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  "type": "article",
  "title": "जेवर एयरपोर्ट का नाम बदलने की चर्चा से विस्थापितों में आक्रोश, नौकरी और जमीन रजिस्ट्री के अधूरे वादों पर भड़का गुस्सा",
  "summary": "नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम बदले जाने के प्रस्ताव से जेवर के विस्थापित परिवार बेहद नाराज हैं। जमीन देने के बावजूद प्लॉटों की रजिस्ट्री न होने और नौकरी के वादे पूरे न किए जाने पर ग्रामीणों ने कड़ा विरोध जताया है।",
  "content": "ग्रेटर नोएडा के जेवर में बन रहे विशाल हवाई अड्डे के नामकरण को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और विस्थापित परिवारों के बीच गहरा असंतोष पनप रहा है। जेवर स्थित पॉकेट-1 की आरआर कॉलोनी में रह रहे लोगों का स्पष्ट कहना है कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्होंने अपनी पीढ़ियों पुरानी पुश्तैनी जमीनें दी हैं। इसके बावजूद सालों बीत जाने के बाद भी उन्हें पुनर्वास कॉलोनी में बुनियादी नागरिक सुविधाओं, पक्के रोजगार और जमीनी अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे हालात में हवाई अड्डे का मूल नाम बदलकर किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर रखने की पहल ने विस्थापितों के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है। ग्रामीणों की दो टूक मांग है कि परियोजना का पुराना नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ही बरकरार रहना चाहिए।\n\nव्यक्ति विशेष के नाम पर नामकरण का विरोध\nहवाई अड्डे का नाम बदलने के फैसले पर स्थानीय निवासी सतीश कुमार ने कड़ा ऐतराज जताया है। उनका मानना है कि किसी बड़े बुनियादी ढांचे का नाम किसी राजनेता या व्यक्ति के नाम से जोड़ना किसी भी नजरिए से जायज नहीं ठहराया जा सकता। सतीश कुमार के शब्दों में, \"प्रधानमंत्री आते-जाते रहेंगे, लेकिन किसी एयरपोर्ट का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर रख देना उचित नहीं है।\" उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में समय के साथ कई प्रधानमंत्री आए और अपने कार्यकाल पूरे कर चले गए, मगर विकास परियोजनाओं के मूल स्वरूप और पहचान को बदलना एक गलत परंपरा की शुरुआत है। इसलिए इस हवाई अड्डे की पुरानी पहचान को जस का तस रखा जाना चाहिए।\n\nइसी मुद्दे पर राजेश सिंह ने भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने प्रशासनिक और राजनीतिक मंशा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर आने वाले कल में किसी दूसरे राजनीतिक दल की हुकूमत बनती है, तो क्या उस वक्त भी अपनी सुविधानुसार इस हवाई अड्डे का नाम फिर से बदल दिया जाएगा? उन्होंने याद दिलाया कि इस जमीन के असली हकदार स्थानीय किसान और ग्रामीण थे, जिन्होंने देश के विकास के लिए अपनी उपजाऊ जमीनें कुर्बान की हैं। ऐसे में उनकी भावना का सम्मान करते हुए नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ही रखा जाए। वहीं स्वराज सिंह ने भी इस विचार से सहमति जताते हुए कहा कि शुरुआत से चला आ रहा नाम ही सबसे बेहतरीन था। विकास के कार्यों की पहचान किसी एक शख्सियत के नाम पर केंद्रित करने के बजाय उसके वास्तविक और क्षेत्रीय स्वरूप में रहनी चाहिए।\n\nपुनर्वास कॉलोनियों में मालिकाना हक और रजिस्ट्री की उलझन\nपरियोजना के नाम को लेकर भड़की नाराजगी दरअसल उन तमाम दबी हुई शिकायतों का नतीजा है, जो विस्थापन के बाद से ही परिवारों को परेशान कर रही हैं। विस्थापितों ने प्रशासन की पुनर्वास नीतियों पर सीधे सवाल दागे हैं। स्वराज सिंह ने विस्तार से बताया कि विस्थापन प्रक्रिया के तहत प्रभावित परिवारों को 50-50 वर्ग मीटर के आवासीय प्लॉट आवंटित किए गए थे। उस समय यह भरोसा दिलाया गया था कि पांच साल की अवधि पूरी होने पर इन सभी प्लॉटों की पक्की रजिस्ट्री कर दी जाएगी। आरोप है कि यह तय समयसीमा बीत जाने के बाद भी आज तक किसी भी प्लॉट की रजिस्ट्री का काम पूरा नहीं किया गया है।