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  "type": "article",
  "title": "रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी पर चलेगा बुलडोजर? बचाने के लिए योगी सरकार को छात्रों ने दिया नया फॉर्मूला",
  "summary": "उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को गिराने के नोटिस ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। यूनिवर्सिटी के छात्र अपने भविष्य को लेकर बेहद चिंतित हैं और उन्होंने प्रशासन से इमारत को ढहाने के बजाय इसका नाम बदलने या इसे सीधे सरकारी नियंत्रण में लेने की गुहार लगाई है।",
  "content": "उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के अस्तित्व पर एक बड़ा और अभूतपूर्व संकट मंडरा रहा है। राज्य में अगले विधानसभा चुनाव होने में अब महज छह महीने का ही वक्त बचा है, और ठीक इसी बीच रामपुर विकास प्राधिकरण की तरफ से जारी किए गए एक सख्त फरमान ने सियासी हलचल को तेज कर दिया है। प्राधिकरण ने अपनी जांच के बाद यह स्पष्ट कर दिया है कि विशाल यूनिवर्सिटी परिसर में मौजूद चालीस में से अड़तीस इमारतों का निर्माण बिना नक्शा पास कराए किया गया है। प्रशासन ने इन सभी इमारतों को पूरी तरह से अवैध घोषित करते हुए उन्हें जमींदोज करने का अंतिम फैसला सुना दिया है। इस चौंकाने वाले फैसले के बाद न सिर्फ राजधानी लखनऊ से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है, बल्कि यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे सैकड़ों छात्र-छात्राओं में भारी रोष और बेचैनी फैल गई है। पंद्रह जुलाई को प्रशासन द्वारा जारी किए गए नोटिस में विध्वंस की कार्रवाई के लिए पांच अगस्त तक की मोहलत दी गई है। यह समय सीमा जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे परिसर के भीतर और बाहर विरोध प्रदर्शन भी तेज होते जा रहे हैं। खासकर छात्राएं बड़ी संख्या में आगे आकर इस दंडात्मक कार्रवाई का पुरजोर विरोध कर रही हैं। उनका साफ मानना है कि शिक्षा के मंदिर को राजनीतिक रंजिश का शिकार किसी भी हाल में नहीं बनाया जाना चाहिए।\n\n \n\nछात्रों ने पेश किया सरकार को बीच का रास्ता\n\nयूनिवर्सिटी के संभावित विध्वंस को रोकने के लिए छात्र लगातार स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य शासन तक गुहार लगा रहे हैं। विरोध प्रदर्शन में जुटे इन छात्रों का कहना है कि यह पूरा परिसर आम लोगों द्वारा दिए गए चंदे की पाई-पाई जोड़कर तैयार किया गया है और इसका सीधा संबंध उनके समेत सैकड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। अपने भविष्य को अंधकार में जाता देख छात्रों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के सामने एक अनोखा और व्यावहारिक प्रस्ताव रखा है। उनका तर्क है कि अगर मौजूदा भारतीय जनता पार्टी की सरकार को यूनिवर्सिटी के वर्तमान नाम से कोई भी आपत्ति या परेशानी है, तो वह बेझिझक इसका नाम बदल सकती है। इसके अलावा, छात्र इस बात के लिए भी पूरी तरह से राजी हैं कि सरकार इस पूरी यूनिवर्सिटी की व्यवस्था को अपने सीधे नियंत्रण में ले ले और अपने तरीके से या नए प्रबंधन के जरिए इसका संचालन करे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी और एकमात्र मांग यही है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी और बेहतरीन सुविधाओं वाली इस शैक्षणिक इमारत को किसी भी कीमत पर न गिराया जाए।\n\n छात्रों का यह गहरा दर्द उनके बयानों और प्रदर्शनों में साफ झलकता है। इसी यूनिवर्सिटी से मेडिकल क्षेत्र से जुड़ा ऑपरेशन थिएटर (ओटी) टेक्नीशियन का कोर्स कर रहे बीस वर्षीय छात्र शाहवेज अपने करियर को लेकर बेहद चिंतित हैं। उन्होंने प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा, \"किसी शिक्षा के संस्थान को बर्बाद कर देने से किसी सरकार को क्या हासिल हो जाएगा।