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  "type": "article",
  "title": "मेरठ नीला ड्रम मर्डर केस में फैसला सुनाने वाले जज अरविंद कुमार मिश्रा का न्यायिक सफर",
  "summary": "सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराने वाले जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा के कानूनी सफर और करियर की पूरी पड़ताल।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के मेरठ में बहुचर्चित सौरभ राजपूत ‘नीला ड्रम’ हत्याकांड कानूनी प्रक्रिया के सबसे निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गया है। इस सनसनीखेज मामले में अदालत ने मृतक की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को हत्या का दोषी करार दिया है। लगभग 13 महीने चली लंबी ट्रायल प्रक्रिया, 126 पेशियों और 22 से अधिक गवाहों के बयानों की गहन पड़ताल के बाद मेरठ की जिला अदालत ने यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। 30 सितंबर 2026 यानी बुधवार को दोनों आरोपियों को दोषी ठहराने का यह फैसला जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत से सामने आया। पूरे प्रदेश में चर्चित इस फैसले के बाद हर किसी की नजर उस न्यायिक पीठ और उसके पीठासीन अधिकारी पर टिक गई है, जिन्होंने इस पेचीदा मुकदमे का निपटारा किया।\n\nशुरुआती जीवन और उच्च शिक्षा की पृष्ठभूमि\nइलाहाबाद हाईकोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज विवरण के अनुसार, न्यायिक अधिकारी अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय का जन्म 2 जुलाई 1971 को हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय बीपी मिश्रा दर्ज है। उनका पैतृक और गृह जिला उत्तर प्रदेश का मऊ है। कानून की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने अपनी बुनियादी और उच्च शिक्षा पूरी की। शिक्षा के शुरुआती दौर में उन्होंने वर्ष 1990 में सेकंड डिवीजन के साथ स्नातक यानी बीए की उपाधि प्राप्त की।\n\nइसके बाद उन्होंने कानूनी शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया और वर्ष 1994 में प्रथम श्रेणी (फर्स्ट डिवीजन) में एलएलबी की परीक्षा पास की। वकालत और न्यायिक सेवा की गहरी समझ विकसित करने के उद्देश्य से उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और वर्ष 1996 में सेकंड डिवीजन के साथ परास्नातक स्तर पर एलएलएम की डिग्री पूरी की। अकादमिक रूप से मजबूत आधार तैयार करने के उपरांत उन्होंने न्यायिक सेवा का रुख किया।\n\nन्यायिक सेवा का सफर और शुरुआती तैनाती\nउच्च कानूनी शिक्षा हासिल करने के बाद अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय औपचारिक रूप से प्रांतीय न्यायिक सेवा का हिस्सा बने। उनकी आधिकारिक नियुक्ति 31 मई 2003 को अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर हुई थी। न्यायिक जीवन की शुरुआत में उनकी पहली तैनाती गाजीपुर जिले में की गई। गाजीपुर में अपने दायित्वों का निर्वहन करने के बाद उन्हें उसी जिले के सैदपुर में जिम्मेदारी सौंपी गई।\n\nइसके बाद उनका स्थानांतरण मुसाफिरखाना, सुल्तानपुर हुआ, जहां उन्होंने सिविल जज और न्यायिक पदों पर कार्य किया। प्रशासनिक और न्यायिक पदभारों के क्रम में वे अलीगढ़ पहुंचे। अलीगढ़ में अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न अहम जिम्मेदारियां संभालीं। वहां वे अपर सिविल जज, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सिविल जज सीनियर डिवीजन और रेलवे एसीजेएम के पदों पर आसीन रहे। इन जिम्मेदारियों ने उन्हें फौजदारी, दीवानी और विशेष न्यायिक प्रक्रियाओं का व्यापक अनुभव दिया।\n\nमजिस्ट्रेट से जिला न्यायपालिका के वरिष्ठ पदों तक\nवर्ष 2011 में न्यायिक करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब वे गोरखपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी सीजेएम नियुक्त किए गए। सीजेएम के रूप में उन्होंने जिले के आपराधिक मुकदमों के निस्तारण और पुलिस अन्वेषण की निगरानी का कार्य संभाला। इसके दो वर्ष बाद, वर्ष 2013 में उन्हें पदोन्नति मिली और वे अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, गोरखपुर बने।