रामपुर की स्वार सीट पर तीन दशकों का सियासी दांव-पेच और 2027 के चुनावी समीकरण रामपुर जिले की चर्चित स्वार विधानसभा सीट पर तीन दशकों के चुनावी उतार-चढ़ाव और 2027 के संभावित सियासी मुकाबले का विस्तृत विश्लेषण। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में स्थित स्वार विधानसभा क्षेत्र राज्य की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीटों में शुमार रहा है। इस विधानसभा क्षेत्र का इतिहास बड़े सियासी बदलावों और सत्ता के नाटकीय हस्तांतरण की अनूठी दास्तान बयां करता है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद भारत निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में पूर्ववर्ती स्वार टांडा सीट का नाम बदलकर स्वार कर दिया गया और इसकी क्रम संख्या 20 से बदलकर 34 हो गई। यह एक सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीट है। इस निर्वाचन क्षेत्र की एक खास सियासी परंपरा रही है कि यहां के मतदाताओं ने पिछले तीन दशकों में जिस भी प्रतिनिधि पर भरोसा जताया, उसे लगातार कई बार विधानसभा में भेजने का फैसला किया। 1990 के दौर में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का मजबूत आधार रहा, जब शिव बहादुर सक्सेना लगातार चार बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2000 के दशक में नवाब काजिम अली खान ने लगातार तीन बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 2017 में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान ने यहीं से अपने चुनावी सफर की शुरुआत की और दो बार विधायक चुने गए। हालांकि, वर्ष 2023 के उपचुनाव में यह सीट पहली बार अपना दल (सोनेलाल) के खाते में चली गई। 1990 के दशक में स्वार टांडा पर शिव बहादुर सक्सेना का दबदबा वर्ष 1991 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अयोध्या गोलीकांड के बाद के दौर में हुआ था। उस चुनाव में बीजेपी ने शिव बहादुर सक्सेना को उम्मीदवार बनाया था, जबकि उनके मुकाबले में कांग्रेस की तरफ से निसार हुसैन और जनता दल के अब्दुल गफूर मैदान में थे। इस त्रिकोणीय मुकाबले में शिव बहादुर सक्सेना ने 44 हजार 138 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस के निसार हुसैन को 11 हजार 529 वोटों के अंतर से शिकस्त दी, जिन्हें कुल 32 हजार 609 वोट प्राप्त हुए। वहीं जनता दल के अब्दुल गफूर 26 हजार 356 वोट हासिल करके तीसरे स्थान पर रहे। इससे पहले 1989 में भी शिव बहादुर सक्सेना ने जीत दर्ज की थी, लिहाजा 1991 में उनकी यह लगातार दूसरी चुनावी जीत थी। वर्ष 1993 के मध्यावधि चुनाव में शिव बहादुर सक्सेना ने अपनी जीत की हैट्रिक पूरी की। इस मुकाबले में भी मुख्य प्रतियोगी वही पुराने चेहरे थे। बीजेपी प्रत्याशी शिव बहादुर सक्सेना को 50 हजार 845 वोट मिले, जबकि जनता दल के अब्दुल गफूर ने 38 हजार 140 वोट जुटाए। इस बार निसार हुसैन निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे और उन्होंने 26 हजार 766 वोट प्राप्त किए। शिव बहादुर सक्सेना ने यह मुकाबला 12 हजार 705 वोटों के अंतर से जीता। कांग्रेस पार्टी ने निसार हुसैन की जगह जाहिद अली को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया था, जो महज 23 हजार 597 वोट पाकर चौथे स्थान पर खिसक गए थे। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में भी स्वार टांडा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ जारी रहा। इस बार मुकाबला चतुष्कोणीय नजर आ रहा था। बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना के सामने समाजवादी पार्टी के टिकट पर अब्दुल गफूर और बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी राधेश्याम आर्य ताल ठोक रहे थे। वहीं निसार हुसैन किसान विकास पार्टी के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतरे थे। कड़े मुकाबले में शिव बहादुर सक्सेना ने 59 हजार 477 वोट हासिल करते हुए लगातार चौथी बार जीत का परचम लहराया। उन्होंने समाजवादी पार्टी के अब्दुल गफूर को 7 हजार 493 वोटों के अंतर से हराया, जिन्हें 51 हजार 984 वोट हासिल हुए थे। 