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  "type": "article",
  "title": "जसवंतनगर में चार दशकों से अटूट है समाजवादियों का तिलिस्म, जानिए कैसे कायम रहा यह गढ़",
  "summary": "इटावा की जसवंतनगर सीट पर 1985 से मुलायम सिंह यादव के कुनबे का अजेय सफर बदस्तूर जारी है, जहां शिवपाल सिंह यादव लगातार छह बार विधानसभा पहुंचे हैं। 1991 से 2022 तक के चुनावी आंकड़ों के आईने में जानिए आगामी 2027 चुनाव की सियासी बिसात।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की जसवंतनगर विधानसभा सीट प्रदेश की राजनीति में एक विशिष्ट पहचान रखती है। यह इलाका समाजवादी विचारधारा और विशेष रूप से मुलायम सिंह यादव के परिवार की राजनीति का केंद्र बिंदु माना जाता रहा है। साल 1985 के बाद से इस सीट पर कभी भी किसी विरोधी दल का प्रत्याशी विजय हासिल नहीं कर सका है। पहले स्वयं मुलायम सिंह यादव यहां से चुनकर सदन पहुंचे और बाद में इस राजनीतिक उत्तराधिकार को उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने संभाला, जो लगातार छह बार से यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पिछले तीन दशकों के दौरान इस चुनावी रण में भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस जैसी प्रमुख पार्टियां पूरा जोर लगाने के बावजूद जीत का स्वाद चखने में असफल रही हैं। ऐसे में 1991 से लेकर 2022 तक के चुनावी उतार-चढ़ाव और आंकड़ों के जरिए यह समझना जरूरी है कि आगामी 2027 के चुनाव में यहां किस तरह की परिस्थितियां बन सकती हैं।\n\nशुरुआती सियासी सफर और 1991 का ऐतिहासिक जनादेश\nजसवंतनगर के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो मुलायम सिंह यादव पहली मर्तबा 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न पर यहां से विधायक बने थे। इसके बाद उन्होंने 1974, 1977, 1985 और 1989 के चुनावों में भी जीत का परचम लहराया। 1991 के विधानसभा चुनाव के दौरान मुलायम सिंह यादव जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे। उस चुनाव में उन्हें 47,765 मतदाताओं का समर्थन प्राप्त हुआ था। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में कांग्रेस पार्टी के दर्शन सिंह यादव खड़े थे, जिन्हें कुल 30,601 वोट मिले। इस प्रकार मुलायम सिंह यादव ने 17,164 मतों के अंतर से यह मुकाबला अपने नाम किया था। यह वह दौर था जब प्रदेश की राजनीति में बड़े सामाजिक और वैचारिक बदलाव देखे जा रहे थे, लेकिन जसवंतनगर ने अपने पुराने नेता पर ही भरोसा बनाए रखा।\n\n1993 का कड़ा मुकाबला और महज 1,161 वोटों से फैसला\nसाल 1993 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जसवंतनगर सीट के चुनावी इतिहास का सबसे रोमांचक और कांटे की टक्कर वाला चुनाव साबित हुआ। मुलायम सिंह यादव ने अपनी नई राजनीतिक जमात समाजवादी पार्टी का गठन किया था और वह इसी दल के सिंबल पर चुनावी मैदान में उतरे। इस चुनाव में प्रदेश स्तर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का औपचारिक गठबंधन हुआ था। कांग्रेस के दर्शन सिंह यादव ने उन्हें बेहद कड़ी चुनौती पेश की।\n\nमतगणना के अंतिम आंकड़ों में मुलायम सिंह यादव को कुल 60,242 वोट हासिल हुए, जबकि उनके सामने खड़े कांग्रेस के दर्शन सिंह यादव को 59,081 मत मिले। इस बेहद करीबी मुकाबले में जीत का अंतर केवल 1,161 वोटों का रहा। 1991 से लेकर 2022 के बीच हुए कुल आठ विधानसभा चुनावों के रिकॉर्ड को देखें तो यह मुकाबला सबसे नजदीकी रहा था। इस चुनावी सफलता के बाद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए थे।\n\n1996 में शिवपाल सिंह यादव के हाथों में आई कमान\n1996 का साल जसवंतनगर के राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। केंद्र की राजनीति में संयुक्त मोर्चा सरकार का गठन हुआ, जिसमें मुलायम सिंह यादव सांसद चुने जाने के बाद देश के रक्षा मंत्री बने। केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के कारण उन्होंने अपनी पारंपरिक सीट की कमान अपने छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को सौंपी।