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  "title": "मुगलसराय के ऐतिहासिक मानसरोवर तालाब की बदहाली पर फूटा लोगों का गुस्सा, स्वच्छ भारत के दावों को बताया केवल फोटो तक सीमित",
  "summary": "मुगलसराय के प्रसिद्ध मानसरोवर तालाब की बदहाली को लेकर स्थानीय निवासियों में भारी रोष है। छठ पूजा के बाद इस जलाशय को कूड़े के ढेर, सुलगते कचरे और गंभीर प्रदूषण के बीच लावारिस छोड़ दिया गया है।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के अंतर्गत आने वाले मुगलसराय क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध मानसरोवर तालाब की मौजूदा दयनीय स्थिति केंद्र सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रही है। देश भर में स्वच्छता और साफ-सफाई को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। मुगलसराय का यह ऐतिहासिक मानसरोवर तालाब केवल एक जल निकाय नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के हजारों लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। विशेष रूप से लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के अवसर पर यहां पैर रखने की जगह नहीं होती और हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चन के लिए एकत्र होते हैं। पर्व के दौरान तो इस तालाब की रूप-रेखा बिल्कुल बदल दी जाती है, लेकिन त्योहार समाप्त होते ही प्रशासन और संबंधित विभाग इस धार्मिक स्थल को पूरी तरह से भूल जाते हैं। वर्तमान समय में यह जलाशय कचरे के बड़े ढेर, चारों तरफ फैली भीषण दुर्गंध और जल प्रदूषण का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले तालाब की नियमित साफ-सफाई की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई भी प्रशासनिक संस्था आगे आने को तैयार नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रेलवे प्रशासन, नगर पालिका परिषद और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी तालमेल न होने और जिम्मेदारी तय न होने के कारण यह तालाब दिन-प्रतिदिन अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है।\n\nछठ पूजा के बाद उपेक्षा का शिकार बनता जलाशय\nस्थानीय निवासियों का कहना है कि जब छठ महापर्व का समय आता है, तब प्रशासन और स्थानीय समितियों की सक्रियता देखने लायक होती है। उस दौरान तालाब के घाटों की साफ-सफाई इस तरह की जाती है मानो किसी वीआईपी कार्यक्रम की तैयारी हो रही हो। एक-एक कोने को साफ किया जाता है, चारों तरफ से जमा कचरे को हटाया जाता है और घाटों को रंग-बिरंगी रोशनी तथा फूलों से बेहद खूबसूरती के साथ सजाया जाता है। उस समय सरकारी अमला और स्थानीय अधिकारी भी तालाब के चक्कर लगाते नजर आते हैं। परंतु, जैसे ही छठ पर्व संपन्न होता है और श्रद्धालु अपने घरों को लौटते हैं, वैसे ही इस जलाशय की किस्मत भी बदल जाती है। पर्व के तुरंत बाद यह तालाब दोबारा अपनी उसी बदहाल और गंदी स्थिति में पहुंच जाता है। आज मानसरोवर तालाब के चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। तालाब के किनारों पर कचरे के बड़े-बड़े ढेर लगे हुए हैं, जिनमें लगातार आग सुलगती रहती है। इससे उठने वाला जहरीला धुआं और चारों तरफ फैली सड़ांध ने स्थानीय लोगों का जीना दूभर कर दिया है। सुबह और शाम के समय जो लोग शुद्ध हवा लेने और टहलने के लिए इस तालाब के पास आते थे, उनका कहना है कि अब यहां की बदबू इतनी भीषण हो चुकी है कि कुछ मिनटों के लिए भी खड़ा होना असंभव हो गया है।\n\nदिखावे और फोटो खिंचवाने तक सीमित रहा स्वच्छता अभियान\nप्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए स्थानीय अधिवक्ता संतोष पाठक ने कहा कि मानसरोवर तालाब साल के बाकी महीनों में पूरी तरह उपेक्षित और गंदगी से लबाबब रहता है। उनका कहना है कि पूरे वर्ष इस जलाशय की कोई सुध नहीं लेता और केवल छठ पूजा के दौरान ही कुछ स्थानीय युवा और पूजा समितियां अपने बलबूते पर इसकी सफाई का बीड़ा उठाती हैं। संतोष पाठक ने आरोप लगाया कि न तो केंद्र सरकार, न ही राज्य सरकार और न ही स्थानीय नगर निकाय इस गंभीर मुद्दे पर जरा भी संजीदा नजर आते हैं। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार का स्वच्छता अभियान धरातल पर काम करने के बजाय केवल तस्वीरों में चमकने और फोटो खिंचवाने का एक जरिया बनकर रह गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्वच्छता और विकास के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट आवंटित किया जाता है, तो फिर शहर की गलियों, रिहायशी इलाकों और ऐतिहासिक सार्वजनिक स्थलों की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है? उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासनिक अधिकारी अपने आलीशान सरकारी आवासों और केवल विशिष्ट वीआईपी क्षेत्रों की सफाई पर ही ध्यान केंद्रित रखते हैं, जबकि आम जनता की बस्तियों, मोहल्लों और इस तरह के सार्वजनिक व धार्मिक स्थलों को पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है।