दलहन फसलों की पैदावार 15 प्रतिशत तक बढ़ाएगा नया बैक्टीरिया घोल, कानपुर आईआईपीआर ने तैयार की बिना खर्च वाली तकनीक भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान कानपुर के वैज्ञानिकों ने राइजोबियम और पीएसबी का विशेष जीवाणु मिश्रण विकसित किया है, जिससे डीएपी की खपत घटेगी और दलहन उत्पादन में भारी बढ़ोतरी होगी। देशभर में दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने और रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल हुई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के कृषि वैज्ञानिकों ने राइजोबियम और फास्फोरस साल्वलाइजिंग बैक्टीरिया (पीएसबी) का एक विशेष जैव मिश्रण तैयार किया है। इस तकनीक के तहत बुआई से पहले बीजों का उपचार इन मित्र बैक्टीरिया के घोल से किया जाता है। प्रयोगों के दौरान यह देखा गया है कि इस सरल और सस्ती प्रक्रिया से दलहनी फसलों की पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत तक की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को अपनाने के लिए किसानों को अपनी जेब से कोई भारी अतिरिक्त लागत नहीं उठानी पड़ेगी। डीएपी खाद के संकट और विकल्प की आवश्यकता हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में डाई अमोनियम फास्फेट यानी डीएपी खाद की उपलब्धता को लेकर बनी चुनौतियों के बीच यह वैज्ञानिक खोज कृषि क्षेत्र के लिए बेहद समयोचित मानी जा रही है। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. जीपी दीक्षित के अनुसार संस्थान की वैज्ञानिक टीम पिछले कई वर्षों से इस जैविक समाधान पर अनुसंधान में जुटी हुई थी। हाल के समय में जब उर्वरक संकट और डीएपी के नियंत्रित इस्तेमाल की आवश्यकता महसूस की गई, तब इस शोध कार्य की गति को और तेज कर दिया गया। प्रयोगशाला और प्रायोगिक खेतों में इस जीवाणु मिश्रण के बेहद सकारात्मक और उत्साहजनक नतीजे मिलने के बाद अब इस नवाचार को सीधे किसानों के खेतों तक ले जाने की व्यापक योजना तैयार की गई है। 10 राज्यों में 10 हजार एकड़ भूमि पर सीधा प्रदर्शन इस तकनीक को व्यावहारिक रूप से सिद्ध करने और किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए संस्थान ने एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई है। वैज्ञानिकों की विशेष टीमें देश के 10 प्रमुख राज्यों का दौरा करेंगी। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं। इन सभी राज्यों को मिलाकर कुल 10,000 एकड़ कृषि योग्य भूमि को इस मैदानी प्रदर्शन के लिए चिन्हित किया गया है। कृषि वैज्ञानिक खेतों में बीजों के उपचार की शुरुआती प्रक्रिया से लेकर फसल के पककर तैयार होने की अंतिम अवस्था तक पौधों के विकास और उपज पर पड़ने वाले प्रभावों का बारीक अध्ययन करेंगे। किन फसलों में होगा इस तकनीक का प्रयोग तकनीक के शुरुआती चरण में मुख्य रूप से तीन प्रमुख दलहनी फसलों को शामिल किया गया है, जिनमें अरहर, मूंग और उड़द शामिल हैं। वैज्ञानिकों की योजना खरीफ सीजन की इन मुख्य फसलों पर सफल परिणाम देखने के बाद अन्य दलहनी फसलों में भी इस बायो फर्टिलाइजर मिश्रण का विस्तार करने की है। संस्थान का स्पष्ट उद्देश्य है कि देश के छोटे से बड़े हर किसान तक इस तकनीक की पहुंच बनाई जाए, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर दलहन उत्पादन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया जा सके। राइजोबियम और पीएसबी की कार्यप्रणाली का वैज्ञानिक आधार इस तकनीक के काम करने के तरीके को समझाते हुए चंद्र शेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के सस्य वैज्ञानिक