\n\n1996 के विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी बने। उनके सामने एक बार फिर कांग्रेस के मजबूत नेता दर्शन सिंह यादव डटे हुए थे। शिवपाल सिंह यादव ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में 68,377 वोट हासिल किए, जबकि दर्शन सिंह यादव 57,438 मतों तक पहुंच सके। शिवपाल सिंह यादव ने यह चुनाव 10,939 वोटों के फासले से जीत लिया। यहीं से इस सीट पर शिवपाल सिंह यादव के अजेय रहने का लंबा दौर शुरू हुआ, जो लगातार आगे बढ़ता चला गया।\n\n2002 और 2007: जीत का अंतर बढ़ा और लगी हैट्रिक\nसाल 2002 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने फिर से शिवपाल सिंह यादव पर ही अपना दांव लगाया। इस चुनाव में मुख्य मुकाबले की तस्वीर बदली और कांग्रेस के स्थान पर बहुजन समाज पार्टी मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी। शिवपाल सिंह यादव को कुल 80,544 मत मिले, जबकि बसपा उम्मीदवार रमेश चंद्र शाक्य को 27,555 वोटों से संतोष करना पड़ा। इस मुकाबले में शिवपाल सिंह यादव ने 52,989 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की और लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। वहीं भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार शिवप्रसाद 14,146 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।\n\nइसके बाद 2007 के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने जसवंतनगर से जीत की हैट्रिक पूरी की। इस चुनाव में पूरे उत्तर प्रदेश के भीतर बहुजन समाज पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, लेकिन जसवंतनगर का चुनावी दुर्ग भेदने में वह पूरी तरह नाकाम रही। शिवपाल सिंह यादव ने 73,211 वोट हासिल किए। उनके सामने बसपा प्रत्याशी बाबा हरनारायण यादव 42,404 वोट ही जुटा पाए। इस चुनाव में जीत का फासला 30,807 मतों का रहा। भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी डॉ. राजबहादुर सिंह यादव को केवल 4,687 मत मिले और वे तीसरे पायदान पर रहे।\n\n2012 में प्रचंड लहर और 81 हजार से अधिक मतों की जीत\nसाल 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश भर में समाजवादी पार्टी की जोरदार लहर देखने को मिली और पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ, जिसके बाद अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। जसवंतनगर सीट पर भी इस राजनीतिक माहौल का सीधा असर दिखा। शिवपाल सिंह यादव ने अपने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 1,33,563 मत बटोरे।\n\nउनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी बसपा के मनीष यादव रहे, जिन्हें 52,479 वोट मिले। इस प्रकार शिवपाल सिंह यादव ने 81,084 मतों के विशाल अंतर से चौथी बार जीत अपने नाम की। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस काफी पीछे छूट गईं। भाजपा के उम्मीदवार राकेश पाल को 12,708 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अजय कुमार यादव गुड्डू 8,260 मतों के साथ चौथे पायदान पर रहे।\n\n2017 का सियासी घमासान और पांचवीं चुनावी कामयाबी\n2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के बीच गहरा पारिवारिक व राजनीतिक विवाद खुलकर सामने आ चुका था। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे थे कि इस कलह का असर चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। इसके बावजूद शिवपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर ही जसवंतनगर से मैदान में उतरे।