गोबर से बने तैरने वाले दीयों से सजेंगे वीआईपी आवास, अयोध्या में जलेंगे 5100 विशेष दीपक सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला में गोवंश के शुद्ध गोबर से पानी में तैरने वाले पर्यावरण अनुकूल दीपक तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें अयोध्या के अलावा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास भी भेजा जा रहा है। दीपावली के मौके पर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से तैयार किए जा रहे विशेष तरह के दीपक देशभर में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। नगर निगम की ओर से संचालित नवादा स्थित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में गोवंश के शुद्ध गोबर से खास दीपक तैयार किए जा रहे हैं। इन दीपकों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पानी की सतह पर आसानी से तैरते हैं और पूजा के बाद प्राकृतिक खाद के रूप में पूरी तरह मिट्टी में मिल जाते हैं। इस साल इन अनोखे दीपकों से न केवल सामान्य नागरिकों के घर रोशन होंगे, बल्कि इन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यपाल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आधिकारिक आवासों में भी प्रज्वलित करने के लिए भेजा जा रहा है। अयोध्या राम मंदिर में जगमगाएंगे 5100 विशेष दीपक भव्य दीपोत्सव के लिए धार्मिक नगरी अयोध्या में इन दीपकों की एक बड़ी खेप पहुंचाई जा रही है। राम मंदिर परिसर में रोशनी बिखेरने के उद्देश्य से गौशाला प्रबंधन की तरफ से कुल 5100 दीपक विशेष रूप से भेजे जा रहे हैं। अयोध्या में दीपावली और दीपोत्सव का आयोजन बेहद भव्य और व्यापक स्तर पर किया जाता है, जिसमें लाखों दीयों की कतारें सजाई जाती हैं। इस खास अवसर पर गाय के गोबर से बने इन दीयों को शामिल कर पर्व की गरिमा और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ जोड़ने की अनूठी कोशिश की जा रही है। पानी पर तैरने वाले दीयों की खासियत और उपयोग गौशाला में बनाए जा रहे इन दीपकों को पानी से भरे बर्तनों, थालों या सजावटी कुंडों में रखकर जलाया जाता है, जहां ये डूबने के बजाय पानी पर तैरते रहते हैं। यह दृश्य घरों की साज-सज्जा को एक आकर्षक और पारंपरिक स्वरूप प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल होने की वजह से पर्व समाप्त होने के बाद इन्हें कचरे में फेंकने की आवश्यकता नहीं होती। इस्तेमाल के बाद इन दीयों को गमलों, पौधों या क्यारियों में सीधे डाला जा सकता है, जहां कुछ ही दिनों में ये गलकर पेड़-पौधों के लिए जैविक खाद में परिवर्तित हो जाते हैं। गोबर से मूर्तियों और धूपबत्ती का भी निर्माण पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी डॉक्टर संदीप मिश्रा ने इस अनूठी पहल पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि आगामी दीपावली पर्व के दृष्टिगत मां शाकंभरी उपवन गौशाला में गाय के शुद्ध गोबर से दीपक बनाने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। उन्होंने बताया कि दीपकों के अलावा यहां गाय के गोबर और पंचगव्य की मदद से भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियां, सम्भराणी कप तथा विशेष सुगंधित धूपबत्ती भी बनाई जा रही हैं। इन उत्पादों से वातावरण पूरी तरह शुद्ध और अनुकूल बना रहता है। आत्मनिर्भर गौशाला में 575 गोवंशों का संरक्षण सहारनपुर नगर निगम द्वारा संचालित इस आत्मनिर्भर गौशाला में सड़कों पर आवारा घूमने वाले बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय दिया जाता है। वर्तमान समय में इस केंद्र में कुल 575 गोवंश संरक्षित हैं। इन संरक्षित गोवंशों के गोबर और गोमूत्र का समुचित उपयोग करके विभिन्न उपयोगी सामग्री तैयार की जा रही है। इन उत्पादों की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी है कि देशभर से खरीदार ऑनलाइन माध्यमों से इन अनोखे तैरने वाले दीपकों और पूजा सामग्रियों के लिए ऑर्डर दे रहे हैं, जिससे गौशाला के संचालन को स्वावलंबी बनाने में भी मदद मिल रही है। इसका आप पर असर पर्यावरण अनुकूल गोबर के इन तैरने वाले दीयों से त्योहारों की सजावट में बदलाव और जैविक खाद का दोहरा लाभ मिलता है। • भारत में: देशभर के उपभोक्ता इन तैरते हुए बायोडिग्रेडेबल दीयों को ऑनलाइन मंगवाकर प्रदूषण मुक्त तरीके से उत्सव मना सकते हैं। त्योहार के बाद इन्हें कचरे में फेंकने के बजाय सीधे गमलों में डालकर प्राकृतिक खाद तैयार की जा सकती है। • सहारनपुर में: स्थानीय स्तर पर आवारा मवेशियों की समस्या को कम करने और गौशाला को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल