बलिया की मिट्टी में मूंगफली की बेहतर पैदावार के लिए खाद प्रबंधन और फली सुरक्षा के सटीक तरीके बलिया में बलुई दोमट और करईल जमीन पर मूंगफली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने संतुलित पोषण, फफूंद नियंत्रण और मिट्टी चढ़ाने के जरूरी नियम बताए हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में किसान अब अपनी पारंपरिक फसलों के अलावा तिलहन के रूप में मूंगफली की खेती को नए विकल्प के तौर पर अपना सकते हैं। जिले के खेतों में मौजूद बलुई दोमट तथा करईल किस्म की मिट्टी को इस तिलहनी फसल के अनुकूल पाया गया है। स्थानीय कृषि विभाग के साथ एमएससी स्तर के शोधार्थी मिलकर इस क्षेत्र की जमीन पर जैविक तथा रासायनिक खाद के असर का विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं, जिससे यह परखा जा सके कि दोनों तरह के खादों के संतुलन से पैदावार और बीजों की गुणवत्ता किस हद तक सुधरती है। खेती का यह नया तरीका क्षेत्र के किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई का जरिया बनकर उभर सकता है। बुवाई के दौरान संतुलित पोषण की अहमियत फसल की शुरुआती नींव मजबूत करने के लिए जमीन में जरूरी तत्वों का होना अनिवार्य है। श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार सिंह ने बुवाई के दौरान खाद प्रबंधन को सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताया है। उनके अनुसार खेत तैयार करते समय प्रति बीघा 12 किलोग्राम पोटाश के साथ लगभग 15 किलोग्राम गंधक का इस्तेमाल अवश्य किया जाना चाहिए। अगर जमीन में इन तत्वों की कमी रह जाती है, तो पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और उन पर भूरे रंग के निशान उभर आते हैं, जिसका सीधा बुरा असर पौधे के स्वास्थ्य और फसल की कुल गुणवत्ता पर पड़ता है। टिक्का रोग की रोकथाम और कीटनाशक छिड़काव मूंगफली के पौधों को एक गंभीर फफूंद जनित समस्या से बचाना बेहद जरूरी होता है, जिसे टिक्का रोग कहा जाता है। इस बीमारी के फैलने पर पौधों की हरी पत्तियों पर गोल आकार के धब्बे उभर आते हैं, जो धीरे-धीरे पूरी फसल को तबाह करने की ताकत रखते हैं। पत्तियों पर ऐसे लक्षण नजर आते ही फौरन फफूंदनाशक दवाओं का सहारा लेना चाहिए। • दवाओं का पहला विकल्प: 100 लीटर पानी में 200 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, डाईथेन एम-45 या इन्डोफिल एम-45 को अच्छी तरह घोलकर खेत में छिड़कें। • असरदार दूसरा विकल्प: इस संक्रमण से तुरंत राहत पाने के लिए कार्बेंडाजिम अथवा हेक्साकोनाजोल का 0.02 प्रतिशत सांद्रता वाला घोल तैयार करके पौधों पर डालना भी काफी कारगर साबित होता है। फूल से फली बनने की प्रक्रिया और मिट्टी चढ़ाने का नियम मूंगफली के पौधों में जब फूल खिलते हैं, तो करीब 60 से 65 दिन बीत जाने के बाद वे पेग बनकर जमीन के भीतर प्रवेश करते हैं, जहां असल में फलियां विकसित होती हैं। फूलों के जमीन में समाने की इस क्रिया से ठीक 10 दिन पहले पौधों के चारों तरफ मिट्टी चढ़ाने की प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए। समय रहते मिट्टी चढ़ाने से पेग आसानी से जमीन की गहराई तक पहुंच पाते हैं और फलियों का आकार तेजी से बढ़ता है। खेत में सही वक्त पर मिट्टी की परत चढ़ा देने से पैदावार में सीधा इजाफा होता है और फलियों के अंदर कम से कम तीन दानों का भराव सुनिश्चित होता है। इसके अलावा जब फलियां परिपक्व हो रही हों, तब पक्षियों, खासकर कौवों के नुकसान से फसल को बचाए रखने के लिए नियमित निगरानी रखनी चाहिए। इन सावधानियों