कनाडा से पुरखों की मिट्टी चूमने बलिया पहुंचा जोड़ा, 1871 के पुराने दस्तावेज़ ने दिखाई पैतृक गांव की राह डेढ़ सदी पहले भारत छोड़ चुके परिवार की तलाश में कनाडा का दंपति उत्तर प्रदेश के बलिया पहुंचा, जहां ग्रामीणों ने उनका स्वागत समोसे और चाय के साथ किया। सात समंदर पार जाकर बस जाने के बाद भी अपनी जड़ों और मिट्टी की खुशबू इंसान को हमेशा खींचती रहती है। ऐसा ही एक भावुक कर देने वाला वाकया उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सामने आया, जहां कनाडा से चलकर एक बुजुर्ग जोड़ा अपने पूर्वजों के मूल निवास की तलाश में पंदह विकास खंड के अंतर्गत स्थित खड़सरा ग्राम पंचायत के बेलौना मजरे में पहुंचा। करीब डेढ़ सौ साल पहले वर्ष 1871 में इस परिवार के पूर्वज रोजी-रोटी और नई जिंदगी की उम्मीद में अपने वतन से कलकत्ता गए थे और फिर वहां से हमेशा के लिए कनाडा में जा बसे थे। समय की गर्द में दबी अपनी पहचान को दोबारा महसूस करने की बेचैनी उन्हें सीधे बलिया की इस देहाती पगडंडी पर ले आई। धुंधली पर्ची और ब्रिटिश अफसर के दस्तखत से मिला सुराग इस अप्रत्याशित और अनोखे सफर की शुरुआत किसी आधुनिक तकनीक से नहीं बल्कि एक बेहद पुरानी कागजी पर्ची से हुई। ग्राम पंचायत सचिव मिथिलेश पांडेय और गांव के बुजुर्ग नागरिक अभय नारायण सिंह के अनुसार, इस कनाडाई दंपति के नाम असगर अली और उनकी पत्नी बर्नी हैं। परिवार की पुरानी संदूक से मिले एक पुराने रिकॉर्ड में उनके पुरखों के वतन की जानकारी दर्ज थी। जब यह दस्तावेज बना था, तब यह पूरा इलाका गाजीपुर जिले के प्रशासनिक दायरे में आता था। उस कागजात पर उस जमाने के एक ब्रिटिश अधिकारी के हस्ताक्षर मौजूद थे। इस ऐतिहासिक साक्ष्य को देखकर दंपति ने तय किया कि वे किसी जमीन, मकान या मिल्कियत के लालच के बिना, सिर्फ अपनी माटी को नमन करने और पूर्वजों के आंगन को देखने भारत जाएंगे। पंचायत भवन में छलके आंसू और टूटी-फूटी जुबां से जुड़े दिल कनाडा से सीधे गांव पहुंचे इस जोड़े के साथ संवाद कायम करने के लिए लखनऊ से एक पेशेवर दुभाषिए का सहारा लिया गया था। हालांकि औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही जज्बातों ने भाषा के हर फासले को मिटा दिया। जब पंचायत भवन परिसर में गांव के बाशिंदों ने आगे बढ़कर दोनों का खैरमकदम किया और हाथ मिलाया, तो अपनी जड़ों तक पहुंचने के अहसास से दंपति की आंखें नम हो गईं। बुजुर्गों के पूछने पर बर्नी ने मुस्कुराते हुए अपना और अपने पति का परिचय दिया। उन्होंने यह भी बताया कि वे ईसाई समुदाय से हैं जबकि असगर मुस्लिम हैं, और दोनों ने आपसी मोहब्बत और सम्मान की बुनियाद पर शादी की थी। ग्रामीणों ने अपनी सहज अंग्रेजी और गर्मजोशी से उनका इस्तकबाल किया। पुरखों का तसला, बागीचे की चौपाल और समोसे की महक बेलौना के जिस टोले में कभी उनके बुजुर्ग सांस लेते थे, वहां पहुंचते ही दंपति बेहद भावुक नजर आए। गांव के एक स्थानीय अंग्रेजी जानने वाले मुस्लिम युवक और अन्य ग्रामीणों ने उन्हें बस्ती के चप्पे-चप्पे से रूबरू कराया। वहां उन्हें वह पुराना धातु का तसला भी दिखाया गया, जिसके बारे में कहा जाता है कि कभी उनके पुरखे उसमें भात पकाया करते थे। देहाती संस्कृति के इन प्रतीकों को देखकर दोनों विदेशी मेहमान बेहद चकित और खुश हुए। इसके बाद गांव के एक बागीचे में लॉन के खुले माहौल में बैठक जमी, जहां चौहान और प्रजापति समाज के आठ-दस स्थानीय लोग जुटे। सबने मिलकर गर्म चाय और जलपान का लुत्फ उठाया। पास की एक छोटी सी ग्रामीण दुकान से समोसे और चटनी मंगवाई गई। जब गांव के एक आदरणीय बुजुर्ग ने अपनी जेब से समोसे के पैसे चुकाने की कोशिश की, तो विदेशी दंपति ने बेहद प्यार और शिष्टाचार के साथ उन्हें रोकते हुए खुद को अपनों के बीच बैठा महसूस किया। डेढ़ घंटे का भावनात्मक सफर और सुकून भरी वापसी गांव में बिताए गए महज डेढ़ से दो घंटों ने दोनों मुसाफिरों की जिंदगी भर की टीस को मिटा दिया। बातचीत से यह साफ हो गया कि उनके पुरखे