बड़ौत में दूध बेचने और रिक्शा चलाने से कॉलेज प्रिंसिपल बने वकील चंद जैन ने लिया संन्यास, बने दिगंबर मुनि बचपन में आर्थिक तंगी झेलते हुए मजदूरी और अध्यापन के बाद कॉलेज प्रधानाचार्य बने वकील चंद जैन ने सांसारिक सुख त्यागकर मुनि दीक्षा स्वीकार कर ली है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित बड़ौत कस्बे से एक अत्यंत प्रेरक और जीवन के गहरे सत्यों को उजागर करने वाला वृत्तांत सामने आया है। अभावों से जूझते हुए अपनी शिक्षा पूरी करने और कॉलेज के सर्वोच्च शैक्षणिक पद तक का सफर तय करने वाले शिक्षक वकील चंद जैन ने सांसारिक दायित्व पूरे करने के बाद अब पूर्ण संन्यास का मार्ग चुन लिया है। जीवन के शुरुआती दौर में आजीविका के लिए दैनिक मजदूरी करने वाले इस शख्स ने अपने जीवनकाल में सैकड़ों विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने का दायित्व निभाया, लेकिन अब वे भौतिक सुख और सामाजिक प्रतिष्ठा से विरक्त होकर अपनी अंतरात्मा की शुद्धि तथा मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर हो चुके हैं। कड़े परिश्रम और अभावों के बीच बीता शुरुआती जीवन वकील चंद जैन की जीवन यात्रा कड़े संघर्ष, अडिग इच्छाशक्ति और निरंतर श्रम का उदाहरण प्रस्तुत करती है। उनका जन्म 31 मार्च 1964 को बड़ौत में हुआ था। उनके पिता जय प्रकाश जैन दूध निकालने और उसे घरों तक पहुंचाने का पारंपरिक कार्य करते थे, जबकि माता मति रामवती जैन ने परिवार को धार्मिक और नैतिक संस्कार दिए। घर में बड़े भाई मुकेश कुमार जैन व लोकेश कुमार जैन, छोटे भाई रविंद्र कुमार जैन तथा बड़ी बहन अनीता जैन के साथ मिलकर परिवार का भरण-पोषण करना एक बड़ी चुनौती थी। आर्थिक तंगी के उस दौर में उन्होंने बचपन से ही घर की आमदनी में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। घर की जिम्मेदारियों में सहयोग देने के लिए उन्होंने दूध बेचने के अलावा चारपाई बुनने, कपड़े सिलने तथा बाजारों में आइसक्रीम का रिक्शा चलाने जैसा शारीरिक श्रम भी किया। अपने स्वयं के अध्ययन का प्रबंध करने के साथ-साथ उन्होंने अपने अनुजों की पढ़ाई में भी भरपूर वित्तीय सहयोग दिया। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को अपनी प्रगति की राह में बाधा नहीं बनने दिया और उच्च शिक्षा हासिल करने का संकल्प जारी रखा। विद्यालयी शिक्षा के उपरांत बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करके वे आगे बढ़े और मोदीनगर से वाणिज्य में परास्नातक यानी एमकॉम की डिग्री सफलतापूर्वक हासिल की। व्यापारिक शुरुआत से शैक्षणिक जगत में पहचान एमकॉम की पढ़ाई के दिनों में उनकी मित्रता राजीव नामक युवक से हुई। इसी संपर्क के जरिए उन्हें चेतक साबुन की व्यावसायिक एजेंसी मिली, जिससे उन्होंने बड़ौत में अपना स्वतंत्र काम शुरू किया। इसी कारोबारी दौर में उनका संपर्क दिगंबर जैन इंटर कॉलेज के तत्कालीन प्रधानाचार्य शिखर चंद जैन से हुआ। शिखर चंद जैन ने उनके समर्पण और योग्यता को भांपते हुए अप्रैल 1986 में उन्हें वाणिज्य विषय के शिक्षक के रूप में अध्यापन का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया। शिक्षण कार्य में आने के