\" शाहवेज का स्पष्ट मानना है कि अगर यह पूरी तरह से एक राजनीतिक लड़ाई है, तो इसका अखाड़ा राजनेताओं तक ही सीमित रहना चाहिए और इसमें छात्रों या यूनिवर्सिटी की इमारतों को मोहरा बिल्कुल नहीं बनाया जाना चाहिए। इसी तरह, एम फार्मा के अंतिम वर्ष के छात्र मोहम्मद शोएब की चिंता भी लाजमी और गंभीर है। शोएब की पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी है और उन्हें महज तीन महीने बाद अपनी बहुप्रतीक्षित डिग्री मिलने वाली है। अब उन्हें हर पल यह डर सता रहा है कि अगर यूनिवर्सिटी की मुख्य इमारतें ही जमींदोज हो जाएंगी, तो क्या भविष्य में उनके कोर्स और उनकी डिग्री को बाजार में कोई मान्यता मिलेगी या नहीं। पांच अगस्त की मियाद इन तमाम छात्रों के लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं है।\n\n \n\nविपक्ष ने खोला मोर्चेबंदी का रास्ता\n\nइस बड़े शैक्षणिक संस्थान पर मंडराते खतरे ने विभिन्न विपक्षी दलों को भी एक मंच पर आकर सरकार को घेरने का मौका दे दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद और दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मनोज झा ने इस संवेदनशील मामले में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनके हस्तक्षेप की मांग की है। मनोज झा ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से अपील की है कि वह इस विध्वंस की कार्रवाई को तुरंत रोकने के लिए कड़े कदम उठाए। उन्होंने अपने पत्र में बेहद तल्ख शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि उच्च शिक्षा के किसी भी संस्थान को इस तरह से गिराने की अनुमति देना इक्कीसवीं सदी के भारत के इतिहास का सबसे काला धब्बा माना जाएगा। उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए लिखा, \"यूनिवर्सिटी केवल ईंट और गारे की इमारतें नहीं हैं।\" झा का तर्क है कि ऐसे परिसर सिर्फ ढांचा नहीं होते, बल्कि ये वे जगहें हैं जहां ज्ञान को बढ़ावा मिलता है, आलोचनात्मक सोच फलती-फूलती है और आने वाली पीढ़ियों का मजबूत भविष्य आकार लेता है।\n\n मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने भी रामपुर विकास प्राधिकरण की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी राय मजबूती से रखते हुए उन्होंने राज्य प्रशासन को आगाह किया कि उत्तर प्रदेश को अभी भी बहुत सारे अच्छे संस्थानों की सख्त जरूरत है। थरूर ने अपनी पोस्ट में लिखा, \"एक ऐसे राज्य में जहां हायर एजुकेशन के अच्छे इंस्टिट्यूशन्स की कमी है... एक गलत फैसला है।\" उनका सुझाव है कि अगर इमारतों के निर्माण में वाकई कोई बड़ी अनियमितता या गैर-कानूनी गतिविधि पाई गई है, तो इसके लिए अन्य वैकल्पिक सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए। प्रशासन चाहे तो संस्था पर भारी आर्थिक जुर्माना लगा सकता है, कोई अन्य दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है, या फिर पूरी संपत्ति को जब्त करके सरकारी कब्जे में ले सकता है। लेकिन एक सुचारू रूप से चल रही सक्रिय यूनिवर्सिटी को बुलडोजर से ढहाना किसी भी नजरिए से सही कदम नहीं है।\n\n वहीं, राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव भी इस मुद्दे पर पूरी तरह से मुखर हो गए हैं। उन्होंने न केवल आंदोलनरत छात्रों बल्कि उनके अभिभावकों से भी अपील की है कि वे यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए एक बड़ा जन आंदोलन छेड़ें। अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर सत्ताधारी दल पर बदले की भावना से काम करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरकार को अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान को शिकार नहीं बनाना चाहिए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के नेतृत्व में अठाईस वरिष्ठ सदस्यों की एक विशेष उच्च स्तरीय कमेटी का गठन भी कर दिया है। यह कमेटी जल्द ही रामपुर के जिलाधिकारी (डीएम) से आधिकारिक मुलाकात करेगी और इमारत को बचाने के लिए प्रशासन पर हर संभव कूटनीतिक दबाव बनाएगी।