1990 के बाद के दौर में स्वार टांडा सीट पर यह सबसे नजदीकी मुकाबला दर्ज किया गया था। इस चुनाव में बीएसपी के राधेश्याम आर्य 41 हजार 511 वोटों के साथ तीसरे और केवीपी के निसार हुसैन 31 हजार 618 वोटों के साथ चौथे पायदान पर रहे। 2002 में नवाब काजिम अली खान का उभार और सियासी बदलाव वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में स्वार टांडा के सियासी परिदृश्य में युगांतरकारी बदलाव देखने को मिला। कांग्रेस प्रत्याशी नवाब काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बीजेपी के चार बार के विधायक शिव बहादुर सक्सेना के विजय रथ पर विराम लगा दिया। नवाब काजिम अली खान ने 83 हजार 135 वोट हासिल किए और शिव बहादुर सक्सेना को 27 हजार 10 वोटों के भारी अंतर से पराजित किया। इस चुनाव में शिव बहादुर सक्सेना 56 हजार 125 वोट ही जुटा सके। बहुजन समाज पार्टी की तरफ से चुनावी समर में उतरे यूसुफ अली 38 हजार 938 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे। वर्ष 2007 के चुनाव तक राजनीतिक समीकरणों ने फिर करवट ली। नवाब काजिम अली खान ने दल बदलते हुए इस बार समाजवादी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा। पार्टी बदलने के बावजूद जनादेश उनके पक्ष में रहा। उन्होंने 61 हजार 227 वोट हासिल किए और बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना को 14 हजार 606 वोटों से मात दी। शिव बहादुर सक्सेना इस चुनाव में 46 हजार 621 वोटों तक ही पहुंच पाए। बीएसपी के टिकट पर दोबारा लड़े यूसुफ अली को जनता ने 43 हजार 857 वोट दिए और वह एक बार फिर तीसरे स्थान पर रहे। 2008 के परिसीमन के बाद का नया भूगोल और नवाब की हैट्रिक वर्ष 2008 में चुनाव आयोग द्वारा किए गए परिसीमन के बाद स्वार टांडा का नाम बदलकर केवल स्वार कर दिया गया और इसका विधानसभा क्रमांक 20 से बदलकर 34 हो गया। इस नए परिसीमन के अंतर्गत स्वार नगर निकाय, टांडा कानूनगो सर्किल, स्वार कानूनगो सर्किल और मसवासी इलाके को इस विधानसभा क्षेत्र में शामिल किया गया। वर्ष 2012 के चुनाव में नवाब काजिम अली खान ने स्वार से जीत की व्यक्तिगत हैट्रिक लगाई। इस बार वह दोबारा कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे। उन्होंने 55 हजार 469 वोट हासिल कर बीजेपी प्रत्याशी लक्ष्मी सैनी को 13 हजार 715 वोटों के अंतर से पराजित किया। लक्ष्मी सैनी को 41 हजार 754 वोट मिले। समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे अब्दुल गफूर 37 हजार 828 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे, जबकि बीएसपी उम्मीदवार अब्दुल अजीम खान 24 हजार 932 वोटों पर सिमट गए। 2017 में अब्दुल्ला आजम खान की चुनावी एंट्री और कानूनी विवाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में स्वार सीट पर एक नया सियासी अध्याय शुरू हुआ। समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान के बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान को पार्टी ने स्वार से चुनावी मैदान में उतारा। उनका मुकाबला बीजेपी की लक्ष्मी सैनी से हुआ। अब्दुल्ला आजम खान ने अपने पहले ही चुनाव में 1 लाख 6 हजार 443 वोट हासिल किए और लक्ष्मी सैनी को 53 हजार 96 वोटों के विशाल अंतर से शिकस्त दी। लक्ष्मी सैनी को 53 हजार 347 वोट मिले। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लड़े नवाब काजिम अली खान 42 हजार 233 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। हालांकि इस ऐतिहासिक जीत के बाद अब्दुल्ला आजम खान कानूनी पेचीदगियों में घिर गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2019 में मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि 2017 के नामांकन के समय अब्दुल्ला आजम खान की वास्तविक उम्र 25 वर्ष से कम थी, जो विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अनिवार्य न्यूनतम उम्र सीमा है। इसके आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वार सीट के 2017 के निर्वाचन को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया। 