# सहारनपुर में वर्गीकृत वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान की पहल, नब्बे फीसदी बछिया पैदा होने की उम्मीद

> सहारनपुर पशुपालन विभाग ने गोवंश में बछियों की संख्या बढ़ाने और आवारा मवेशियों की समस्या घटाने के लिए वर्गीकृत वीर्य तकनीक की शुरुआत की है।

**Type:** article · **Category:** उत्तर प्रदेश · **Published:** 2026-10-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttar-pradesh/saharanpur-men-vargikrita-virya-se-kritrima-garbhadhana-ki-pahala-nabbe-phisadi-bachhiya-paida-hone-ki-ummida-49972 · **Language:** Hindi
**Tags:** सहारनपुर, पशुपालन, कृत्रिम गर्भाधान, वर्गीकृत वीर्य, दुग्ध उत्पादन, डेयरी किसान, गोवंश

दुग्ध उत्पादन करने वाले किसानों की लंबे समय से यह मांग रही है कि उनकी गायें बछिया को जन्म दें, ताकि आगे चलकर डेयरी व्यवसाय को विस्तार मिल सके। आधुनिक खेती में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण नर गोवंश यानी सांड या बैलों की जरूरत लगातार घट रही है। इसी स्थिति को देखते हुए सहारनपुर के पशुपालन विभाग ने कृत्रिम गर्भाधान की एक उन्नत तकनीक को धरातल पर उतारना शुरू कर दिया है। इस पद्धति के तहत वर्गीकृत वीर्य का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे गायों में मादा बछड़ों के जन्म लेने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

## प्रयोगशाला में तैयार होता है वर्गीकृत वीर्य
कृत्रिम गर्भाधान की इस नई वैज्ञानिक तकनीक में वीर्य को प्रयोगशाला के भीतर खास जांच और छंटाई प्रक्रिया से गुजारा जाता है। प्रयोगशाला में वीर्य को इस प्रकार छांटा जाता है कि गर्भाधान कराने के बाद मादा यानी बछिया पैदा होने की संभावना लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। पारंपरिक कृत्रिम गर्भाधान में 50 प्रतिशत नर और 50 प्रतिशत मादा पैदा होने की बराबर संभावना रहती थी। वर्गीकृत वीर्य तकनीक के आ जाने से नर बछड़ों के जन्म दर में भारी गिरावट आएगी, जिससे सीधे तौर पर किसानों को बड़ा लाभ मिलेगा।

## लावारिस गोवंश की चुनौती से मिलेगी राहत
सहारनपुर के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. मदन पाल सिंग गौर ने इस व्यवस्था पर बात करते हुए बताया कि वर्तमान समय में अनुपयोगी नर गोवंश की तादाद लगातार बढ़ रही है। खेतों में जुताई और ढुलाई के लिए बैलों का इस्तेमाल लगभग खत्म होने की वजह से किसान नर बछड़ों को पालने से बचते हैं। देखरेख के भारी खर्च से बचने के लिए कई लोग नर पशुओं को खुला छोड़ देते हैं, जिसके कारण सड़कों और कस्बों में लावारिस मवेशियों का जमावड़ा लग जाता है। यह स्थिति आम नागरिकों के लिए दुर्घटनाओं का सबब बनती है और प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है।

## दुग्ध उत्पादन और नस्ल में सुधार
इस आधुनिक विधि के व्यापक प्रसार से न केवल सड़कों पर आवारा पशुओं की समस्या थमेगी, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली नस्ल की बछिया पैदा होने से डेयरी सेक्टर को भी मजबूती मिलेगी। जब उन्नत नस्ल की मादा संतति तैयार होगी, तो पशुपालकों के यहां दूध के कुल उत्पादन में उल्लेखनीय इजाफा देखने को मिलेगा। आर्थिक रूप से कमजोर किसानों के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हो सकती है, क्योंकि उन्हें अनुपयोगी नर गोवंश के भरण पोषण पर अतिरिक्त धन खर्च नहीं करना पड़ेगा।