\n\nगोरखपुर के बाद उनका स्थानांतरण कानपुर नगर हुआ। कानपुर नगर में उन्होंने न केवल अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में गंभीर आपराधिक मुकदमों की सुनवाई की, बल्कि बाद में उन्हें वहां अपर प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। यहां उन्होंने पारिवारिक विवादों और वैवाहिक मामलों का निपटारा किया।\n\nशासन में प्रतिनियुक्ति और ट्रिब्यूनल के दायित्व\nअदालती कार्यप्रणाली के साथ-साथ अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय ने उत्तर प्रदेश सरकार में नीतिगत और कानूनी सलाहकारी दायित्व भी निभाए हैं। वर्ष 2018 से 2020 के मध्य वे राज्य की राजधानी लखनऊ में विशेष सचिव एवं अपर विधि परामर्शदाता (लेजिस्लेटिव) के पद पर तैनात रहे। इलाहाबाद हाईकोर्ट की प्रोफाइल में उनके इस कार्यकाल को आधिकारिक रूप से प्रतिनियुक्ति के रूप में दर्ज किया गया है। विधायी मामलों के इस दौर में उन्होंने शासकीय ड्राफ्टिंग और विधिक परामर्श के काम को समझा।\n\nशासन से प्रतिनियुक्ति समाप्त होने के बाद वे पुनः पारिवारिक अदालतों के प्रमुख पद पर पहुंचे। उन्हें बस्ती जिले में प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्होंने कानपुर नगर में प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट के पद की जिम्मेदारी संभाली। न्यायिक और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर वर्ष 2023 में उन्हें एक अन्य प्रतिनियुक्ति मिली, जब उन्हें लखनऊ स्थित स्टेट ट्रांसपोर्ट अपीलेट ट्रिब्यूनल का चेयरमैन बनाया गया। ट्रिब्यूनल के चेयरमैन के रूप में उन्होंने परिवहन और मोटर वाहन कानून से जुड़े अपीलीय मामलों की सुनवाई की।\n\nजिला जज के रूप में मिर्जापुर से मेरठ तक की यात्रा\nट्रिब्यूनल की जिम्मेदारी के उपरांत वे जिला न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर पदस्थापित हुए। उच्च न्यायालय के आधिकारिक सेवा विवरण के मुताबिक, 14 नवंबर 2024 से 19 मई 2026 तक उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मिर्जापुर के पद पर सेवा दी। मिर्जापुर में न्यायिक प्रशासन का सफल नेतृत्व करने के तुरंत बाद 21 मई 2026 से वे जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मेरठ के पद पर कार्यरत हैं। इसी अदालत के पीठासीन अधिकारी के रूप में उनके समक्ष सौरभ राजपूत की नृशंस हत्या का मुकदमा सुनवाई के लिए आया।\n\nसौरभ राजपूत मर्डर केस में ऐतिहासिक फैसला\nमेरठ के सौरभ राजपूत हत्याकांड ने पूरे राज्य का ध्यान खींचा था। इस मामले की संपूर्ण सुनवाई मेरठ के जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत में पूरी हुई। अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से लंबी दलीलें पेश की गईं। अभियोजन ने 22 से अधिक गवाहों के बयान और वैज्ञानिक साक्ष्य पेश किए, जबकि कुल 126 पेशियों में केस के हर पहलू को परखा गया। दोनों पक्षों की अंतिम बहस समाप्त होने के बाद अदालत ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सौरभ की हत्या का दोषी ठहराया।\n\nदोषसिद्धि के इस फैसले के बाद अब सबकी निगाहें सजा की मात्रा पर टिकी हैं। अदालत ने सजा के बिंदु पर फैसला सुनाने के लिए 14 अक्टूबर की तारीख मुकर्रर की है। आगामी 14 अक्टूबर को अभियोजन पक्ष दोनों दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग रख सकता है, जबकि बचाव पक्ष अपनी ओर से कम से कम सजा की गुहार लगाएगा। दोनों पक्षों की कानूनी बहस सुनने के बाद जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा तय करेंगे कि इस जघन्य हत्याकांड के लिए दोषियों को क्या दंड दिया जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह अदालती घटनाक्रम गंभीर आपराधिक मुकदमों की सुनवाई की गति और न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है।