\n\nइस चुनाव में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि 2012 में बसपा से लड़े मनीष यादव इस बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। मतगणना में शिवपाल सिंह यादव को 1,26,834 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी मनीष यादव 74,218 मत प्राप्त कर सके। शिवपाल सिंह यादव ने 52,616 मतों के अंतर से लगातार पांचवीं बार शानदार जीत दर्ज की। यह पहला मौका था जब जसवंतनगर सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कोई उम्मीदवार दूसरे स्थान पर पहुंचा था। वहीं बसपा प्रत्याशी दुर्वेश कुमार शाक्य को 24,509 वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर खिसक गए।\n\n2022 में जीत का छक्का और 90 हजार से अधिक का ऐतिहासिक फासला\n2022 के विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव एक बार फिर समाजवादी पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़े। हालांकि उस दौरान उनकी अपनी बनाई पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) भी अस्तित्व में थी, जिसका बाद में औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी में विलय हो गया।\n\nइस चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने जसवंतनगर में अब तक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उन्हें कुल 1,59,718 मत मिले। उनके सामने भाजपा के विवेक शाक्य मैदान में थे, जिन्हें 68,739 वोट हासिल हुए। शिवपाल सिंह यादव ने यह मुकाबला 90,979 वोटों के विशाल अंतर से जीत लिया। इस तरह उन्होंने विधानसभा पहुंचने का छक्का लगाया। वहीं बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी ब्रजेंद्र प्रताप सिंह 17,515 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।\n\n2027 के संभावित चुनावी समीकरण और राजनीतिक चुनौतियां\nजसवंतनगर सीट को लेकर आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से राजनीतिक समीकरणों पर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। समाजवादी पार्टी के सामने अपने इस सबसे सुरक्षित किले को बचाए रखने और लगातार जीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इस विधानसभा क्षेत्र में अपना खाता खोलने के लिए हरसंभव रणनीति पर काम कर रही है।\n\nहालांकि पिछले चुनावों के परिणाम बताते हैं कि जीत का अंतर बेहद विशाल रहा है, जिसे पाटना किसी भी विरोधी दल के लिए बेहद कठिन काम साबित हो सकता है। 2017 और 2022 के पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा भले ही दूसरे स्थान पर रही हो, लेकिन वोटों का अंतर बहुत अधिक रहा है। इससे पहले 2002, 2007 और 2012 में बसपा यहां मुख्य मुकाबले में नजर आई थी।\n\nसामाजिक ताने-बाने की बात करें तो जसवंतनगर क्षेत्र में यादव मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति वर्ग और अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले मतदाताओं की भूमिका भी चुनावी नतीजों में महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके बावजूद दशकों के चुनावी इतिहास से यही स्पष्ट होता है कि यहां की सियासी दिशा तय करने में यादव मतदाताओं का रुख ही निर्णायक साबित होता रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nजसवंतनगर का चुनावी इतिहास यह रेखांकित करता है कि मजबूत सांगठनिक जड़ें और स्थानीय राजनीतिक रसूख किस तरह दशकों तक लोकतांत्रिक नतीजों को एकतरफा बनाए रख सकते हैं।\n\n• उत्तर प्रदेश की राजनीति में: यह विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए एक ऐसा सुरक्षित किला है जो राज्य में सत्ता परिवर्तन के बावजूद कभी नहीं हिला। यहां की स्थिरता पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती है।\n• इटावा और स्थानीय स्तर पर: स्थानीय मतदाताओं के लिए मुलायम परिवार का प्रतिनिधित्व सीधे तौर पर क्षेत्र के राजनीतिक दबदबे और विकास प्राथमिकताओं से जुड़ा रहा है। 2027 के चुनाव में मतदाताओं को तय करना होगा कि वे इसी पारिवारिक विरासत को जारी रखना चाहते हैं या किसी अन्य दल को मौका देंगे।