बलिया की दिव्यांग ज्योति: दोनों पैरों से लाचार, टीचर बनने का सपना, जिलाधिकारी ने बढ़ाया मदद का हाथ बलिया के महुलानपार गांव की 18 वर्षीय दिव्यांग ज्योति टीचर बनना चाहती है, लेकिन गरीबी और स्कूल की दूरी ने उसकी पढ़ाई रोक दी थी। वीडियो वायरल होने के बाद जिलाधिकारी मंगला प्रसाद ने उसे ट्राई साइकिल, स्कूल बैग और दिव्यांगता प्रमाण पत्र देकर मदद पहुंचाई। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में रहने वाली 18 वर्षीय ज्योति जन्म से ही अपने दोनों पैरों से चलने में असमर्थ है, बावजूद इसके वह पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का सपना संजोए हुए है। महुलानपार गांव में रहने वाली इस बेटी की जिंदगी संघर्षों से भरी है, फिर भी वह स्कूल जाना चाहती है और अपने पैरों पर खड़े होकर कुछ बनना चाहती है। इससे पहले भी बलिया के मनियर इलाके से दिव्यांग बच्ची रागनी की एक क्लिप चर्चा में आई थी, अब उसी क्षेत्र से ज्योति की जिंदगी लोगों के सामने आई है। घर की दूरी ने छुड़वाई पढ़ाई ज्योति आठवीं कक्षा तक स्कूल गई, इसके बाद उसकी पढ़ाई थम गई। वजह थी घर से स्कूल की लंबी दूरी। शुरुआत में उसके पिता रोज साइकिल पर बिठाकर उसे स्कूल छोड़ने जाते थे, मगर उम्र बढ़ने के साथ उनके पैरों में भी तकलीफ रहने लगी और वह बेटी को स्कूल ले जाने में असमर्थ हो गए। नतीजा यह हुआ कि किताबों से नाता टूट गया और ज्योति के सपने घर की चारदीवारी में सिमट गए। वीडियो सामने आते ही हरकत में आया प्रशासन ज्योति की तकलीफ जब कैमरे में कैद होकर लोगों तक पहुंची, तो बलिया के जिलाधिकारी मंगला प्रसाद खुद उसके घर जा पहुंचे। उन्होंने बैटरी से चलने वाली ट्राई साइकिल, स्कूल बैग, हेलमेट, चॉकलेट और दिव्यांगता प्रमाण पत्र सौंपा। साथ ही खंड विकास अधिकारी को निर्देश दिया कि ज्योति के घर में शौचालय बनवाया जाए और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उसे पक्का मकान भी दिलाया जाए। टीचर बनने का सपना, गैस भरवाने तक के पैसे नहीं ज्योति टीचर बनना चाहती है, लेकिन घर के हालात उसकी राह में रोड़ा हैं। उसकी बहन पूजा के मुताबिक घर में गैस सिलेंडर तो रखा है, मगर उसे दोबारा भरवाने के लिए पैसे नहीं जुट पाते। बरसात के दिनों में सड़क का पानी घर के अंदर घुस आता है, ऐसे में परिवार को कई बार खाली पेट भी सोना पड़ता है। मां खेतों में मजदूरी करती है, पिता ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करते हैं ज्योति की मां देवंती देवी खेतों में मजदूरी करती है और साथ ही बकरियां व भैंस पालकर घर चलाने में हाथ बंटाती है। बेटी को पढ़ा न पाने का मलाल आज भी उन्हें कचोटता है। पिता गुलाब चंद्र प्रसाद पहले एक निजी स्कूल में पढ़ाया करते थे, मगर पैरों के दर्द ने उनसे यह नौकरी भी छीन ली। अब वह बच्चों को घर पर ट्यूशन देकर महीने के महज 4 से 5000 रुपये कमा पाते हैं। इतनी तंगी के बावजूद उन्होंने अपनी एक बेटी को एम.एड बी.