2022 का चुनावी रिकॉर्ड और 2023 के उपचुनाव में अपना दल की ऐतिहासिक जीत समाजवादी पार्टी ने वर्ष 2022 के आम विधानसभा चुनाव में एक बार फिर अब्दुल्ला आजम खान पर दांव लगाया। इस चुनाव में अब्दुल्ला आजम ने स्वार विधानसभा के पूरे इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने 1 लाख 26 हजार 162 वोट हासिल किए और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सहयोगी पार्टी अपना दल (सोनेलाल) के प्रत्याशी हैदर अली खान को 61 हजार 103 वोटों के प्रचंड अंतर से हरा दिया। हैदर अली खान को 65 हजार 59 वोट मिले थे। वहीं बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी अध्यापक शंकरलाल महज 14 हजार 963 वोट ही हासिल कर सके। इतने बड़े जनादेश के बावजूद अब्दुल्ला आजम खान का यह दूसरा कार्यकाल भी पूरा नहीं हो सका। वर्ष 2023 में एक आपराधिक मामले में अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी गई। इसके चलते स्वार सीट रिक्त हो गई और मई 2023 में उपचुनाव कराना पड़ा। इस उपचुनाव में बीजेपी ने 2022 की रणनीति को दोहराते हुए यह सीट अपने सहयोगी दल अपना दल (सोनेलाल) को सौंपी। अपना दल (सोनेलाल) ने शफीक अहमद अंसारी को प्रत्याशी बनाया। इस सीधे मुकाबले में शफीक अहमद अंसारी ने 68 हजार 630 वोट पाकर समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी अनुराधा चौहान को 8 हजार 724 वोटों से हरा दिया। अनुराधा चौहान को 59 हजार 906 वोट मिले। तीसरे स्थान पर रही पीस पार्टी की डॉक्टर नाजिया सिद्दीकी महज 4 हजार 688 वोटों पर सिमट कर रह गईं। इस जीत के साथ स्वार सीट पर पहली बार अपना दल (सोनेलाल) का परचम लहराया। 2027 के चुनाव के लिए सामाजिक ताना-बाना और सियासी समीकरण स्वार विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक और जनसांख्यिकीय ढांचे को देखें तो यह एक मुस्लिम बहुल इलाका माना जाता है। मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ यहां अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रमुख समुदाय जैसे सैनी, लोधी, पाल, कश्यप और प्रजापति के अलावा वैश्य और अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाता भी निर्णायक संख्या में मौजूद हैं। यदि 1991 से लेकर 2023 के उपचुनाव तक के तीन दशकों के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें, तो बीजेपी और उसके गठबंधन ने चार बार जीत हासिल की है, समाजवादी पार्टी ने तीन बार और कांग्रेस ने दो बार इस सीट पर कब्जा जमाया है। व्यक्तिगत उम्मीदवारों के लिहाज से देखें तो शिव बहादुर सक्सेना और नवाब काजिम अली खान दोनों ने तीन-तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। वर्ष 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में स्वार का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होने के आसार हैं। वर्तमान में बीजेपी और अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व वाले अपना दल (सोनेलाल) का एनडीए गठबंधन कायम है। रणनीतिक साझेदारी के तहत संभव है कि एनडीए गठबंधन स्वार सीट पर पुनः अपना दल (सोनेलाल) के उम्मीदवार को मैदान में उतारे। दूसरी तरफ, उन्हें सीधी चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन का संयुक्त प्रत्याशी सामने आ सकता है। बहुजन समाज पार्टी भी पूरी ताकत झोंकने की कोशिश करेगी, लेकिन अतीत में वह कभी भी इस सीट पर पहले या दूसरे स्थान पर नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में 2027 के रण में स्वार सीट पर एनडीए और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बीच आमने-सामने की कड़ी चुनावी टक्कर देखने