\n\nएक महीने से जल रहा कचरा और लोगों के स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा\nइस बदहाली पर दुख व्यक्त करते हुए क्षेत्र के निवासी अजय यादव ने बताया कि मानसरोवर तालाब के ठीक किनारे कचरे का एक विशाल भंडार लगा हुआ है, जिसमें पिछले काफी समय से लगातार आग जल रही है। उन्होंने दावा किया कि इस कचरे के ढेर से पिछले लगभग एक महीने से लगातार घना और जहरीला धुआं निकल रहा है। अजय यादव के अनुसार, एक बार इस सुलगती हुई आग को बुझाने के लिए दमकल विभाग की गाड़ी भी बुलाई गई थी। दमकलकर्मियों ने आग पर काबू पाने की कोशिश तो की, लेकिन वे इसे पूरी तरह से शांत करने में असफल रहे और यह आग आज भी सुलग रही है। तालाब के पास से लगातार उठने वाला यह काला धुआं आसपास के रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोगों के फेफड़ों में जहर घोल रहा है, जिससे सांस लेने में कठिनाई जैसी गंभीर बीमारियां होने का खतरा बढ़ गया है। इस मार्ग का उपयोग प्रतिदिन हजारों राहगीर और स्थानीय लोग आवागमन के लिए करते हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। अजय यादव ने मुगलसराय के विभिन्न वार्डों की सफाई व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि अधिकांश वार्डों में गंदगी का अंबार लगा हुआ है और लोगों को अपनी नाक बंद करके सड़कों से गुजरना पड़ता है, जबकि इसके ठीक विपरीत अधिकारियों की सुरक्षित कॉलोनियों में नियमित रूप से चमचमाती सफाई की जाती है।\n\nऑक्सीजन की भारी कमी और जलीय जीवों का खत्म होता अस्तित्व\nतालाब की इस दयनीय स्थिति के पीछे फैले भ्रष्टाचार को मुख्य कारण मानते हुए स्थानीय नागरिक माधवेंद्र मूर्ति ओझा ने अपनी चिंता साझा की। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से जलाशयों के जीर्णोद्धार, सौंदर्यीकरण, उनकी खुदाई करवाने और उनमें मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के नाम पर हर साल भारी-भरकम बजट जारी किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस पैसे का कोई प्रभाव नजर नहीं आता। तालाब के प्रदूषित पानी में तैरती मृत मछलियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने कहा कि पानी में बढ़ते प्रदूषण और ऑक्सीजन की अत्यंत कमी के कारण जलीय जीव और मछलियां तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही हैं। माधवेंद्र मूर्ति ओझा का स्पष्ट आरोप है कि यदि सरकार की विकास योजनाओं और बजट का सही तरीके से और पूरी पारदर्शिता के साथ जमीन पर क्रियान्वयन किया गया होता, तो आज इस पवित्र और ऐतिहासिक तालाब को इस तरह नष्ट होते नहीं देखना पड़ता।\n\nअमृत सरोवर जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं की खुली पोल\nएक अन्य स्थानीय निवासी अरुण द्विवेदी ने इस मुद्दे पर सरकार के दावों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार अमृत सरोवर जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से तालाबों को नया जीवन देने और उन पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ मानसरोवर तालाब की यह दुर्दशा इन सभी दावों की पोल खोल कर रख देती है। तालाब के चारों ओर फैला हुआ प्लास्टिक, कचरा और सुलगती आग से निकलता धुआं न केवल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इंसानी जीवन के लिए भी एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बन गया है। उनका आरोप है कि योजनाओं के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये तो जारी कर दिए जाते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाने के कारण इस बजट का वास्तविक लाभ आम जनता तक कभी नहीं पहुंच पाता।\n\nस्थानीय बुजुर्गों और निवासियों ने याद करते हुए बताया कि कुछ साल पहले इस तालाब का विशेष सौंदर्यीकरण कार्य कराया गया था। उस समय इसे एक खूबसूरत पर्यटन स्थल का रूप देने के उद्देश्य से इस तालाब के पानी में तैरने के लिए सुंदर हंस भी छोड़े गए थे, ताकि लोग यहां आकर सुकून के पल बिता सकें। लेकिन आज प्रशासनिक उपेक्षा के कारण तालाब का वह सौंदर्य पूरी तरह से धूल-धूसरित हो चुका है। हर तरफ कचरे की मोटी परत जमी हुई है और पानी पूरी तरह से काला और प्रदूषित हो गया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस जलाशय की नियमित रूप से देखरेख की जाए और इसकी सफाई के लिए एक स्थायी तंत्र विकसित किया जाए, तो यह मानसरोवर तालाब न केवल मुगलसराय की एक बेहतरीन पहचान बन सकता है, बल्कि एक शानदार पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है।