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  "type": "article",
  "title": "सड़क से निकलकर आधुनिक मंच तक पहुंची गाजियाबाद की ऐतिहासिक श्री सुल्लामल रामलीला, सवा सदी से कायम है सांस्कृतिक पहचान",
  "summary": "गाजियाबाद के घंटाघर मैदान में 125 वर्षों से आयोजित हो रही श्री सुल्लामल रामलीला आधुनिक तकनीक और भव्य मंचन के साथ अपनी पुरानी धार्मिक परंपराओं को संजोए हुए है।",
  "content": "गाजियाबाद के घंटाघर मैदान में सजने वाला रामलीला का मंच सवा सदी के लंबे सफर का साक्षी रहा है। करीब 125 वर्ष पहले शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन उस दौर की याद दिलाता है जब गाजियाबाद महज चार दरवाजों के भीतर बसा हुआ एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था। दिल्ली गेट के पास एक साधारण सड़क से प्रारंभ हुआ यह मंचन आज वक्त के थपेड़ों और शहरीकरण के विस्तार के बीच भी अपनी मौलिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और गरिमा को पूरी मजबूती के साथ बरकरार रखे हुए है। मौजूदा दौर में पारंपरिक स्वरूप के साथ आधुनिक एलईडी स्क्रीन, उन्नत साउंड सिस्टम और भव्य मंच सज्जा का तालमेल इस आयोजन को नई पीढ़ी के बीच भी प्रासंगिक बनाए हुए है।\n\nलाला सुल्लामल का सपना और मांडी भाषा में रामायण\nइस ऐतिहासिक आयोजन के नामकरण के पीछे भी एक बेहद दिलचस्प और प्रेरक पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। लगभग सन 1900 के आसपास धर्मनिष्ठ प्रवृत्ति के लाला सुल्लामल ने इस रामलीला की नींव रखी थी। उस समय महज 20 वर्ष की युवा आयु में उन्होंने मांडी भाषा में रामायण की रचना की थी। इसी आध्यात्मिक साधना के दौरान उनके मन में प्रभु श्रीराम के जीवन चरित्र को मंच पर जीवंत करने की प्रेरणा जागी और उन्होंने रामलीला का मंचन आरंभ कराया। शुरुआत में यह मंचन दिल्ली गेट के निकट मोहल्ला अफगान के बाहर सड़क पर ही किया जाता था। उन दिनों नगर के स्थानीय निवासी ही प्रभु राम, माता सीता, लक्ष्मण और अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक पात्रों का अभिनय पूरी निष्ठा के साथ निभाते थे। जैसे-जैसे गाजियाबाद का दायरा चारों दरवाजों से बाहर फैला, वैसे-वैसे इस रामलीला की ख्याति भी दूर-दराज तक फैलती चली गई।\n\nशहर के केंद्र से घंटाघर मैदान तक का ऐतिहासिक सफर\nश्री सुल्लामल रामलीला समिति के पूर्व अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि उनके 82 वर्ष के जीवनकाल में यह परंपरा लगातार फलती-फूलती रही है। उनके अनुसार, उनके होश संभालने से भी कई दशक पहले से यह मंचन पूरी भव्यता के साथ आयोजित होता आ रहा था। प्रारंभिक समय में जब रामलीला नगर के भीतरी हिस्से में होती थी, तब जगह के सीमित होने के कारण बाद में दशहरा और रामलीला मंचन के लिए घंटाघर के पास स्थित विशाल जमीन उपलब्ध कराई गई। इसके उपरांत घंटाघर स्थित रामलीला मैदान ही इस पूरे उत्सव का प्रमुख केंद्र बन गया, जहां हर वर्ष मंचन और विजयादशमी का पर्व पूरे उत्साह से मनाया जाने लगा।