पर अमल करने से बलिया की जमीन से भरपूर उपज हासिल की जा सकती है। इसका आप पर असर यह शोध और दिशा-निर्देश बलिया के किसानों के लिए कम लागत में दलहन-तिलहन की लाभकारी फसल उगाने का सीधा रास्ता दिखाते हैं। • बलिया में: स्थानीय बलुई दोमट और करईल खेतों में मूंगफली की सफल बुवाई कर किसान अपनी आय का एक नया और टिकाऊ जरिया बना सकते हैं। प्रति बीघा 12 किलो पोटाश और 15 किलो गंधक डालकर वे पत्तियों के पीलेपन और पोषक तत्वों के नुकसान से फसल को बचा सकते हैं। • फसल सुरक्षा के स्तर पर: टिक्का रोग के लक्षण दिखते ही किसान कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या 0.02 प्रतिशत कार्बेंडाजिम का तुरंत छिड़काव कर भारी नुकसान टाल सकते हैं। फूल आने के 50 से 55 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा करके वे हर फली में तीन पुष्ट दाने प्राप्त कर सकते हैं। • पक्षी प्रबंधन के स्तर पर: फली बनते समय खेत में कौवों की निगरानी रखकर तैयार हो रही पैदावार को सुरक्षित बचाया जा सकता है। इससे कटाई के समय बाजार में बेहतर भाव और उच्च गुणवत्ता वाली उपज की गारंटी मिलती है। ऐसा क्यों हुआ बलिया में मूंगफली की संभावनाओं को परखने के पीछे स्थानीय मिट्टी की बनावट और किसानों के लिए नए नकदी विकल्प तलाशने की जरूरत मुख्य वजह रही है। • मिट्टी की अनुकूलता: जनपद बलिया की बलुई दोमट और करईल मिट्टी मूंगफली की जड़ों और पेग्स के विकास के लिए उपयुक्त पाई गई है। कृषि विभाग और स्नातकोत्तर छात्रों ने इसी संभावना का लाभ उठाने के लिए संयुक्त शोध शुरू किया। • पोषक तत्वों की अनिवार्यता: बलिया की जमीन में मूंगफली की पत्तियां पीली पड़ने और धब्बे लगने की समस्या को रोकने के लिए पोटाश और गंधक की सटीक मात्रा तय करना जरूरी था। प्रो. अशोक कुमार सिंह ने 12 किलो पोटाश और 15 किलो गंधक प्रति बीघा की खुराक अनुशंसित की। • रोग और जैविक बाधाएं: नम मौसम में टिक्का फफूंद का संक्रमण तेजी से पत्तियों को नष्ट करता है, जिसके कारण फफूंदनाशक दवाओं का त्वरित इस्तेमाल जरूरी हो जाता है। साथ ही कौवों द्वारा फलियों को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए नियमित निगरानी आवश्यक बनी। सवाल-जवाब 1. बलिया की किस प्रकार की मिट्टी में मूंगफली की खेती की जा सकती है? बलिया जनपद की बलुई दोमट और करईल मिट्टी में मूंगफली की सफल खेती की जा सकती है। 2. बुवाई के समय प्रति बीघा कितनी खाद डालनी चाहिए? बुवाई के समय प्रति बीघा 12 किलोग्राम पोटाश और लगभग 15 किलोग्राम गंधक का इस्तेमाल करना चाहिए। 3. टिक्का रोग की पहचान क्या है और इसका इलाज कैसे करें? इस रोग में पत्तियों पर गोल धब्बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 100 लीटर पानी में 200 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, डाईथेन एम-45 या इन्डोफिल एम-45, अथवा 0.02 प्रतिशत कार्बेंडाजिम का घोल छिड़कना चाहिए। 4. मूंगफली में मिट्टी चढ़ाने का सही समय क्या है? फूल आने के 60 से 65 दिन बाद जब वे जमीन में धंसते हैं, उससे ठीक 10 दिन पहले पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। 5. सही समय पर मिट्टी चढ़ाने से क्या फायदा मिलता है? इससे फूल आसानी से मिट्टी में धंसते हैं, पैदावार बढ़ती है और प्रत्येक फली में कम से कम तीन दाने भरते हैं। https://trendkia.com/uttar-pradesh/ballia-ki-mitti-men-mungaphali-ki-behatara-paidavara-ke-lie-khada-prabndhana-aura-phali-suraksha-ke-satika-tarike-43045 TrendKia — Har trend, sabse pehle.