एड तक पढ़ाया है। गांव में दिव्यांगों के लिए कोई सुविधा नहीं गांव के मंगलदीप बताते हैं कि यहां दिव्यांगों के आने-जाने का कोई इंतजाम नहीं है। बचपन में कुछ लोगों ने ज्योति को एक ट्राई साइकिल दी थी, मगर वह उसे चला नहीं पाई थी। गांव वालों का कहना है कि ज्योति को अगर सही मदद मिल जाए तो वह पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है। ग्रामीण ज्ञानदीप और अभिषेक कुमार ने सरकार से अपील की है कि ज्योति की हर मुमकिन मदद की जाए ताकि उसके सपनों को पंख लग सकें। इसका आप पर असर यह खबर बताती है कि स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और सरकारी योजनाओं से दिव्यांग बच्चों की जिंदगी कैसे बदल सकती है। • भारत में: दिव्यांगता प्रमाण पत्र और सहायक उपकरण देने वाली सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ेगी। दिव्यांग बच्चों वाले परिवार बैटरी ट्राई साइकिल और प्रमाण पत्र जैसी सुविधाओं के लिए स्थानीय प्रशासन से संपर्क कर सकते हैं। • बलिया में: महुलानपार गांव में अब शौचालय और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनने की प्रक्रिया शुरू होगी। इससे आसपास के गांवों के दूसरे जरूरतमंद परिवार भी प्रशासन से मदद मांगने आगे आ सकते हैं। • दिव्यांग छात्रों के लिए: स्कूल की दूरी पढ़ाई छूटने की बड़ी वजह बन सकती है, ऐसे में नजदीकी स्कूल में दाखिले या परिवहन सुविधा की मांग प्रशासन से की जा सकती है। • कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के लिए: गैस कनेक्शन होने पर भी रिफिल के पैसे न होना एक आम समस्या है, ऐसे परिवार सब्सिडी और राशन योजनाओं की जानकारी लेकर राहत पा सकते हैं। सवाल-जवाब 1. ज्योति कौन है और कहां की रहने वाली है? ज्योति बलिया जिले के महुलानपार गांव की 18 वर्षीय लड़की है, जो जन्म से दोनों पैरों से दिव्यांग है। 2. ज्योति की पढ़ाई क्यों रुक गई थी? घर से स्कूल की दूरी ज्यादा थी और उम्र बढ़ने पर पिता के पैरों में भी दर्द रहने लगा, जिससे वह उसे स्कूल नहीं ले जा पाते थे। 3. जिलाधिकारी ने ज्योति की क्या मदद की? जिलाधिकारी मंगला प्रसाद ने उसे बैटरी वाली ट्राई साइकिल, स्कूल बैग, हेलमेट, चॉकलेट और दिव्यांगता प्रमाण पत्र दिया। 4. प्रशासन ने और क्या निर्देश दिए हैं? खंड विकास अधिकारी को ज्योति के लिए शौचालय और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। 5. ज्योति का सपना क्या है? ज्योति टीचर बनना चाहती है। 6. ज्योति के परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है? पिता ट्यूशन पढ़ाकर महीने के 4 से 5000 रुपये कमाते हैं और मां खेतों में मजदूरी व पशुपालन करती हैं, घर में गैस भरवाने तक के पैसे नहीं होते। प्रेरणा और सबक ज्योति की कहानी बताती है कि हालात चाहे जितने भी मुश्किल हों, हौसला बनाए रखने से मदद की राह खुल ही जाती है। • सपने न छोड़ें: पढ़ाई बीच में छूटने के बावजूद ज्योति ने टीचर बनने का सपना नहीं छोड़ा। • परिवार का त्याग मायने रखता है: पिता ने पैरों के दर्द के बावजूद ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाया और एक बेटी को एम.एड बी.एड तक पढ़ाया। • मां की मेहनत बड़ा सहारा है: देवंती देवी ने खेतों में मजदूरी और पशुपालन से परिवार को संभाले रखा। • समुदाय की आवाज असर करती है: गांव वालों की गुहार और वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन ने तुरंत मदद पहुंचाई। https://trendkia.com/uttar-pradesh/ballia-ki-divyanga-jyoti-donon-pairon-se-lachara-tichara-banane-ka-sapana-jiladhikari-ne-barhaya-madada-ka-hatha-28867 TrendKia — Har trend, sabse pehle.