बाद भी वकील चंद जैन ने अध्ययन का सिलसिला थमने नहीं दिया। उन्होंने अंग्रेजी ऑनर्स के साथ एमए की उपाधि अर्जित की और फिर बीएड की डिग्री भी प्राप्त की। योग्यता में वृद्धि के साथ वे अंग्रेजी विषय के प्रवक्ता के पद पर पदोन्नत हुए। राष्ट्र सेवा और अनुशासन के प्रति निष्ठा के चलते वे वर्ष 1996 में एनसीसी विंग से जुड़े और निरंतर सेवा देते हुए कर्नल के रैंक तक पहुंचे। वर्ष 2015 में उन्हें उसी शिक्षण संस्थान में प्रिंसिपल की जिम्मेदारी सौंपी गई। एक दशक तक वर्ष 2025 तक इस पद को संभालने के उपरांत उन्होंने शासकीय सेवा से सेवानिवृत्ति प्राप्त कर ली। वैराग्य की ओर कदम और गुरु कृपा शिक्षा जगत में लंबा अनुभव और मान-सम्मान अर्जित करने के उपरांत भी वकील चंद जैन का रुझान धीरे-धीरे अध्यात्म की गहराइयों की तरफ बढ़ता चला गया। वर्ष 2014 में जब विमर्श सागर जी महाराज का वर्षाकालीन चातुर्मास चल रहा था, तब उनके अंतर्मन में सांसारिक प्रपंचों को छोड़कर मुनि बनने की प्रबल इच्छा का बीजारोपण हुआ। समय बीतने के साथ यह भावना और अधिक परिपक्व होती चली गई। इसके बाद वर्ष 2023 में गुरु विशुद्ध सागर जी महाराज के ससंघ चातुर्मास के पावन अवसर पर उन्हें गुरु का सानिध्य और आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इसी दौरान उनके भावी संन्यासी जीवन की औपचारिक घोषणा की गई। सांसारिक कर्तव्यों और पारिवारिक दायित्वों से पूरी तरह मुक्त होने के बाद अंततः 9 जून 2025 को गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर उन्होंने औपचारिक रूप से अपने घर-बार का परित्याग कर दिया और मुनि संघ के संग साधना के कठिन मार्ग पर प्रस्थान कर गए। पिता की अधूरी साधु साधना बनी प्रेरणा वकील चंद जैन के मन में उपजे इस त्याग के पीछे उनके पारिवारिक परिवेश और पैतृक संस्कारों का बड़ा योगदान रहा। उनके पिता जय प्रकाश जैन वर्ष 1996 से लेकर 2021 तक धार्मिक नियमों का कठोरता से पालन करते थे, जिसमें एक समय भोजन ग्रहण करना, नियमित व्रत रखना तथा उपवास साधना शामिल थी। उनके पिता जीवनकाल में स्वयं साधु बनकर तपस्या करना चाहते थे, परंतु परिस्थितियों के चलते उनकी यह आकांक्षा अधूरी रह गई थी। पिता के प्रति अगाध आदर और उनकी इसी अंतिम इच्छा को साकार करने की भावना ने वकील चंद जैन को सांसारिक विरक्ति का निर्णय लेने के लिए भीतर से प्रेरित किया। उनका पारिवारिक जीवन पूरी तरह भरा-पूरा और सुखी था। उनका विवाह 3 जुलाई 1987 को दिल्ली स्थित दरिबा कलां की निवासी बबीता जैन के साथ संपन्न हुआ था। दांपत्य जीवन में उनके दो बेटे अंकित जैन व रोहित जैन और एक बेटी शिप्रा जैन हैं। परिवार में नाती-पोतों की खिलखिलाहट और सामाजिक मान-सम्मान मौजूद था। इसके बावजूद उन्होंने किसी भी सांसारिक बंधन को आत्मकल्याण के मार्ग में आड़े नहीं आने दिया। दिगंबर परंपरा में त्याग और महाव्रतों का कठिन पथ जैन दर्शन में दिगंबर संप्रदाय की मुनि चर्या अत्यंत कठिन और आत्मसंयम की पराकाष्ठा मानी जाती है। यह मात्र वस्त्रों का त्याग नहीं, बल्कि संग्रह की प्रवृत्ति, वासना और सभी लौकिक आकर्षणों से सर्वथा मुक्त होने का मार्ग है। दीक्षा ग्रहण करने के उपरांत साधक