गोमती किनारे दफन है बौद्ध काल का स्वर्णिम इतिहास, सुल्तानपुर के भदैंया, धम्मौर और गढ़ा में मिले प्राचीन मूर्तियों के अवशेष उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में भदैंया, धम्मौर और गढ़ा आश्रम जैसे स्थलों से बौद्ध काल की प्राचीन मूर्तियां और अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो कनिष्क और कुषाण शासनकाल के इतिहास पर रोशनी डालते हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी के किनारे बसे कई इलाके ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से बेहद समृद्ध माने जाते हैं। जिले के भदैंया, धम्मौर और गढ़ा जैसे क्षेत्रों में समय-समय पर मिली प्राचीन मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष इस बात का गवाह हैं कि यह समूचा क्षेत्र बौद्ध काल में एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र हुआ करता था। वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार, वर्ष 1857 ई. के बाद जब प्रशासनिक अधिकारी मिलेट सुल्तानपुर जिले की बंदोबस्त रिपोर्ट तैयार कर रहे थे, तब उन्हें कनिष्क कालीन टीलों से भगवान बुद्ध की अनेक मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। इस ऐतिहासिक संदर्भ का विस्तृत विवरण प्रसिद्ध पुस्तक इंडिया इन टाइम ऑफ पतंजलि में भी दर्ज है। भदैंया और धम्मौर के नाम से जुड़े बौद्ध कालीन साक्ष्य बंदोबस्त अधिकारी मिलेट ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट में रेखांकित किया था कि भदैंया नाम का सीधा संबंध भद्रयान और बुद्धयान परंपराओं से है। इसी कड़ी में भद्राणि शब्द के तद्भव रूप से भदांव नाम विकसित हुआ, जो मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में परगना आसल का एक अत्यंत प्रसिद्ध महाल माना जाता था। भदैंया क्षेत्र से मिली भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं स्पष्ट संकेत देती हैं कि प्राचीन काल में यहां शक और कुषाण राजवंशों का शासन रहा था। इन पुरातात्विक साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि शक और कुषाण युग के दौरान सुल्तानपुर के इस पूरे अंचल में बौद्ध मतावलंबियों की बड़ी उपस्थिति मौजूद थी। इतिहास के पन्नों के अनुसार, कुषाण शासक कनिष्क भी मौर्य सम्राट अशोक की भांति बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार तथा बौद्ध विहारों के निर्माण में गहरा अनुराग रखते थे। यही मुख्य कारण था कि सर्वे के दौरान मिलेट और वैनेट को जिले में कई विशाल और ऊंचे टीले मिले थे, जिन्हें प्राचीन काल के ध्वस्त बौद्ध विहारों के भग्नावशेष के रूप में चिन्हित किया गया। भाषाविज्ञान की दृष्टि से देखें तो संस्कृत का धर्म शब्द पालि भाषा में धम्म बन गया था, जिसका प्रयोग महात्मा बुद्ध के जीवनकाल में बहुतायत से होता था। इसी शाब्दिक आधार पर यह माना जाता है कि धम्मौर तथा उसके आसपास का पूरा भूभाग प्राचीन काल में बौद्ध धर्म और संस्कृति के प्रसार का मुख्य केंद्र रहा होगा। तस्करी का दंश और गढ़ा स्थल का ऐतिहासिक महत्व धम्मौर के समीपवर्ती गांवों जैसे कि भंडरा, नरही, भाटी, शनिचरा, सोमनाभार, कूड़ मंदिर, हाजी पट्टी और टिकरी दिखौली में बौद्ध कालीन तथा उसके बाद के युग के अनेक प्राचीन पुरावशेष और बेशकीमती मूर्तियां बिखरी हुई पाई जाती हैं। हालांकि, देखरेख के अभाव में इनमें से बहुत सी दुर्लभ और प्राचीन मूर्तियों को तस्कर चुराकर ले गए, फिर भी वर्तमान में कई महत्वपूर्ण अवशेष इस स्थान पर मौजूद हैं। स्थानीय नागरिक भारतदास के मुताबिक, वर्ष 1985-86 में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा गढ़ा स्थल पर पुरातात्विक खुदाई कराई गई थी। उस उत्खनन के दौरान बुद्ध की प्रतिमा और कई ऐसे मजबूत ऐतिहासिक साक्ष्य मिले थे, जिन्होंने गढ़ा के पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व को पूरी दुनिया के सामने सिद्ध कर दिया था। इसके बावजूद, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि विभिन्न सरकारों ने इस अमूल्य धरोहर की अनदेखी की और यहां संरक्षण या पर्यटन विकास का कोई ठोस कार्य शुरू नहीं हो सका। गोमती तट पर कलाम वंशीय क्षत्रियों को बुद्ध का उपदेश गढ़ा आश्रम के परिसर में आज भी मौजूद लखौरी ईंटें इस स्थान की प्राचीनता और वैभव का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। प्रचलित पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार, इसी पवित्र स्थल पर भगवान गौतम बुद्ध ने कलाम वंशीय क्षत्रियों को अपने उपदेश दिए थे। इस महत्वपूर्ण घटना का स्पष्ट उल्लेख वर्ष 1903 में प्रकाशित ऐतिहासिक दस्तावेज गजेटियर ऑफ अवध 1903 में भी प्रमुखता से दर्ज किया गया है। भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह ऐतिहासिक स्थल सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुड़वार ग्रंट ग्रामसभा में गोमती नदी के पूर्वी तट पर बसा हुआ है। यदि इस पुरातात्विक क्षेत्र का उचित संरक्षण किया जाए, तो यह न केवल सुल्तानपुर बल्कि पूरे देश के लिए बौद्ध पर्यटन का एक नया और समृद्ध केंद्र बन सकता है। इसका आप पर असर क्या है इस खबर का असर: • भारत में: देश भर के इतिहासप्रेमी और बौद्ध धर्म के शोधार्थी सुल्तानपुर के इन प्राचीन स्थलों के जरिए कनिष्क काल के बौद्ध प्रसार को गहराई से समझ सकते हैं। • सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में: स्थानीय नागरिकों के लिए इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और गोमती तट पर पर्यटन विकास की नई उम्मीदें जागी हैं। सवाल-जवाब 1. सुल्तानपुर में बौद्ध काल के अवशेष किन प्रमुख स्थानों पर मिले हैं? सुल्तानपुर जिले के भदैंया, धम्मौर और कुड़वार ग्रंट स्थित गढ़ा आश्रम में बौद्ध कालीन मूर्तियां और प्राचीन टीलों के अवशेष मिले हैं। 2. गढ़ा स्थल पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने कब खुदाई कराई थी? आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने वर्ष 1985-86 में गढ़ा स्थल पर खुदाई कराई थी, जहां बौद्ध प्रतिमाएं और ऐतिहासिक प्रमाण मिले थे। 3. भगवान बुद्ध ने गढ़ा आश्रम में किसे उपदेश दिया था? ऐतिहासिक मान्यताओं और गजेटियर ऑफ अवध 1903 के अनुसार, भगवान बुद्ध ने गढ़ा आश्रम में कलाम वंशीय क्षत्रियों को उपदेश दिया था। 4. भदैंया और धम्मौर के नामों का बौद्ध धर्म से क्या संबंध है? भदैंया नाम भद्रयान और बुद्धयान से जुड़ा है, जबकि धम्मौर नाम संस्कृत के धर्म शब्द के पालि रूप 'धम्म' से निकला माना जाता है। https://trendkia.com/uttar-pradesh/gomti-kinare-daphana-hai-bauddha-kala-ka-svarnima-itihasa-sultanpur-ke-bhaddaiya-dhammaur-aura-gadha-men-mile-prachina-murtiyon-ke-16859 TrendKia — Har trend, sabse pehle.