\n\nरजिस्ट्री न होने के अलावा इन भूखंडों पर लीज व्यवस्था थोपे जाने से लोगों की निजी आजादी छिन गई है। लीज नियमों के सख्त होने के चलते यदि कोई परिवार अपना मकान बेचना चाहे या किसी हिस्से में किराएदार रखकर गुजर-बसर करना चाहे, तो उसे संबंधित अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है। स्वराज सिंह का कहना है कि इस तरह की औपचारिक पाबंदियों ने खासकर बुजुर्गों के दैनिक जीवन को बहुत तनावपूर्ण बना दिया है। खुले ग्रामीण माहौल से निकलकर इन संकरी कॉलोनियों में बसने के बाद लोगों की जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है और उन्हें पुरानी स्वतंत्रता महसूस नहीं होती। छोटी-मोटी जरूरतों और रोजमर्रा के कामकाज के लिए भी लोगों को भारी कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा है।\n\nरोजगार के टूटे वादे और गहराता आर्थिक संकट\nविस्थापित परिवारों की नाराजगी की सबसे प्रमुख वजह आजीविका का संकट है। ग्रामीणों का खुला आरोप है कि जब हवाई अड्डे के निर्माण के लिए उनकी खेती योग्य जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा था, तब प्रशासन और संबंधित पक्षों ने प्रत्येक प्रभावित गांव से कम से कम एक व्यक्ति को नियमित रोजगार मुहैया कराने का वादा किया था। जमीनी हकीकत यह है कि इतना विशाल हवाई अड्डा बनकर लगभग तैयार होने के बावजूद अधिकांश प्रभावित परिवारों के शिक्षित युवाओं को रोजगार का कोई जरिया नहीं मिल सका है।\n\nग्रामीणों को पूरी उम्मीद थी कि इस अंतरराष्ट्रीय परियोजना के जरिए उनके घरों में खुशहाली आएगी और उनके परिजनों को एयरपोर्ट परिसर में स्थायी काम मिलेगा। विस्थापितों का कहना है कि सरकारी नौकरियों की बात तो छोड़िए, वहां काम कर रही निजी कंपनियों में भी स्थानीय युवाओं को कोई खास तवज्जो या अवसर नहीं दिए जा रहे हैं। मौजूदा हालात से गहरी निराशा जताते हुए अशोक कुमार ने कहा कि वह व्यवस्था से पूरी तरह असंतुष्ट हैं। अपने पैतृक गांव और कृषि से बेदखल होने के बाद ग्रामीणों का पारंपरिक रोजगार पूरी तरह छिन गया है, जिसके चलते कई परिवार अब गंभीर आर्थिक संकट की कगार पर पहुंच गए हैं।\n\nपुश्तैनी जमीन के बदले सम्मानजनक जीवन की मांग\nस्थानीय बाशिंदों ने जमीन के बदले दिए गए मुआवजे और उसकी मूल्यांकन प्रक्रिया पर भी अपना दर्द बयां किया है। ग्रामीणों का कहना है कि पुश्तैनी जमीन केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसके साथ उनकी पीढ़ियों का भावनात्मक जुड़ाव और दैनिक आजीविका का अटूट सहारा जुड़ा हुआ था। विस्थापन के बाद मिली नई बस्ती में जीवन जीने के लिए जरूरी मूलभूत ढांचे का भारी अभाव है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि अरबों रुपये की इस चमक-दमक भरी परियोजना के बीच उन विस्थापितों की आवाज पूरी तरह अनसुनी कर दी गई है, जिनकी कुर्बानियों पर यह ढांचा खड़ा हुआ है।\n\nजेवर के विस्थापित परिवारों ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांगें पूरी तरह स्पष्ट हैं। सबसे पहले तो हवाई अड्डे का नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ही बनाए रखा जाए। इसके साथ ही विस्थापितों की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, 50-50 वर्ग मीटर के प्लॉटों की रजिस्ट्री प्रक्रिया को तुरंत पारदर्शी तरीके से शुरू किया जाए और अधिग्रहण के दौरान किए गए रोजगार के वादों को बिना देरी पूरा किया जाए। ग्रामीणों का साफ कहना है कि नाम का सम्मान तो उनके लिए अहम है ही, लेकिन जमीन देने के एवज में सम्मानजनक आजीविका और मूलभूत नागरिक सुविधाएं हासिल करना उनका बुनियादी अधिकार है।\n\nइसका आप पर असर\nजेवर एयरपोर्ट के नामकरण और विस्थापन विवाद से प्रभावित किसानों के कानूनी अधिकारों और स्थानीय रोजगार की स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है।\n\n• भारत में: बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के दौरान पुनर्वास और रोजगार के वादों की विफलता राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत बहस छेड़ सकती है। परियोजना प्रभावित लोगों के अधिकारों को लेकर अन्य राज्यों में भी कानूनी और सामाजिक मांगें तेज हो सकती हैं।