और दलहन अनुभाग के विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश मिश्रा ने बताया कि यह दोनों बैक्टीरिया प्राकृतिक रूप से पौधों के मित्र के रूप में कार्य करते हैं। राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर पौधों के ग्रहण करने योग्य रूप में परिवर्तित करता है। यह बैक्टीरिया पौधों की जड़ों में नन्हीं गांठें बनाकर काम करता है, जिससे पौधे को पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन मिलती रहती है। वहीं दूसरी ओर, फास्फोरस साल्वलाइजिंग बैक्टीरिया यानी पीएसबी मिट्टी में पहले से मौजूद लेकिन अघुलनशील फास्फोरस को घोलकर पौधों की जड़ों तक पहुंचाता है। जब इन दोनों बैक्टीरिया का संयुक्त रूप से इस्तेमाल किया जाता है, तो पौधों की पोषण क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों में सुधार होता है, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत का इजाफा देखने को मिलता है। भारत में बीते पांच वर्षों के दलहन उत्पादन के आंकड़े देश में दलहन उत्पादन के हालिया रुझानों पर नजर डालें तो पिछले पांच वर्षों में फसल उत्पादन के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव देखा गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021-22 में देश में कुल दलहन उत्पादन 273.02 लाख टन दर्ज किया गया था। इसके अगले वर्ष 2022-23 में उत्पादन घटकर 260.58 लाख टन रह गया। वहीं वर्ष 2023-24 में यह आंकड़ा और गिरकर 242.46 लाख टन पर पहुंच गया था। हालांकि इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ और वर्ष 2024-25 में उत्पादन बढ़कर 256.83 लाख टन दर्ज किया गया। इसके बाद हालिया वर्ष 2025-26 में देश का कुल दलहन उत्पादन बढ़कर 274.09 लाख टन के स्तर तक पहुंच गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नई बीज उपचार तकनीक के देशव्यापी विस्तार से आगामी वर्षों में दलहन उत्पादन के आंकड़ों को और अधिक मजबूती मिलेगी। इसका आप पर असर • भारत में: डीएपी खाद पर निर्भरता कम होने से दलहनी फसलों की लागत घटेगी और राष्ट्रीय स्तर पर दलहन उत्पादन 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ेगा। • उत्तर प्रदेश, एमपी व अन्य 10 राज्यों में: 10 हजार एकड़ में होने वाले लाइव प्रदर्शन से किसान बिना अतिरिक्त खर्च के अरहर, मूंग और उड़द की बंपर पैदावार हासिल कर सकेंगे। सवाल-जवाब 1. आईआईपीआर कानपुर द्वारा विकसित तकनीक क्या है? यह राइजोबियम और पीएसबी (फास्फोरस साल्वलाइजिंग बैक्टीरिया) का एक मित्र जीवाणु मिश्रण है, जिससे बुआई से पहले बीजों का उपचार किया जाता है। 2. इस बीज उपचार तकनीक से पैदावार में कितनी बढ़ोतरी होगी? वैज्ञानिक प्रयोगों के अनुसार बीजों के इस जैविक उपचार से दलहनी फसलों की पैदावार 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। 3. यह तकनीक किन 10 राज्यों के किसानों को दिखाई जाएगी? उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में इसका प्रदर्शन किया जाएगा। 4. शुरुआती चरण में किन दलहनी फसलों को शामिल किया गया है? शुरुआत में अरहर, मूंग और उड़द की खरीफ फसलों में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। 5. भारत में हालिया वर्ष 2025-26 में कितना दलहन उत्पादन हुआ? वर्ष 2025-26 में देश में कुल दलहन उत्पादन 274.09 लाख टन दर्ज किया गया। https://trendkia.com/uttar-pradesh/dalahana-phasalon-ki-paidavara-15-pratishata-taka-barhaega-naya-baiktiriya-ghola-kanpur-iipr-ne-taiyara-ki-bina-kharcha-vali-takan-18215 TrendKia — Har trend, sabse pehle.