\n\nस्थानीय नागरिकों से मथुरा और फिर दिल्ली के कलाकारों की यात्रा\nसमय बीतने के साथ मंचन की शैली, प्रस्तुतिकरण और कलाकारों के चयन में भी उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किए गए। शुरुआती दशकों में जहां शहर के ही साधारण नागरिक मंच पर आकर अभिनय करते थे, वहीं बाद में उत्तर प्रदेश के मथुरा से कुशल पेशेवर कलाकारों को आमंत्रित किया जाने लगा। कई दशकों तक मथुरा की मंडलियों ने अपनी पारंपरिक अभिनय शैली से यहां के दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वहीं पिछले चार-पांच वर्षों से देश की राजधानी दिल्ली के अनुभवी कलाकार मंच पर विभिन्न प्रसंगों का सजीव मंचन कर रहे हैं। पुराने हाथ से बनाए गए पर्दों और सादे मंच की जगह अब डिजिटल एलईडी स्क्रीन, उच्च गुणवत्ता वाले आधुनिक ध्वनि उपकरण और बहुरंगी रोशनी ने ले ली है।\n\nआधुनिक तकनीक के बावजूद अटूट धार्मिक संस्कार\nप्रबंधन समिति के पदाधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि तकनीकी बदलावों के बावजूद रामलीला के मूल भाव, निष्ठा और धार्मिक मर्यादाओं के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया गया। आधुनिक संसाधनों का उपयोग केवल इसलिए किया जा रहा है ताकि युवा पीढ़ी को दृश्य-श्रव्य माध्यम से अपनी जड़ों और मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों से जोड़ा जा सके। एक दौर ऐसा भी था जब पूरे शहर और आसपास के तमाम ग्रामीण इलाकों से लोग सिर्फ इसी एक रामलीला को देखने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होते थे। यद्यपि अब गाजियाबाद के विभिन्न इलाकों में कई अन्य मंचन होने के कारण दर्शकों का विभाजन हुआ है, फिर भी दशहरे के अवसर पर घंटाघर मैदान में जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इस मंच से राजनीतिक और सामाजिक जगत का भी गहरा नाता रहा है, जहां पूर्व में राजनाथ सिंह सहित अनेक सांसद, विधायक तथा अन्य गणमान्य जनप्रतिनिधि समय-समय पर दर्शन के लिए पहुंचते रहे हैं।\n\nनब्बे फीट का रावण और भव्य गणेश यात्रा की तैयारी\nइस वर्ष के विशेष आकर्षणों में मैदान में स्थापित होने वाला करीब 90 फीट ऊंचा रावण का विशाल पुतला मुख्य चर्चा का विषय बना हुआ है। मंचन की विधिवत शुरुआत से पूर्व नगर में रावण दूत के माध्यम से रामलीला के आगमन का औपचारिक संदेश प्रसारित किया गया। इसके तुरंत बाद भव्य गणेश यात्रा निकाली जा रही है, जिसके संपन्न होते ही मैदान में दैनिक लीलाओं का नियमित मंचन शुरू हो जाएगा। गाजियाबाद के आधुनिक स्वरूप में ढलने के बाद भी यह 125 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक धरोहर नगरवासियों की आस्था का अमर केंद्र बनी हुई है।\n\nइसका आप पर असर\nगाजियाबाद की ऐतिहासिक रामलीला आधुनिक तकनीकों के समन्वय के साथ सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजने का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।\n\n• भारत में: देश भर में पारंपरिक धार्मिक आयोजनों को नई पीढ़ी के अनुकूल बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और डिजिटल मंच सज्जा का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। इससे प्राचीन लोक कलाओं और पौराणिक गाथाओं के प्रति युवाओं की सहभागिता एवं रुचि सुदृढ़ होती है।\n• गाजियाबाद में: घंटाघर रामलीला मैदान में 90 फीट ऊंचे रावण दहन और भव्य मंचन के चलते स्थानीय नागरिकों को समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रत्यक्ष अनुभव मिलेगा। त्योहारों के दौरान शहर के मुख्य बाजारों और घंटाघर क्षेत्र में जाने वाले श्रद्धालुओं को यातायात व्यवस्था और उत्सव की समय-सारिणी का ध्यान रखना चाहिए।