को अपरिग्रह, अहिंसा, सत्य, अचौर्य और ब्रह्मचर्य जैसे पांच बुनियादी महाव्रतों का आजीवन अक्षरशः पालन करना पड़ता है। इस परंपरा में साधु पैदल विहार करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान तक धर्म और संयम का संदेश पहुंचाते हैं। वे किसी भी प्रकार के भौतिक साधनों, वाहनों या सुविधायुक्त कमरों का उपयोग नहीं करते। मौसम की कठोर मार, भीषण सर्दी, गर्मी और बरसात के बीच नंगे पैर विचरण, दिन में केवल एक बार नियत विधि से खड़े होकर आहार ग्रहण करना और कठोर अनुशासन में रहना उनकी दिनचर्या होती है। यह मार्ग दृढ़ संकल्प, अनवरत साधना और गुरु के मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं होता। बड़ौत और बागपत के लिए बना जीवन संदेश वकील चंद जैन का जीवन यह सीख देता है कि दृढ़ निश्चय से व्यक्ति अभावों को परास्त कर सामाजिक सम्मान पा सकता है और समय आने पर उसी सम्मान व वैभव को आत्मोद्धार के लिए सहजता से छोड़ भी सकता है। बड़ौत नगर और संपूर्ण बागपत अंचल में इस त्याग की चर्चा है। जिन्होंने उन्हें साइकिल रिक्शा चलाते देखा, फिर कॉलेज में अनुशासन सिखाते देखा और अब मुनि वेश में पैदल चलते देख रहे हैं, उनके लिए यह दृश्य एक गहरा आध्यात्मिक बोध कराता है। यह घटना दर्शाती है कि पद और धन जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं हैं, बल्कि वास्तविक उपलब्धि स्वयं के आत्मिक स्वरूप को जानना है। इसका आप पर असर यह घटना दिखाती है कि आर्थिक विपन्नता के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति से प्रतिष्ठा हासिल की जा सकती है और सांसारिक सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी आत्मिक शांति को प्राथमिकता दी जा सकती है। • भारत में: यह जीवन प्रसंग देश भर के विद्यार्थियों और युवाओं को सिखाता है कि अभाव कभी प्रतिभा के आड़े नहीं आते। यदि व्यक्ति ईमानदारी से श्रम करे तो वह किसी भी मुकाम तक पहुंच सकता है। • बागपत में: स्थानीय निवासियों और भावी पीढ़ी के लिए यह घटना त्याग और आत्मसंयम की अनुपम प्रेरणा बनकर उभरी है। अपने ही नगर के एक पूर्व प्रधानाचार्य को सांसारिक मोह त्यागते देखकर लोग जीवन के वास्तविक मूल्यों पर विचार कर रहे हैं। • विद्यार्थियों के लिए: कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई जारी रखने और आत्मनिर्भर बनने की यह सच्ची दास्तान युवाओं में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। जो छात्र सीमित साधनों का रोना रोते हैं, वे इससे निरंतर पुरुषार्थ करने का सबक सीख सकते हैं। • अभिभावकों के लिए: बच्चों में सादगी और नैतिक संस्कारों का बीजारोपण करने का महत्व इस परिवार के इतिहास से स्पष्ट होता है। जीवन में चाहे जितनी समृद्धि आ जाए, विनम्रता और परिवार के प्रति निष्ठा बनाए रखना ही सच्ची सफलता है। ऐसा क्यों हुआ वकील चंद जैन द्वारा संन्यास ग्रहण करने का यह निर्णय अचानक लिया गया कदम नहीं था, बल्कि यह उनके पैतृक संस्कारों, गुरुओं के सानिध्य और लंबे आत्ममंथन का स्वाभाविक परिणाम था। • पिता की अधूरी साधु इच्छा: उनके पिता जय प्रकाश जैन वर्षों तक अत्यंत संयमित जीवन जीते रहे और मुनि बनने की अधूरी