को मिल सकती है। इसका आप पर असर स्वार विधानसभा क्षेत्र का चुनावी इतिहास और मौजूदा शक्ति संतुलन रामपुर जिले के मतदाताओं और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर सीधा असर डालते हैं। • रामपुर में: स्थानीय मतदाताओं को 2027 के चुनाव में दो प्रमुख गठबंधनों के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। बुनियादी नागरिक सुविधाओं और विकास से जुड़े स्थानीय मुद्दों को लेकर दोनों पक्ष जनता के बीच पहुंचेंगे। • उत्तर प्रदेश में: रामपुर जिले की इस सीट पर होने वाले चुनावी फैसले से राज्य में एनडीए और विपक्षी गठबंधन की जमीनी पकड़ का आकलन होगा। यह परिणाम राज्य भर में जातिगत और सामाजिक गठजोड़ के प्रभाव को स्पष्ट करेगा। • मतदाताओं के लिए: पिछले कई कार्यकालों के अधूरे रहने के बाद मतदाता क्षेत्र में प्रशासनिक निरंतरता और स्थायी प्रतिनिधित्व की उम्मीद कर रहे हैं। नागरिकों को अपने मताधिकार के प्रयोग से पहले उम्मीदवारों के कानूनी और राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड पर गौर करने का मौका मिलेगा। • राजनीतिक दलों के लिए: स्वार का परिणाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल और ओबीसी बहुल सीटों पर पार्टियों के टिकट वितरण की रणनीति तय करेगा। छोटे सहयोगी दलों के प्रभाव और चुनावी स्वीकार्यता की भी यहां अग्निपरीक्षा होगी। ऐसा क्यों हुआ स्वार विधानसभा सीट पर तीन दशकों के दौरान हुए सियासी उतार-चढ़ाव और हालिया राजनीतिक बदलाव कई कानूनी, सामाजिक और रणनीतिक कारकों का परिणाम रहे हैं। • चुनावी अयोग्यता और कानूनी फैसले: अब्दुल्ला आजम खान की विधायकी दो बार कानूनी कारणों से प्रभावित हुई, जिसमें 2019 में आयु संबंधी विवाद पर निर्वाचन रद्द होना और 2023 में आपराधिक मामले में दोषसिद्धि शामिल है। इन न्यायिक निर्णयों के चलते सीट रिक्त हुई और समय से पहले उपचुनाव कराने की नौबत आई। • एनडीए की सामाजिक और गठबंधन रणनीति: बीजेपी ने मुस्लिम-ओबीसी जनसांख्यिकी को साधने के लिए इस सीट को अपने सहयोगी दल अपना दल (सोनेलाल) के लिए छोड़ दिया। इस रणनीति के तहत मुस्लिम उम्मीदवार शफीक अहमद अंसारी को उतारकर गठबंधन ने 2023 के उपचुनाव में जीत हासिल की। • पारंपरिक राजनीतिक वर्चस्व का अंत: 1990 के दशक में बीजेपी के शिव बहादुर सक्सेना और 2000 के दशक में नवाब परिवार के काजिम अली खान के व्यक्तिगत प्रभाव के बाद आजम परिवार ने स्वार में प्रभुत्व स्थापित किया था। कानूनी उलझनों और नए गठबंधन प्रयोगों ने इस पारंपरिक समीकरण को तोड़कर नए दलों के लिए रास्ता खोला। सवाल-जवाब 1. स्वार विधानसभा सीट का परिसीमन कब हुआ और इसका क्या असर पड़ा? 2008 के परिसीमन के बाद स्वार टांडा सीट का नाम बदलकर स्वार हो गया और इसका विधानसभा नंबर 20 से बदलकर 34 हो गया। 2. 1990 के दशक में स्वार टांडा से किस नेता ने लगातार चार बार चुनाव जीता था? बीजेपी के उम्मीदवार शिव बहादुर सक्सेना ने 1990 के दौर में लगातार चार बार इस सीट से जीत दर्ज की थी। 3. अब्दुल्ला आजम खान का 2017 का चुनाव हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिसंबर 2019 में पाया कि 2017 में नामांकन के समय उनकी उम्र न्यूनतम आवश्यक 25 वर्ष से कम थी। 4. 2023 के स्वार उपचुनाव में किस पार्टी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की? 2023 के उपचुनाव में अपना दल (सोनेलाल) के शफीक अहमद अंसारी ने 68,630 वोट पाकर जीत हासिल की थी। 5. स्वार विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक समीकरण कैसा है? यह एक मुस्लिम बहुल सीट है, जहां सैनी, लोधी, पाल, कश्यप, प्रजापति, वैश्य और अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाता भी निर्णायक संख्या में हैं। https://trendkia.com/uttar-pradesh/rampur-ki-suar-sita-para-tina-dashakon-ka-siyasi-danva-pecha-aura-2027-ke-chunavi-samikarana-40383 TrendKia — Har trend, sabse pehle.