कुमार द्वारा की गई है।

### 2. किसान ने किन दो फसलों की सह-फसली खेती की है?
किसान बृजेश कुमार ने अपने खेत में केले और धान की सह-फसली खेती की है।

### 3. खेत में पौधों की कतारें किस तरह लगाई गई हैं?
खेत में एक कतार केले के पौधों की लगाई गई है और उनके बीच में धान की 2 से 3 कतारें रोपी गई हैं।

### 4. दो बीघे खेत में फसल तैयार करने में कुल कितना खर्च आया?
बीज के ₹600 और रोपाई के ₹1,500 मिलाकर कुल खर्च मात्र ₹2,000 से ₹3,000 के बीच आया है।

### 5. क्या इस फसल में किसी भी प्रकार की खाद डाली गई है?
नहीं, इस फसल में रासायनिक या जैविक किसी भी प्रकार की खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया गया है।

### 6. किसान को बिना खाद के खेती करने का विचार कैसे आया?
कृषि अधिकारियों द्वारा जैविक खेती की सलाह दिए जाने पर किसान के मन में बिना किसी खाद के खेती का परीक्षण करने का विचार आया।

## प्रेरणा और सबक
बहराइच के किसान बृजेश कुमार का यह अभिनव प्रयोग दर्शाता है कि पारंपरिक लीक से हटकर सोचने और सीमित संसाधनों में भी सफल खेती की जा सकती है।

- **खुद के प्रयोग पर भरोसा करें:** अधिकारियों की सलाह सुनने के बाद बृजेश ने केवल दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद खेत में बिना खाद की खेती का व्यावहारिक परीक्षण किया। नई सोच पर विश्वास रखकर उठाए गए कदम नए रास्ते खोलते हैं।
- **लागत कम करने पर ध्यान दें:** मुनाफा केवल अधिक उत्पादन से ही नहीं, बल्कि उत्पादन खर्च को ₹2,000 से ₹3,000 तक घटाकर भी सुरक्षित किया जा सकता है। न्यूनतम इनपुट लागत खेती को कर्जमुक्त और टिकाऊ बनाती है।
- **उपलब्ध जगह का पूरा इस्तेमाल:** केले की कतारों के बीच बची खाली जमीन में धान रोपकर बृजेश ने साबित किया कि बेहतर योजना से सीमित खेत से भी दोहरा लाभ लिया जा सकता है। योजनाबद्ध तरीके से काम करने पर संसाधन व्यर्थ नहीं जाते।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._