\n\n \n\nचुनाव से पहले योगी सरकार के सामने धर्मसंकट\n\nउत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह पूरा विवाद एक बड़ा और निर्णायक सियासी मुद्दा बन चुका है। आम जनता, छात्रों और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर गहरी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार चुनाव से ठीक पहले इतना बड़ा और कड़ा कदम उठाएगी या फिर यूनिवर्सिटी को बचाकर जनता के बीच कोई नया राजनीतिक संदेश देगी। राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा यह मानता है कि वर्तमान में देशभर के युवा रोजगार और शिक्षा जैसे विभिन्न मुद्दों पर सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ अपनी नाराजगी जता रहे हैं। ऐसे माहौल में अगर योगी सरकार यूनिवर्सिटी को ढहाने का अपना फैसला वापस ले लेती है, तो वह छात्रों और युवाओं के बड़े वर्ग के बीच यह सकारात्मक संदेश दे सकती है कि उसे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर युवाओं के भविष्य की फिक्र है।\n\n हालांकि, इसके विपरीत एक मजबूत राजनीतिक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि सत्ताधारी पार्टी अपने मूल और आक्रामक राजनीतिक एजेंडे से शायद ही पीछे हटे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन दिनों राज्य के विभिन्न जिलों का सघन दौरा कर रहे हैं और विकास परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे हैं। अपनी हर जनसभा और सार्वजनिक भाषण में वह पिछली समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए उन पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के गंभीर आरोप लगा रहे हैं। सरकार का पूरा चुनावी अभियान भ्रष्टाचार, माफिया राज और पिछली सरकारों की कथित मनमानियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की सख्त नीति पर आधारित है। इसे देखते हुए कई जानकारों का मानना है कि सरकार अपने कड़े फैसले पर अडिग रह सकती है और अवैध निर्माण के खिलाफ अपनी सख्त छवि को बरकरार रखने के लिए तय समय सीमा के भीतर इन अड़तीस इमारतों को गिराने की योजना को बिना किसी हिचकिचाहट के अमलीजामा पहना सकती है।\n\n \n\nआजम खान के लिए बढ़ती कानूनी मुश्किलें\n\nमोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की परिकल्पना, इसकी स्थापना और इसके मौजूदा गहरे विवाद की जड़ें समाजवादी पार्टी के सबसे कद्दावर मुस्लिम नेता रहे आजम खान से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। आजम खान इस विशाल यूनिवर्सिटी के आजीवन चांसलर (लाइफलॉन्ग चांसलर) हैं और उन्होंने ही अपने राजनीतिक रसूख के दौरान चंदे की बड़ी रकम जुटाकर इस विशाल परिसर का निर्माण कराया था। लेकिन राज्य में जैसे ही सत्ता परिवर्तन हुआ और नई सरकार का गठन हुआ, आजम खान की मुश्किलें दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ती चली गईं। विशेष रूप से साल दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में रामपुर से सांसद चुने जाने के बाद से उनके और उनके करीबियों के खिलाफ कानूनी शिकंजा बहुत तेजी से कसता चला गया।\n\n सरकारी आंकड़े बताते हैं कि रामपुर से सांसद बनने के एक साल से भी कम समय के भीतर आजम खान पर पुलिस ने लगभग सत्तर से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज किए। इन तमाम मुकदमों में से करीब तीस मामले सीधे तौर पर इसी यूनिवर्सिटी के निर्माण, इसकी जमीन और इसके संचालन से जुड़े हुए हैं। उन पर सबसे बड़ा और गंभीर आरोप यह है कि उन्होंने यूनिवर्सिटी के विस्तार के लिए आसपास के किसानों और स्थानीय लोगों की बेशकीमती जमीन डरा-धमका कर हड़प ली। इसके अलावा, प्रशासन और पुलिस ने जांच के दौरान कई हैरान करने वाले दावे भी किए हैं। एक हाई-प्रोफाइल मामले में, सरकारी सड़कें साफ करने वाली बेहद महंगी मशीनें कथित तौर पर यूनिवर्सिटी परिसर के भीतर जमीन में गहराई में दबी हुई पाई गई थीं।