लावारिस शवों को गरिमापूर्ण विदाई दे रहे राहुल झाम, 500 से ज्यादा बेसहारा लोगों का किया अंतिम संस्कार सहारनपुर के राहुल झाम और उनके साथी 2019 से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर कनखल में उनकी अस्थियों का विसर्जन कर रहे हैं। अपनी जेब से खर्च उठाकर यह टीम अब तक 500 से अधिक बेसहारा लोगों को सम्मानजनक विदाई दे चुकी है। सहारनपुर के नुमाइश कैंप क्षेत्र में रहने वाले राहुल झाम और उनके साथियों की एक छोटी सी टीम समाज के लिए एक ऐसी मिसाल कायम कर रही है जो इंसानियत की गहरी भावना को दर्शाती है। शहर में अक्सर सड़कों के किनारे, अस्पतालों या गुमनाम ठिकानों पर दम तोड़ने वाले लावारिस लोगों का जब कोई अपना अंतिम संस्कार करने वाला नहीं होता, तब यह टीम उनके परिवार की तरह आगे आती है। वर्ष 2019 से शुरू हुआ यह निस्वार्थ सिलसिला लगातार जारी है और अब तक यह टीम 500 से अधिक लावारिस शवों का सम्मानजनक रीति से दाह संस्कार और उनकी अस्थियों का विसर्जन कर चुकी है। 2019 से जारी निस्वार्थ सेवा की अनूठी मिसाल सहारनपुर शहर के विभिन्न श्मशान घाटों पर महीनों से लावारिस पड़ी रहने वाली अस्थियों को एक सम्मानजनक विदाई देना आसान काम नहीं है। राहुल झाम की अगुवाई में काम कर रहे इन युवाओं ने देखा कि कई ऐसे बदनसीब लोग होते हैं जो जीवन भर अकेलेपन का शिकार रहते हैं और मृत्यु के बाद भी उनका कोई वारिस नहीं होता। इस स्थिति को बदलने की सोच के साथ वर्ष 2019 में इस सेवा अभियान की शुरुआत की गई थी। इस पहल के तहत टीम के सदस्य सहारनपुर के अलग-अलग श्मशान घाटों पर जाते हैं और वहां एकत्रित लावारिस अस्थियों को सम्मानपूर्वक इकट्ठा करते हैं। इसके बाद पूरी विधि-विधान और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए इन अस्थियों को हरिद्वार के पवित्र कनखल में विसर्जित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले धन के लिए किसी बाहरी व्यक्ति या संस्था से कोई वित्तीय मदद या चंदा नहीं लिया जाता। टीम के सभी सदस्य आपस में ही पैसे इकट्ठा करते हैं और आपस में खर्च बांटकर इस सामाजिक जिम्मेदारी को पूरा करते हैं। कोरोना महामारी के भयानक दौर में भी बने सहारा वर्ष 2020 और 2021 में आए कोरोना काल के दौरान जब स्थितियां बेहद डरावनी थीं, तब भी इस टीम का हौसला नहीं टूटा। वह ऐसा कठिन समय था जब लोग संक्रमण के डर से अपने करीबियों के पार्थिव शरीर को छूने से भी कतरा रहे थे। ऐसे संकट के समय में भी राहुल झाम और उनकी टीम के सदस्यों ने दिन-रात श्मशान घाटों पर डटकर काम किया। वे लगातार उन लोगों का दाह संस्कार करते रहे जिनका कोई अपना नहीं था या जिनके स्वजनों ने डर के मारे दूरी बना ली थी। महामारी के चरम पर होने के बावजूद और चौबीसों घंटे संक्रमित वातावरण के बीच काम करने के बाद भी इस टीम का कोई भी सदस्य कोरोना बीमारी की चपेट में नहीं आया। इस अद्भुत अनुभव को टीम के सदस्य एक दैवीय कृपा और अपनी सच्ची निष्ठा का फल मानते हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उनका सेवा कार्य बिना रुके चलता रहा। आत्मिक शांति और मानवता की सेवा का संकल्प राहुल झाम बताते हैं कि लावारिस पड़ी अस्थियों को देखकर मन में एक गहरा दर्द होता था कि जो लोग जीवन में उपेक्षित रहे, क्या उन्हें मृत्यु के बाद भी शांति नहीं मिलनी चाहिए। इसी भावना ने उन्हें इस कार्य के लिए प्रेरित किया। जब वे किसी अनजाने व्यक्ति की अस्थियों को विधि-विधान से कनखल में विसर्जित करते हैं, तो उन्हें मन में एक असीम सुकून और आत्मिक शांति का अहसास होता है। इस सेवा कार्य का मुख्य उद्देश्य यही है कि हर इंसान को मृत्यु के बाद गरिमापूर्ण विदाई मिले। श्मशान घाटों के चक्कर लगाने से लेकर विसर्जन की यात्रा तक, यह पूरी प्रक्रिया निस्वार्थ भावना से पूरी की जाती है। अब तक 500 से अधिक लावारिस आत्माओं को सद्गति दिला चुकी यह टीम आज सहारनपुर में मानवता की एक अनूठी पहचान बन चुकी है। इसका आप पर असर भारत भर में: यह पहल समाज में निःस्वार्थ सामाजिक सेवा और हर नागरिक को मृत्यु के बाद गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार मिलने के महत्व को रेखांकित करती है। सहारनपुर में: लावारिस मौतों के मामलों में बेसहारा पार्थिव शरीरों को सम्मानपूर्वक विदाई देने के लिए स्थानीय स्तर पर एक मजबूत सहायता व्यवस्था मिलती है। सवाल-जवाब 1. सहारनपुर में राहुल झाम और उनकी टीम क्या कार्य कर रही है? राहुल झाम और उनकी टीम 2019 से सहारनपुर में लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने और उनकी अस्थियों को कनखल में विसर्जित करने का कार्य कर रही है। 2. अब तक कितने लावारिस लोगों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है? टीम अब तक 500 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार और उनकी अस्थि विसर्जन का कार्य पूरा कर चुकी है। 3. इस सेवा कार्य का खर्च किस प्रकार उठाया जाता है? इस कार्य के लिए कोई बाहरी चंदा नहीं लिया जाता, बल्कि टीम के सदस्य आपस में ही पैसे इकट्ठा करके सभी खर्च उठाते हैं। 4. कोरोना काल के दौरान टीम ने किस प्रकार काम किया? कोरोना महामारी के दौरान भी टीम ने दिन-रात लावारिस और कोरोना से मृत लोगों का दाह संस्कार किया, और इस दौरान टीम का कोई भी सदस्य संक्रमित नहीं हुआ। प्रेरणा और सबक सहानुभूति और सामाजिक कर्तव्य: समाज के उपेक्षित वर्गों के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखना और उनके अधिकारों के लिए आगे आना। • आत्मनिर्भरता से सेवा: बाहरी मदद या चंदे का इंतजार किए बिना खुद संसाधन जुटाकर बड़ा सामाजिक बदलाव लाना। • कठिन समय में साहस: महामारी जैसी खतरनाक स्थितियों में भी अपने सेवा संकल्प से पीछे न हटना। • गरिमा का सम्मान: हर इंसान को जीवन के अंतिम पड़ाव पर सम्मान और शांति पाने का अधिकार देना। https://trendkia.com/uttar-pradesh/lavarisa-shavon-ko-garimapurna-vidai-de-rahe-rahul-jham-500-se-jyada-besahara-logon-ka-kiya-antima-snskara-20222 TrendKia — Har trend, sabse pehle.