# उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में नर्सों का फूटा गुस्सा, मथुरा में दो घंटे के कार्य बहिष्कार के साथ आंदोलन शुरू

> राजकीय नर्सेज संघ ने अपनी 13 सूत्रीय मांगों के समर्थन में आंदोलन तेज करते हुए मथुरा के महिला जिला अस्पताल सहित प्रदेश भर में प्रतिदिन दो घंटे का कार्य बहिष्कार शुरू कर दिया है।

**Type:** article · **Category:** उत्तर प्रदेश · **Published:** 2026-10-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttar-pradesh/mathura-me-13-sutriya-maango-ko-lekar-rajkiya-nurses-sangh-ka-kary-bahishkar-49980 · **Language:** Hindi
**Tags:** राजकीय नर्सेज संघ, मथुरा अस्पताल, नर्सिंग हड़ताल, कार्य बहिष्कार, बृजेश पाठक, उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य विभाग, सुनील श्रीवास्तव, महिला जिला अस्पताल

उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संविदा कर्मियों के विरोध प्रदर्शन के बाद अब नियमित स्वास्थ्य ढांचे के मुख्य आधार यानी राजकीय नर्सेज संघ ने भी आंदोलन का रास्ता अपना लिया है। राज्य भर में अपनी तेरह सूत्रीय बुनियादी मांगों को लेकर नर्सेज संवर्ग ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मथुरा स्थित महिला जिला अस्पताल में दर्जनों की संख्या में एकत्रित हुए स्वास्थ्य कर्मियों और यूनियन के पदाधिकारियों ने व्यवस्था पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए दैनिक कार्य बहिष्कार का फैसला लागू कर दिया है। अस्पताल परिसरों में स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका सीधा असर दिखने लगा है, जिससे इलाज के लिए आने वाले मरीजों की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

## काली पट्टी बांधने के बाद दैनिक कार्य बहिष्कार का ऐलान
नर्सिंग संवर्ग की यह नाराजगी अचानक सामने नहीं आई है, बल्कि यह एक चरणबद्ध आंदोलन की अगली कड़ी है। राजकीय नर्सेज संघ के आह्वान पर कर्मचारी 9 अक्टूबर से अपनी बांहों पर काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी ड्यूटी निभा रहे थे और सांकेतिक विरोध दर्ज करा रहे थे। लंबे समय तक इस मूक विरोध के बावजूद शासन स्तर से किसी भी ठोस वार्ता या लिखित आश्वासन की पहल नहीं की गई। इसी अनदेखी से आक्रोशित होकर संघ ने आंदोलन को कड़ा रूप देने का निर्णय लिया। इसके तहत 21 अक्टूबर से प्रतिदिन सुबह 8 बजे से 10 बजे तक दो घंटे का पूर्ण कार्य बहिष्कार शुरू किया गया है। राजकीय नर्सेज संघ मथुरा शाखा के अध्यक्ष सुनील श्रीवास्तव का कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते उनकी जायज मांगों पर अमल नहीं किया, तो यह दो घंटे का सांकेतिक कार्य बहिष्कार बहुत जल्द एक उग्र और अनिश्चितकालीन आंदोलन में तब्दील हो जाएगा।

## गृह जनपद में तैनाती और प्रमुख संस्थानों के समान भत्तों की मांग
राजकीय नर्सेज संघ की तेरह सूत्रीय मांगों में कर्मचारियों के व्यक्तिगत जीवन, सेवा सुरक्षा और आर्थिक समानता से जुड़े कई अहम मुद्दे शामिल हैं। कर्मचारियों की पहली और सबसे प्रमुख मांग यह है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अधीन सेवाएं दे रहे नर्सिंग संवर्ग को भी विभाग के अन्य संवर्गों तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग की व्यवस्था के अनुरूप उनके गृह जनपद में स्थानांतरित व तैनात किया जाए। वर्तमान व्यवस्था के कारण दूर-दराज के जिलों में तैनात कर्मचारियों को भारी पारिवारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इसके साथ ही, कर्मचारियों का कहना है कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के नर्सिंग संवर्ग को संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) लखनऊ, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) लखनऊ, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) लखनऊ और उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई, इटावा के नर्सिंग स्टाफ की तरह समस्त समान भत्ते प्रदान किए जाएं। एक ही प्रकृति का जटिल कार्य करने के बावजूद भत्तों में असमानता को कर्मचारियों ने पूरी तरह से गैर-वाजिब बताया है।