\n• विपक्षी दलों के लिए: भाजपा और बसपा जैसे दलों के लिए यहां मुख्य चुनौती केवल प्रचार तक सीमित नहीं है, बल्कि सपा के 90 हजार से अधिक के विशाल जीत अंतर को पाटने के लिए सामाजिक गठजोड़ बनाना है। बिना मजबूत जमीनी तैयारी के विरोधी दल यहां केवल रनरअप की लड़ाई लड़ते नजर आते हैं।\n• आम मतदाताओं के नजरिए से: चुनावी रिकॉर्ड से साफ है कि स्थानीय जनता ने दलगत विवादों के बावजूद परिवार के चेहरे पर ही भरोसा जताया है। इसका अर्थ यह है कि इस सीट पर चुनाव लड़ने वाले किसी भी नए चेहरे को जनता का विश्वास जीतने के लिए लंबी सियासी मशक्कत करनी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजसवंतनगर में समाजवादी पार्टी का यह अभूतपूर्व दबदबा मजबूत सामाजिक समीकरणों, मुलायम सिंह यादव के शुरुआती दौर के प्रभाव और बाद में शिवपाल सिंह यादव के जमीनी संगठन के तालमेल से संभव हुआ है।\n\n• सामाजिक ताने-बाने की ताकत: जसवंतनगर में यादव समुदाय के मतदाताओं की तादाद काफी अधिक है, जिनका रुझान दशकों से मुलायम परिवार के पक्ष में लामबंद रहा है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े वर्गों की मौजूदगी के बीच यादव मतों की एकजुटता चुनावी जीत को आसान बनाती रही है।\n• मुलायम सिंह यादव का प्रारंभिक प्रभाव: 1967 में पहली जीत और फिर 1985 से लगातार विजय के सिलसिले ने इलाके में मुलायम सिंह यादव को एक निर्विवाद जननेता बना दिया था। 1993 में कड़े मुकाबले के बाद उनके मुख्यमंत्री बनने से इस सीट का सियासी कद और बढ़ गया।\n• शिवपाल सिंह यादव का जमीनी जुड़ाव: 1996 में कमान संभालने के बाद शिवपाल सिंह यादव ने स्थानीय स्तर पर संगठन को व्यक्तिगत संपर्कों से मजबूत किया। यही वजह रही कि 2017 में पार्टी के भीतर गंभीर मतभेद होने के बावजूद मतदाताओं ने उनके समर्थन में कमी नहीं आने दी।\n• विपक्षी बिखराव और कमजोर रणनीति: पिछले तीन दशकों में बसपा, भाजपा और कांग्रेस कभी भी यहां ऐसा साझा या प्रभावी विकल्प पेश नहीं कर सकीं जो सपा के इस किले को भेद सके। 2002 से 2012 तक बसपा मुख्य चुनौती रही, जबकि 2017 और 2022 में भाजपा दूसरे स्थान पर आई, लेकिन दोनों ही दल जीत के अंतर को घटाने में नाकाम रहे।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जसवंतनगर सीट से मुलायम सिंह यादव पहली बार कब विधायक बने थे?\nमुलायम सिंह यादव पहली बार 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जसवंतनगर से विधायक चुने गए थे।\n\n2. जसवंतनगर में सबसे करीबी मुकाबला किस साल हुआ था?\n1993 के चुनाव में सबसे करीबी मुकाबला हुआ था, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस के दर्शन सिंह यादव को मात्र 1,161 वोटों से हराया था।\n\n3. शिवपाल सिंह यादव ने पहली बार जसवंतनगर से चुनाव कब लड़ा और जीता था?\nशिवपाल सिंह यादव ने 1996 के विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव लड़कर कांग्रेस प्रत्याशी दर्शन सिंह यादव को 10,939 वोटों से हराया था।\n\n4. 2022 के विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव की जीत का अंतर कितना था?\n2022 के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के विवेक शाक्य को 90,979 वोटों के ऐतिहासिक अंतर से पराजित किया था।\n\n5. क्या 2017 में पार्टी विवाद के समय शिवपाल सिंह यादव को जीत मिली थी?\nहां, 2017 के चुनाव में सपा के अंदरूनी मतभेदों के बावजूद शिवपाल सिंह यादव ने भाजपा के मनीष यादव को 52,616 मतों से हराया था।\n\n6. जसवंतनगर विधानसभा सीट किस जिले में स्थित है?\nजसवंतनगर विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में आती है।",
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  "category": "उत्तर प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-27",
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