\n• ग्रेटर नोएडा में: जेवर की आरआर कॉलोनी में रह रहे विस्थापित परिवारों को 50-50 वर्ग मीटर के आवासीय प्लॉटों की रजिस्ट्री न होने से संपत्ति का पक्का मालिकाना हक नहीं मिल पा रहा है। रोजगार के वादे पूरे न होने के कारण स्थानीय ग्रामीण परिवारों को गंभीर आर्थिक तंगी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।\n• संपत्ति के नियमों पर असर: लीज व्यवस्था लागू होने से मकान बेचने या किराए पर देने के लिए सरकारी अनुमति की अनिवार्यता बनी हुई है। इससे मकान मालिकों के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीमित हो गए हैं।\n• बुजुर्गों के जीवन पर प्रभाव: खुली ग्रामीण जीवनशैली के छिनने और पाबंदियों के कारण पुनर्वास कॉलोनी में रह रहे बुजुर्गों की दिनचर्या और स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों और आवागमन के लिए अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ रहा है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nजेवर में विस्थापित परिवारों का विरोध नाम बदलने के प्रस्ताव और जमीन अधिग्रहण के समय किए गए वादों के अधूरे रहने के कारण भड़का है।\n\n• सीधा कारण: हवाई अड्डे का मूल नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट बदलकर किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर रखने की पहल ने ग्रामीणों की पुरानी शिकायतों को फिर से भड़का दिया है। ग्रामीणों का तर्क है कि विकास कार्यों को किसी राजनीतिक हस्ती के नाम से जोड़ना अनुचित है।\n• भूमि रजिस्ट्री में विफलता: विस्थापन के बाद आवंटित 50-50 वर्ग मीटर के भूखंडों की रजिस्ट्री पांच साल बीत जाने के बाद भी नहीं की गई है। प्लॉटों पर लीज नियमों की पाबंदियों ने निवासियों के संपत्ति अधिकारों को सीमित कर दिया है।\n• रोजगार के वादों की अनदेखी: जमीन अधिग्रहण के समय प्रभावित गांवों के प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था, जो एयरपोर्ट तैयार होने के बावजूद पूरा नहीं हुआ। आजीविका छिनने से कई परिवारों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।\n• बुनियादी सुविधाओं की कमी: पैतृक कृषि भूमि खोने के बाद आरआर कॉलोनी में स्थानांतरित किए गए ग्रामीणों को पर्याप्त नागरिक सुविधाएं और सम्मानजनक माहौल नहीं मिल पाया है। इससे विस्थापितों में उपेक्षा और असंतोष की भावना गहरी हो गई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जेवर के विस्थापित परिवार हवाई अड्डे के नाम को लेकर क्या मांग कर रहे हैं?\nस्थानीय ग्रामीणों की मांग है कि हवाई अड्डे का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर रखने के बजाय उसका पुराना नाम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ही बरकरार रखा जाए।\n\n2. विस्थापित परिवारों को पुनर्वास के तहत कितने बड़े प्लॉट दिए गए थे?\nपुनर्वास व्यवस्था के तहत प्रभावित परिवारों को 50-50 वर्ग मीटर के आवासीय प्लॉट आवंटित किए गए थे।\n\n3. प्लॉटों की रजिस्ट्री को लेकर ग्रामीणों का क्या आरोप है?\nग्रामीणों का आरोप है कि आवंटन के समय पांच साल बाद रजिस्ट्री करने का भरोसा दिया गया था, लेकिन वह समय बीत जाने के बाद भी रजिस्ट्री नहीं हुई है।\n\n4. प्लॉटों पर लागू लीज व्यवस्था से लोगों को क्या परेशानी हो रही है?\nलीज नियमों के कारण विस्थापितों को अपना मकान बेचने या किराएदार रखने के लिए भी संबंधित अधिकारियों से अनुमति लेनी पड़ती है।\n\n5. जमीन अधिग्रहण के समय रोजगार को लेकर क्या आश्वासन दिया गया था?\nग्रामीणों के अनुसार, जमीन अधिग्रहण के समय प्रत्येक प्रभावित गांव से एक व्यक्ति को नौकरी उपलब्ध कराने की बात कही गई थी।\n\n6. क्या विस्थापित युवाओं को एयरपोर्ट परियोजना में नौकरियां मिल सकी हैं?\nस्थानीय लोगों का कहना है कि एयरपोर्ट बनने के बावजूद परिवारों को सरकारी नौकरी तो दूर, निजी कंपनियों में भी पर्याप्त रोजगार अवसर नहीं मिले हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/uttar-pradesh/jewar-airport-ka-nama-badalane-ki-charcha-se-visthapiton-men-akrosha-naukari-aura-jamina-rajistri-ke-adhure-vadon-para-bharaka-gus-46221",
  "category": "उत्तर प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-10-11",
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