इसी देहाती परिवेश के रहने वाले थे, जिन्होंने सदियों पहले परदेस रुख करते वक्त अपने घर-द्वार और ठिकाने दूसरों के सुपुर्द कर दिए थे। यद्यपि इतने लंबे अरसे के बाद किसी एक खास वंशज या शाखा की पहचान पुख्ता तौर पर नहीं हो पाई, मगर अपने वजूद के मूल स्रोत को अपनी आंखों से देख लेने का संतोष उनके चेहरों पर साफ चमक रहा था। किसी भी भौतिक स्वार्थ से कोसों दूर, केवल अपनी जड़ों को छूने की यह यात्रा इतिहास और वर्तमान के मिलन का यादगार अध्याय बन गई। इसका आप पर असर यह घटना दर्शाती है कि भारतीय गांवों में अपनी जड़ों को तलाशने वाले प्रवासियों के लिए स्थानीय आतिथ्य और पुराने अभिलेख कितने मददगार साबित हो सकते हैं। • भारत में: यह घटना देश भर में ऐतिहासिक अभिलेखों और स्थानीय विरासत को संरक्षित करने के महत्व को रेखांकित करती है। ऐसे मामलों से प्रवासी भारतीयों को अपने मूल गांवों से जुड़ने की नई प्रेरणा मिलती है। • बलिया में: इस घटना ने स्थानीय ग्रामीणों के आतिथ्य सत्कार और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की है। इससे क्षेत्र के ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने राजस्व अभिलेखों के संरक्षण के प्रति लोगों की रुचि बढ़ेगी। • प्रवासियों के लिए: पुरानी पारिवारिक पर्चियों और दस्तावेजों के आधार पर अपनी पैतृक भूमि की पहचान करना आज भी संभव है। बिना किसी संपत्ति के विवाद के केवल सांस्कृतिक जुड़ाव के लिए की गई ऐसी यात्राएं सामाजिक रिश्ते मजबूत करती हैं। • ग्रामीण संस्कृति के लिए: बाहरी अतिथियों के प्रति गांव वालों का खुलापन और आत्मीयता आज भी जीवंत परंपरा का हिस्सा है। इससे देहाती भारत की छवि वैश्विक स्तर पर अधिक आत्मीय और मानवीय बनकर उभरती है। ऐसा क्यों हुआ यह यात्रा इसलिए संभव हुई क्योंकि एक कनाडाई परिवार ने अपने पास मौजूद डेढ़ सदी पुराने दस्तावेज की मदद से अपने मूल स्थान को खोजने का फैसला किया। • पुराना पारिवारिक दस्तावेज: असगर अली के परिवार के पास वर्ष 1871 के समय की एक कागजी पर्ची सुरक्षित थी। उस दस्तावेज पर तत्कालीन गाजीपुर जिले के अंतर्गत एक ब्रिटिश अधिकारी के हस्ताक्षर थे, जिसने गांव की सही पहचान करने में मदद की। • जड़ों से जुड़ने की गहरी इच्छा: लगभग 150 वर्ष पहले कलकत्ता के रास्ते कनाडा चले जाने के बावजूद परिवार अपनी पहचान नहीं भूला था। दंपति के मन में किसी जमीन या जायदाद का कोई दावा किए बिना केवल अपने पुरखों की मिट्टी देखने की उत्कट चाहत थी। • स्थानीय सहयोग और संवाद: लखनऊ से साथ आए दुभाषिए और गांव के एक अंग्रेजी जानने वाले स्थानीय युवक की मदद से भाषा की अड़चन दूर हो गई। ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और बुजुर्गों ने सकारात्मक सहयोग देते हुए उन्हें पुरानी यादों और बर्तनों से रूबरू कराया। सवाल-जवाब 1. कनाडा से आया यह दंपति उत्तर प्रदेश के किस गांव में पहुंचा था? यह दंपति बलिया जिले के पंदह विकास खंड स्थित खड़सरा ग्राम पंचायत के बेलौना मजरे में पहुंचा था। 2. इस दंपति के नाम क्या हैं और उनका पारिवारिक इतिहास क्या है? पति का नाम असगर अली और पत्नी का नाम बर्नी है, जिनके पूर्वज वर्ष 1871 में कलकत्ता होते हुए कनाडा जा बसे थे। 3. दंपति को अपने पैतृक गांव का पता कैसे चला? उनके पास 150 साल पुरानी एक पर्ची थी, जिस पर तत्कालीन गाजीपुर जिले के प्रशासनिक संदर्भ और एक अंग्रेज अफसर के दस्तखत थे। 4. ग्रामीणों और विदेशी मेहमानों के बीच बातचीत कैसे हुई? लखनऊ से आए एक दुभाषिए और गांव के एक अंग्रेजी बोलने वाले मुस्लिम युवक की मदद से दोनों पक्षों के बीच संवाद हुआ। 5. गांव में मेहमानों को कौन सी खास ऐतिहासिक चीज दिखाई गई? उन्हें वह पुराना तसला दिखाया गया, जिसके बारे में माना जाता है कि कभी उनके पूर्वज उसमें भात बनाया करते थे। https://trendkia.com/uttar-pradesh/canadian-couple-journeys-to-ballia-to-trace-ancestral-roots-dating-back-to-1871-44286 TrendKia — Har trend, sabse pehle.