\n\nहालांकि, इन सब के बीच सबसे बड़ा और अनुत्तरित प्रश्न यही बना हुआ है कि आखिर इस ऐतिहासिक जलाशय की नियमित सफाई और रख-रखाव की जिम्मेदारी किस विभाग की है? स्थानीय निवासियों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि जब भी वे इस संबंध में शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी विभाग के पास जाते हैं, तो अधिकारी अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर टाल देते हैं। कभी रेलवे प्रशासन का बहाना बनाया जाता है, तो कभी नगर पालिका परिषद की सीमा का हवाला देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। अधिकारियों की इस आपसी खींचतान और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की नीति का खामियाजा केवल और केवल आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।\n\nहजारों लोगों की आस्था से जुड़ा एक ऐतिहासिक पहचान का प्रतीक\nउल्लेखनीय है कि मुगलसराय का यह मानसरोवर तालाब केवल पानी का एक गड्ढा या सामान्य जलाशय नहीं है। यह तालाब इस पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और हजारों परिवारों की धार्मिक भावनाओं से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। यह वही पवित्र घाट है जहां हर साल छठ पूजा के समय पूरा शहर एक सूत्र में बंधा हुआ नजर आता है। जिस तालाब को धार्मिक उत्सवों के समय पूरी लगन से चमकाया जाता है, उसका बाकी के पूरे साल गंदगी और भीषण बदबू के साए में लावारिस पड़े रहना प्रशासनिक व्यवस्था के चेहरे पर एक बड़ा तमाचा है। यह मुद्दा केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अधिकारियों की जवाबदेही और नियमित रख-रखाव के प्रति उनकी उदासीनता को भी दर्शाता है। यदि संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारी अब भी इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान नहीं देते हैं, तो भव्य स्वच्छता अभियानों के विज्ञापनों और विकास के दावों पर मानसरोवर तालाब की यह बदहाली हमेशा सवाल खड़े करती रहेगी।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत भर में: यह समस्या देश भर में जल निकायों के संरक्षण के लिए चलाए जा रहे स्वच्छता अभियानों और अमृत सरोवर जैसी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही की कमी को उजागर करती है।\n• मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में: स्थानीय नागरिकों और राहगीरों को कचरा जलने से होने वाले वायु प्रदूषण और तालाब की गंदगी से फैलने वाली बीमारियों के गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मुगलसराय का मानसरोवर तालाब किस त्योहार के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है?\nमानसरोवर तालाब मुख्य रूप से लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के लिए प्रसिद्ध है, जहां हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए जुटते हैं।\n\n2. छठ पूजा के बाद तालाब की क्या स्थिति हो जाती है?\nपर्व समाप्त होते ही तालाब प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हो जाता है, जिससे वहां कचरे का अंबार लग जाता है, पानी प्रदूषित हो जाता है और तीव्र दुर्गंध फैलने लगती है।\n\n3. स्थानीय लोगों ने कचरे के जलने को लेकर क्या शिकायत की है?\nनिवासियों का कहना है कि तालाब के किनारे कचरे के ढेर में लगभग एक महीने से लगातार आग सुलग रही है, जिससे उठने वाला जहरीला धुआं स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट बना हुआ है।\n\n4. तालाब में मछलियों की मौत का क्या कारण बताया जा रहा है?\nपानी में बढ़ते भारी प्रदूषण और ऑक्सीजन की अत्यधिक कमी के कारण तालाब की मछलियां और अन्य जलीय जीव मर रहे हैं।\n\n5. मानसरोवर तालाब की सफाई की जिम्मेदारी किस विभाग की है?\nइस तालाब की नियमित सफाई की जिम्मेदारी को लेकर विवाद है। जब भी शिकायत की जाती है, तो रेलवे प्रशासन और स्थानीय नगर पालिका परिषद जैसी एजेंसियां जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाल देती हैं।",
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  "publishedAt": "2026-06-26",
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