## प्रशासनिक प्रतिनिधित्व, पदोन्नति और संवर्ग का पुनर्गठन
उत्तर प्रदेश नर्सेज एंड मिडवाइव्स काउंसिल लखनऊ में लंबे समय से प्रशासनिक पदों पर गैर-नर्सिंग संवर्ग के अधिकारियों की तैनाती को लेकर भी गहरा असंतोष है। संघ की मांग है कि अन्य राज्यों में लागू नियमों की तरह उत्तर प्रदेश में भी काउंसिल के रजिस्ट्रार पद पर नर्सिंग संवर्ग के ही योग्य प्रतिनिधि की नियुक्ति की जाए। इसके अतिरिक्त, महानिदेशालय और अस्पताल स्तर पर वर्ष 2010 से पहले से खाली पड़े उच्च पदों को बिना किसी देरी के पदोन्नति के जरिए तत्काल भरा जाए।

संघ ने यह भी रेखांकित किया है कि भारत सरकार द्वारा तय किए गए मानकों के आधार पर समूचे उत्तर प्रदेश में नर्सिंग संवर्ग के पदों का तत्काल पुनर्गठन किया जाना बेहद आवश्यक हो चुका है। विभिन्न जिला व मंडल स्तरीय चिकित्सालयों और मुख्यालय स्तर पर स्वीकृत रिक्त पदों पर पारदर्शी और स्थायी नियुक्तियां की जाएं। पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को पुनः बहाल करने और स्वास्थ्य क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहे निजीकरण की प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने की मांग भी इस चार्टर का अभिन्न हिस्सा है। वहीं, शासन द्वारा तय समय-सीमा के भीतर एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (एसीपी) और अन्य नियत लाभों का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने की बात दोहराई गई है।

## राज्य स्तरीय सम्मान, क्रेश की स्थापना और उच्च शिक्षा की अनुमति
नर्सिंग कर्मियों के आत्मसम्मान और कार्यस्थल की सुविधाओं को लेकर भी चार्टर में महत्वपूर्ण प्रावधान रखे गए हैं। संघ का प्रस्ताव है कि पुलिस और बेसिक व माध्यमिक शिक्षकों की तर्ज पर नर्सिंग संवर्ग को भी राजकीय पुरस्कारों की श्रेणी में शामिल किया जाए। इसके अलावा, जिन नर्सों को महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है, उनके मनोबल को बढ़ाने के लिए उन्हें 2 वर्ष का अनिवार्य सेवा विस्तार दिया जाना चाहिए।

कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों के बच्चों की देखभाल हेतु पालनाघर (क्रेश) की व्यवस्था अब तक लागू न होने पर भारी रोष व्यक्त किया गया। प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की अध्यक्षता में 22 फरवरी 2019 को आयोजित बैठक की कार्यवृत्ति के बिंदु संख्या 10 में सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों और चिकित्सा अधीक्षकों को क्रेश स्थापित करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। संघ का कहना है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी इस आदेश पर अमल नहीं हुआ, इसलिए सभी क्षेत्रीय अधिकारियों को इसे तुरंत लागू करने के कड़े निर्देश जारी किए जाएं। इसके साथ ही 20 मई 2010 के शासनादेश में नर्सिंग कर्मियों को दो वर्षीय पोस्ट बेसिक बीएससी नर्सिंग प्रशिक्षण की जो सुविधा मिली थी, उसी के अनुरूप एमएससी नर्सिंग प्रशिक्षण हेतु भी सवेतन अनुमति का प्रावधान किया जाए।

## संविदा कर्मियों का स्थायीकरण और मेडिकल कॉलेजों से संबद्धता का विवाद
मांग पत्र में लंबे समय से रीढ़ की हड्डी बनकर सेवाएं दे रहे संविदा और आउटसोर्सिंग कर्मियों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। संघ की मांग है कि रिक्त नियमित पदों के सापेक्ष संविदा व आउटसोर्सिंग नर्सेज को उनकी वरिष्ठता और कार्य अनुभव के आधार पर स्थायी व नियमित करने की पारदर्शी नीति बनाई जाए।

अंतिम बिंदु में जिला चिकित्सालयों के मेडिकल कॉलेजों में विलय से उपजे प्रशासनिक संकट को उठाया गया है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधीन संचालित जिन जिला अस्पतालों को चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधीन स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालयों से संबद्ध कर दिया गया है, उनमें कार्यरत नर्सेज को उनके पदों सहित मूल विभाग में कार्यमुक्त किया जाए। यदि ऐसा संभव न हो, तो प्रयागराज, गोरखपुर, लखनऊ, कानपुर, आगरा, झांसी और मेरठ के पुराने मेडिकल कॉलेजों की तर्ज पर उन्हें वहां यथावत कार्य करने हेतु अलग से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। संघ के पदाधिकारियों ने याद दिलाया कि 8 नवंबर 2025 को वार्षिक अधिवेशन के मंच से उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने इन मांगों के समाधान का भरोसा दिलाया था। इसके बाद महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं द्वारा 19 नवंबर 2025 को शासन के चिकित्सा अनुभाग-8 को पत्र भेजा जा चुका है, जो वर्तमान में शासन स्तर पर लंबित है।

## इसका आप पर असर
मथुरा और उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में आने वाले सामान्य मरीजों के लिए दैनिक जांच, ओपीडी और वार्ड सेवाओं पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