रही है। इससे शहर के 575 संरक्षित गोवंशों के रखरखाव और चारे की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित होती है। • सजावट और सुविधा: पानी में तैरने की खूबी के कारण इन्हें घरों में रखे पानी के बर्तनों में आसानी से जलाकर अनोखा रूप दिया जा सकता है। इससे पारंपरिक मिट्टी के दीयों के विकल्प के रूप में एक नया और सुविधाजनक साधन मिलता है। • मंदिरों और बड़े आयोजनों में: अयोध्या जैसे बड़े धार्मिक स्थलों पर 5100 दीयों का इस्तेमाल प्लास्टिक और रसायनों से मुक्त पारंपरिक पूजा सामग्री को बढ़ावा देता है। इससे बड़े पैमाने पर होने वाले उत्सवों में निकलने वाले कचरे का सुरक्षित प्रबंधन संभव होता है। ऐसा क्यों हुआ सहारनपुर नगर निगम ने सड़कों पर आवारा घूमने वाले गोवंशों के संरक्षण और गौशाला को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए गोबर के मूल्य संवर्धन का यह मॉडल शुरू किया। • आवारा गोवंश संरक्षण की आवश्यकता: शहरी क्षेत्रों में बेसहारा मवेशियों के प्रबंधन के लिए नवादा में मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला की स्थापना की गई थी। इस केंद्र में वर्तमान में 575 मवेशियों की देखरेख की जा रही है, जिनके चारे और पोषण के लिए निरंतर संसाधनों की आवश्यकता होती है। • गोबर का व्यावसायिक उपयोग: बड़ी संख्या में मौजूद पशुओं से निकलने वाले गोबर और गोमूत्र के निस्तारण की चुनौती को हल करने के लिए उत्पादों के निर्माण का फैसला लिया गया। दीयों, मूर्तियों और धूपबत्ती के निर्माण से अपशिष्ट प्रबंधन के साथ-साथ गौशाला की आमदनी का साधन तैयार हुआ। • त्योहारी मांग और नवाचार: दीपावली पर पारंपरिक दीयों से अलग कुछ नया पेश करने के लिए पानी पर तैरने वाले दीयों का नवाचार किया गया। इसकी उपयोगिता और शून्य-अपशिष्ट प्रकृति के कारण इसे अयोध्या राम मंदिर और वीआईपी आवासों तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया। सवाल-जवाब 1. सहारनपुर की गौशाला में किस तरह के खास दीपक बनाए जा रहे हैं? यहां गोवंश के शुद्ध देसी गोबर से ऐसे दीपक बनाए जा रहे हैं जो पानी पर तैरते हैं और इस्तेमाल के बाद गमलों में खाद के रूप में घुल जाते हैं। 2. यह गौशाला कहां स्थित है और इसका संचालन कौन करता है? यह मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला सहारनपुर नगर निगम के नवादा क्षेत्र में स्थित है और इसका संचालन नगर निगम द्वारा किया जाता है। 3. इस गौशाला में कुल कितने गोवंश संरक्षित हैं? सड़कों पर आवारा घूमने वाले गोवंशों को सुरक्षित रखने के लिए संचालित इस गौशाला में वर्तमान में 575 गोवंश संरक्षित हैं। 4. अयोध्या राम मंदिर के लिए कितने दीपक भेजे जा रहे हैं? अयोध्या में आयोजित होने वाले भव्य दीपोत्सव और राम मंदिर परिसर के लिए सहारनपुर से 5100 गोबर के दीपक भेजे जा रहे हैं। 5. दीपक के अलावा गौशाला में गोबर से कौन से अन्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं? दीपक के अलावा यहां गाय के गोबर से भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियां, सम्भराणी कप तथा धूपबत्ती भी बनाई जा रही हैं। 6. इन तैरने वाले दीयों का उपयोग समाप्त होने के बाद क्या किया जा सकता है? यह पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं, इसलिए इन्हें गमलों या क्यारियों में डालने पर यह पेड़-पौधों के लिए जैविक खाद में बदल जाते हैं। प्रेरणा और सबक बेसहारा मवेशियों की समस्या को आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण के सफल मॉडल में बदलने की यह एक प्रेरक मिसाल है। • कचरे को संपदा में बदलना: जिस गोबर को आमतौर पर अनुपयोगी समझा जाता है, उससे तैरने वाले अनोखे दीये बनाकर उत्पादक मूल्य पैदा किया जा सकता है। यह सीख देता है कि स्थानीय संसाधनों में नवाचार जोड़कर नई आर्थिक संभावनाएं खोली जा सकती हैं। • समस्या का व्यावहारिक समाधान: सड़कों पर घूमने वाले 575 आवारा पशुओं को केवल आश्रय देने तक सीमित न रहकर गौशाला को स्वावलंबी बनाने का प्रयास किया गया। संकट को अवसर में बदलने का यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है। • पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली: उपयोग के बाद मिट्टी में मिलकर पौधों की खाद बनने वाले उत्पाद यह सिखाते हैं कि उत्सव और प्रकृति के संरक्षण को साथ-साथ साधा जा सकता है। https://trendkia.com/uttar-pradesh/gobara-se-bane-tairane-vale-diyon-se-sajenge-vip-avasa-ayodhya-men-jalenge-5100-vishesha-dipaka-56608 TrendKia — Har trend, sabse pehle.