\n• कलाकारों के लिए: दिल्ली और क्षेत्रीय कलाकारों को ऐसे प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक मंचों पर अपनी अभिनय प्रतिभा प्रदर्शित करने का व्यापक अवसर मिलता है। इससे पारंपरिक रंगमंच से जुड़े कलाकारों की कला को नया जीवन और आर्थिक संबल प्राप्त होता है।\n• परिवारों और दर्शकों के लिए: आधुनिक एलईडी स्क्रीन और उन्नत ध्वनि प्रणाली के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों दोनों के लिए लीला दर्शन सुगम और आकर्षक बनता है। दर्शक सवा सौ साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा का साक्षी बनकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nगाजियाबाद की श्री सुल्लामल रामलीला का 125 वर्षों से लगातार आयोजित होना इसके मजबूत सामाजिक जुड़ाव और समय के साथ हुए सकारात्मक बदलावों का परिणाम है। इस ऐतिहासिक निरंतरता के पीछे कई प्रमुख सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारण रहे हैं।\n\n• लाला सुल्लामल की प्रेरणा: सन 1900 के आसपास 20 वर्षीय लाला सुल्लामल द्वारा मांडी भाषा में रामायण लिखे जाने के बाद धार्मिक भाव के प्रचार के लिए इस मंचन की नींव रखी गई थी। उनकी इस पहल ने स्थानीय नागरिकों को एकजुट कर एक स्थायी सांस्कृतिक मंच प्रदान किया।\n• शहरी विस्तार और जगह का स्थानांतरण: चार दरवाजों के भीतर सड़क पर शुरू हुआ यह आयोजन आबादी बढ़ने पर घंटाघर के खुले मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। स्थायी मैदान उपलब्ध होने से दशहरा और रामलीला को बड़े पैमाने पर भव्य रूप से आयोजित करने की सुविधा मिली।\n• कला और तकनीक का आधुनिकीकरण: स्थानीय कलाकारों से मथुरा और फिर दिल्ली के पेशेवर कलाकारों को जोड़ना तथा एलईडी स्क्रीन का उपयोग करना इसकी निरंतर लोकप्रियता का बड़ा कारण है। तकनीक के समावेश ने युवा दर्शकों को बांधे रखा, जिससे सवा सदी बाद भी यह परंपरा अटूट बनी रही।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गाजियाबाद की श्री सुल्लामल रामलीला कितने साल पुरानी है?\nयह ऐतिहासिक रामलीला लगभग 125 साल पुरानी है और इसकी शुरुआत सन 1900 के आसपास हुई थी।\n\n2. श्री सुल्लामल रामलीला की शुरुआत किसने की थी?\nइसकी शुरुआत धर्मनिष्ठ लाला सुल्लामल ने 20 वर्ष की आयु में मांडी भाषा में रामायण लिखने के बाद की थी।\n\n3. प्रारंभिक दौर में यह रामलीला कहां आयोजित की जाती थी?\nशुरुआती दौर में यह रामलीला दिल्ली गेट के पास मोहल्ला अफगान के बाहर सड़क पर आयोजित होती थी।\n\n4. वर्तमान में रामलीला में कौन से कलाकार अभिनय कर रहे हैं?\nपिछले चार-पांच वर्षों से दिल्ली के कलाकार इस रामलीला में विभिन्न पात्रों का मंचन कर रहे हैं, जबकि पहले मथुरा के कलाकार आते थे।\n\n5. इस वर्ष रावण के पुतले की ऊंचाई कितनी रखी गई है?\nइस वर्ष आयोजन में करीब 90 फीट ऊंचे रावण के पुतले के निर्माण की तैयारी की गई है।\n\n6. किन प्रमुख जनप्रतिनिधियों का इस रामलीला से जुड़ाव रहा है?\nसमिति के अनुसार पूर्व में राजनाथ सिंह सहित कई सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि यहां रामलीला देखने आ चुके हैं।",
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  "category": "उत्तर प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-07",
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