\n\n• भारत में: देश भर के नागरिकों के लिए यह निर्णय दर्शाता है कि गंभीर और जटिल आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों व गवाहियों की त्वरित जांच संभव है। इससे न्याय प्रणाली में आम जनता का भरोसा मजबूत होता है कि नृशंस अपराधों में कानूनी प्रक्रिया तेजी से मुकाम तक पहुंचती है।\n• मेरठ में: स्थानीय निवासियों और वादियों के लिए यह फैसला दिखाता है कि जिला न्यायालय संवेदनशील मामलों की सुनवाई में नियमित प्रक्रिया का पालन कर रहा है। आगामी 14 अक्टूबर को सजा का ऐलान होने पर क्षेत्र में कानून व्यवस्था और अदालती नजीर को लेकर स्पष्टता आएगी।\n• अपराध पीड़ितों के लिए: आपराधिक मुकदमों से जूझ रहे परिवारों के लिए यह समयबद्ध ट्रायल एक नजीर प्रस्तुत करता है। लगभग 13 महीनों में 126 पेशियों के माध्यम से दोषसिद्धि तक पहुंचना यह संकेत देता है कि ठोस पैरवी से जल्द न्याय मिल सकता है।\n• न्यायिक निगरानी: अदालतों में चल रहे मामलों के संदर्भ में यह आदेश रेखांकित करता है कि गवाहों के बयानों और साक्ष्यों की समयबद्ध पड़ताल से मामलों का निस्तारण गति पकड़ सकता है। इससे अन्य लंबित सत्र परीक्षणों में भी तेजी आने की उम्मीद जगती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत का फैसला लंबी कानूनी प्रक्रिया, साक्ष्यों की पड़ताल और गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद आया है।\n\n• साक्ष्यों की मुकम्मल पड़ताल: इस मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष ने तकनीकी व फोरेंसिक साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए थे। करीब 13 महीने चली इस ट्रायल प्रक्रिया में कुल 126 पेशियों के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों को बारीकी से परखा।\n• गवाहों के बयानों की भूमिका: मामले की सुनवाई के दौरान 22 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इन गवाहों की गवाही और जिरह पूरी होने के बाद ही अदालत किसी ठोस कानूनी निष्कर्ष पर पहुंच सकी।\n• अंतिम बहस का समापन: अभियोजन और बचाव पक्ष के वकीलों ने अपने अंतिम तर्क अदालत के समक्ष रखे। दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें सुनने के उपरांत जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने 30 सितंबर 2026 को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को हत्या का दोषी करार दिया।\n• सजा के लिए प्रक्रियागत समय: दोषसिद्धि के तुरंत बाद कानूनन सजा पर बहस के लिए समय निर्धारित किया जाता है। अदालत ने दोनों पक्षों को दंड की मात्रा पर अपनी अंतिम दलीलें पेश करने के लिए 14 अक्टूबर की तिथि तय की है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सौरभ राजपूत मर्डर केस में अदालत ने किन्हें दोषी पाया है?\nअदालत ने मृतक की पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को सौरभ राजपूत की हत्या का दोषी करार दिया है।\n\n2. इस मामले में फैसला किस अदालत और किस जज ने सुनाया?\nयह फैसला मेरठ की जिला अदालत में जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा-द्वितीय की अदालत द्वारा सुनाया गया।\n\n3. दोषियों की सजा पर फैसला कब सुनाया जाएगा?\nअदालत ने दोनों दोषियों की सजा की मात्रा तय करने के लिए 14 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की है।\n\n4. यह ट्रायल कितने समय चला और इसमें कितने गवाह शामिल थे?\nयह ट्रायल लगभग 13 महीने तक चला, जिसमें 126 पेशियां हुईं और 22 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए।\n\n5. जज अरविंद कुमार मिश्रा न्यायिक सेवा में कब शामिल हुए थे?\nवे 31 मई 2003 को अपर सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में न्यायिक सेवा में नियुक्त हुए थे और उनकी पहली तैनाती गाजीपुर में हुई थी।\n\n6. जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा का गृह जिला कौन सा है?\nइलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक प्रोफाइल के अनुसार उनका गृह जिला उत्तर प्रदेश का मऊ है।",
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  "category": "उत्तर प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-09-30",
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