\n\n एक अन्य गंभीर मामला शिक्षा जगत से ही जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि परिसर के अंदर मौजूद पुस्तकालय में शहर के एक अन्य प्राचीन मदरसे से चुराई गई बहुमूल्य किताबें और ऐतिहासिक महत्व की पुरानी पांडुलिपियां (मैन्युस्क्रिप्ट्स) कथित तौर पर बरामद की गई थीं। इन तमाम संगीन आरोपों, मुकदमों और पुलिसिया कार्रवाइयों के बीच आजम खान का पूरा परिवार एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ है। यूनिवर्सिटी के संचालन से जुड़े ट्रस्ट की अहम सदस्य और आजम खान की पत्नी तज़ीन फ़ातिमा भी लगातार मीडिया के सामने इन कार्रवाइयों को पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और उनके परिवार को खत्म करने की साजिश बता रही हैं। फिलहाल, सबकी निगाहें पांच अगस्त की उस अंतिम तारीख पर टिकी हैं, जो रामपुर के इतिहास में एक बेहद अहम मोड़ साबित हो सकती है और यह तय करेगी कि शिक्षा के इस परिसर का अंत होगा या यह किसी नए रूप में अपना सफर जारी रखेगा।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: राजनीतिक द्वेष के चलते बड़े शैक्षणिक संस्थानों पर होने वाली दंडात्मक कार्रवाई से देश में शिक्षा के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर एक गलत राष्ट्रीय नजीर बन सकती है।\n• उत्तर प्रदेश में: रामपुर और आसपास के जिलों के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का भारी संकट पैदा हो सकता है, जिससे उन्हें अपनी डिग्री पूरी करने के लिए दूर-दराज के शहरों का रुख करना पड़ेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी कहां स्थित है और यह क्यों चर्चा में है?\nयह यूनिवर्सिटी रामपुर में स्थित है और फिलहाल चर्चा में इसलिए है क्योंकि प्रशासन ने इसकी 38 इमारतों को अवैध बताते हुए गिराने का नोटिस दिया है।\n\n2. रामपुर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी को गिराने का क्या कारण बताया है?\nप्राधिकरण का कहना है कि यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों का नक्शा पास नहीं कराया गया था, जिसके कारण उनका निर्माण पूरी तरह से अवैध है।\n\n3. इमारतों को जमींदोज करने के लिए प्रशासन ने क्या समय सीमा तय की है?\nप्रशासन ने 15 जुलाई को नोटिस जारी कर विध्वंस की कार्रवाई के लिए 5 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया है।\n\n4. यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए छात्रों ने सरकार के सामने क्या विकल्प रखे हैं?\nछात्रों ने सरकार से मांग की है कि वह चाहे तो यूनिवर्सिटी का नाम बदल दे या इसे अपने पूर्ण नियंत्रण में ले ले, लेकिन करोड़ों की लागत से बनी इमारत को न गिराए।\n\n5. आजम खान पर यूनिवर्सिटी से जुड़े कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं?\nसाल 2019 में सांसद बनने के बाद से आजम खान पर लगभग 70 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 30 मामले सीधे तौर पर यूनिवर्सिटी और जमीन से जुड़े हैं।\n\n6. यूनिवर्सिटी परिसर से जांच के दौरान क्या-क्या संदिग्ध चीजें बरामद होने का दावा किया गया है?\nप्रशासन का दावा है कि परिसर से जमीन में दबी हुई सरकारी मशीनें और एक मदरसे से चुराई गई प्राचीन किताबें बरामद हुई हैं।",
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  "publishedAt": "2026-07-23",
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