- **भारत में:** उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में हड़ताल से अन्य राज्यों के संदर्भ में भी स्वास्थ्यकर्मियों की सेवा शर्तों और रिक्तियों पर बहस तेज होगी। राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य मानकों और कार्यस्थल सुरक्षा को लेकर नीतिगत चर्चाओं पर इसका असर पड़ेगा।
- **उत्तर प्रदेश में:** जिला और महिला अस्पतालों में सुबह 8 बजे से 10 बजे के बीच नियमित उपचार और जांच प्रक्रिया प्रभावित रहेगी। मरीज और उनके तीमारदार आपातकालीन सेवाओं के अलावा सामान्य ओपीडी परामर्श के लिए सुबह 10 बजे के बाद ही अस्पतालों का रुख करें।
- **संविदा व आउटसोर्सिंग कर्मियों पर:** लंबे समय से कार्यरत संविदा नर्सों के लिए स्थायीकरण की मांग जोर पकड़ रही है। यदि शासन स्तर पर सहमति बनती है तो हजारों अस्थायी स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित होने का रास्ता साफ हो सकता है।
- **मातृत्व व बाल स्वास्थ्य सेवाओं पर:** अस्पतालों में कार्यरत महिला स्वास्थ्यकर्मियों के लिए क्रेश (पालनाघर) की मांग उठने से कार्यस्थल पर बच्चों की सुरक्षा और देखभाल का वातावरण सुधरेगा। इससे ड्यूटी के दौरान महिला कर्मचारियों की कार्यकुशलता और संतुष्टि में सुधार होगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह आंदोलन लंबे समय से लंबित सेवा संबंधी मांगों और पूर्व में हुए समझौतों व आश्वासनों पर प्रशासनिक स्तर से ठोस क्रियान्वयन न होने के कारण शुरू हुआ है।

- **सीधा कारण:** 9 अक्टूबर से काली पट्टी बांधकर चल रहे शांतिपूर्ण विरोध पर सरकार की ओर से कोई संवाद न होने के बाद संघ ने 21 अक्टूबर से दो घंटे का दैनिक कार्य बहिष्कार शुरू किया। कर्मचारियों का कहना है कि उनकी 13 सूत्रीय मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था।
- **पृष्ठभूमि व ऐतिहासिक संदर्भ:** स्वास्थ्य विभाग के नर्सेज संवर्ग को एसजीपीजीआई और केजीएमयू जैसे स्वायत्त संस्थानों के समान भत्ते न मिलना, 2010 से रुकी पदोन्नतियां और 2019 में स्वीकृत क्रेश आदेश का लागू न होना मुख्य कारण रहे हैं। इसके अलावा जिला अस्पतालों के मेडिकल कॉलेजों में विलय से नर्सेज की सेवा शर्तों में प्रशासनिक असमंजस उत्पन्न हुआ।
- **शासन स्तर पर स्थिति:** 8 नवंबर 2025 को वार्षिक अधिवेशन में उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के आश्वासन के बाद महानिदेशक स्तर से 19 नवंबर 2025 को पत्र भेजा गया था, लेकिन शासन के चिकित्सा अनुभाग-8 में फाइल लंबित रहने से कर्मचारियों का धैर्य टूट गया।

## सवाल-जवाब

### 1. राजकीय नर्सेज संघ किस अस्पताल में कार्य बहिष्कार कर रहा है?
मथुरा के महिला जिला अस्पताल सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में नर्सेज संघ कार्य बहिष्कार कर रहा है।

### 2. कार्य बहिष्कार का समय क्या तय किया गया है?
कर्मचारी प्रतिदिन सुबह 8:00 बजे से लेकर सुबह 10:00 बजे तक दो घंटे के लिए कार्य बहिष्कार पर रहते हैं।

### 3. यह आंदोलन कब से शुरू हुआ था?
नर्सेज संघ के कर्मी 9 अक्टूबर से काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे थे और 21 अक्टूबर से उन्होंने कार्य बहिष्कार शुरू किया।

### 4. राजकीय नर्सेज संघ की प्रमुख मांगें क्या हैं?
गृह जनपद में तैनाती, एसजीपीजीआई और केजीएमयू के समान भत्ते, रिक्त पदों पर पदोन्नति, पुरानी पेंशन बहाली और संविदा कर्मियों का स्थायीकरण प्रमुख मांगें हैं।

### 5. क्रेश (पालनाघर) की व्यवस्था को लेकर क्या आदेश था?
22 फरवरी 2019 की बैठक के बिंदु 10 के अनुसार सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को अस्पतालों में क्रेश की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे, जो अभी तक लागू नहीं हुए हैं।

### 6. क्या सरकार की ओर से कोई आश्वासन मिला था?
8 नवंबर 2025 के अधिवेशन में उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया था, जिसका प्रस्ताव शासन स्तर पर प्रक्रियाधीन है।

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