तमन्ना रखते थे। पिता के प्रति गहरे सम्मान और उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करने के संकल्प ने इस निर्णय में मुख्य भूमिका निभाई। • आचार्य संघ का सानिध्य: वर्ष 2014 में विमर्श सागर जी महाराज के चातुर्मास से उनके भीतर वैराग्य का भाव जगा था। इसके बाद 2023 में विशुद्ध सागर जी महाराज के आशीर्वाद ने उनके इस आध्यात्मिक विचार को एक पक्के संकल्प में परिवर्तित कर दिया। • सांसारिक दायित्वों की पूर्णता: उन्होंने अपनी नौकरी के दौरान शिक्षण और प्रशासनिक कार्य पूरी ईमानदारी से 2025 तक किए तथा अपने बच्चों की शिक्षा व विवाह जैसे दायित्व भी संपन्न किए। सभी पारिवारिक कर्तव्य पूर्ण हो जाने के बाद उन्होंने गुरु पूर्णिमा के दिन गृह-त्याग को अपना अंतिम लक्ष्य बनाया। सवाल-जवाब 1. वकील चंद जैन कौन हैं और वे क्यों चर्चा में हैं? वे बड़ौत स्थित दिगंबर जैन इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य हैं, जिन्होंने संन्यास लेकर दिगंबर जैन मुनि का मार्ग अपना लिया है। 2. उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में आजीविका के लिए क्या काम किए? उन्होंने बचपन में दूध बेचा, आइसक्रीम का रिक्शा चलाया, चारपाई बुनी और सिलाई का काम करके अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया था। 3. उनका शैक्षणिक और प्रशासनिक करियर कैसा रहा? वे 1986 में वाणिज्य शिक्षक बने, बाद में अंग्रेजी के प्रवक्ता और 2015 से 2025 तक कॉलेज के प्रिंसिपल रहे। इसके अलावा वे एनसीसी में कर्नल पद तक भी पहुंचे। 4. उन्होंने गृह-त्याग कब और किस अवसर पर किया? उन्होंने 9 जून 2025 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर औपचारिक रूप से गृह-त्याग कर मुनि संघ की दीक्षा का मार्ग अपनाया। 5. उनके वैराग्य के निर्णय के पीछे क्या मुख्य प्रेरणा थी? उनके पिता की अधूरी साधु बनने की इच्छा और जैन आचार्यों का सानिध्य उनके इस आध्यात्मिक निर्णय की मुख्य प्रेरणा बना। प्रेरणा और सबक कठिन परिश्रम से शिखर तक पहुंचने और फिर आत्मिक उन्नति के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने का यह सफर कई अमूल्य जीवन पाठ सिखाता है। • अभावों को कभी बहाना न बनाएं: दूध बेचने और रिक्शा चलाने जैसे कामों को करते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की जा सकती है, बशर्ते मन में लक्ष्य के प्रति दृढ़ निष्ठा हो। • पारिवारिक और पैतृक मूल्यों का सम्मान: जीवन में चाहे जितनी बड़ी पदवी या सामाजिक मान-सम्मान मिल जाए, माता-पिता की इच्छा और पारिवारिक संस्कारों को सदैव सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। • कर्तव्यों की पूर्ति के बाद विरक्ति: जीवन के प्रत्येक पड़ाव का एक विशिष्ट उद्देश्य होता है, अतः सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद आध्यात्मिक शांति की ओर बढ़ना ही जीवन की सार्थकता है। https://trendkia.com/uttar-pradesh/baraut-men-dudha-bechane-aura-riksha-chalane-se-koleja-principal-bane-vakeel-chand-jain-ne-liya-snnyasa-bane-digambara-muni-47439 TrendKia — 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