## पशु अस्पतालों और गर्भाधान केंद्रों पर सुविधा शुरू
पशुपालन विभाग की योजना इस तकनीक को जिले के प्रत्येक गांव और किसान तक पहुंचाने की है। डॉ. मदन पाल सिंग गौर के अनुसार सहारनपुर के सभी कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों और पशु चिकित्सालयों में अब वर्गीकृत वीर्य की उपलब्धता सुनिश्चित कर दी गई है। किसान अपने नजदीकी पशु अस्पताल अथवा कृत्रिम गर्भाधान केंद्र पर संपर्क करके अपनी गायों के लिए इस विशेष वीर्य का लाभ उठा सकते हैं। विभाग का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा पशुपालकों को जागरूक कर इस तकनीक से जोड़ना है, ताकि जिले के पशुधन प्रबंधन को नया रूप दिया जा सके।

## इसका आप पर असर
इस तकनीक के लागू होने से डेयरी किसानों के दुग्ध उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशी प्रबंधन पर सीधा सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

- **भारत में:** देश भर में डेयरी किसानों को अनुपयोगी नर मवेशियों के भरण-पोषण पर खर्च होने वाले अतिरिक्त धन से राहत मिलेगी। इससे भविष्य में सड़कों पर घूमने वाले लावारिस गोवंश की संख्या में भारी कमी आ सकती है।
- **सहारनपुर में:** जिले के सभी पशु चिकित्सालयों और कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों पर वर्गीकृत वीर्य उपलब्ध करा दिया गया है। स्थानीय किसान अपनी गायों में बछिया का जन्म सुनिश्चित करने के लिए तुरंत नजदीकी पशु अस्पताल से संपर्क कर सकते हैं।
- **दूध उत्पादन में बढ़ोतरी:** लगभग 90 प्रतिशत बछिया पैदा होने से हर डेयरी किसान के पास दूध देने वाले पशुओं की संख्या बढ़ेगी। इससे ग्रामीण परिवारों की दैनिक दुग्ध आय में निरंतर सुधार होगा।
- **लावारिस पशुओं की समस्या का समाधान:** नर बछड़ों की संख्या कम होने से सड़कों और खेतों में होने वाले नुकसान पर स्वाभाविक रोक लगेगी। इससे आम नागरिकों को सड़क हादसों और किसानों को फसल सुरक्षा में मदद मिलेगी।

## ऐसा क्यों हुआ
खेती के मशीनीकरण और डेयरी की बदलती जरूरतों के कारण नर मवेशियों की उपयोगिता तेजी से घटी है, जिससे आवारा पशुओं की संख्या बढ़ी है।

- **मशीनीकरण से घटी नर गोवंश की जरूरत:** आधुनिक ट्रैक्टरों और कंबाइन मशीनों के आने से खेतों में जुताई और ढुलाई के लिए बैलों का उपयोग लगभग समाप्त हो गया है। किसान नर बछड़ों का पालन-पोषण करना आर्थिक दृष्टि से घाटे का सौदा मानते हैं।
- **पारंपरिक गर्भाधान की सीमाएं:** साधारण कृत्रिम गर्भाधान में नर और मादा बछड़े पैदा होने की संभावना 50-50 प्रतिशत रहती है। मादा को किसान दूध के लिए रख लेते हैं, जबकि नर बछड़ों को अक्सर सड़कों पर छोड़ दिया जाता है।
- **वर्गीकृत वीर्य का वैज्ञानिक समाधान:** प्रयोगशाला में तैयार वर्गीकृत वीर्य के जरिए 90 प्रतिशत मामलों में मादा संतान की उत्पत्ति तय की जा सकती है। इसी कारण सहारनपुर प्रशासन ने इसे सभी सरकारी केंद्रों पर उपलब्ध कराया है ताकि समस्या का मूल समाधान निकल सके।

## सवाल-जवाब

### 1. सहारनपुर में पशुपालन विभाग ने किस नई तकनीक की शुरुआत की है?
विभाग ने गोवंश में कृत्रिम गर्भाधान के लिए प्रयोगशाला में तैयार वर्गीकृत वीर्य तकनीक की शुरुआत की है।

### 2. वर्गीकृत वीर्य के उपयोग से बछिया पैदा होने की कितनी संभावना रहती है?
इस तकनीक के माध्यम से लगभग 90 प्रतिशत तक बछिया पैदा होने की संभावना बनती है।

### 3. किसानों को नर गोवंश से क्या परेशानी हो रही थी?
खेती में मशीनों के उपयोग के बाद बैलों की जरूरत खत्म हो गई थी, जिससे नर बछड़ों को पालना किसानों के लिए आर्थिक बोझ बन गया था।

### 4. सहारनपुर में यह सुविधा कहां उपलब्ध कराई गई है?
यह सुविधा जिले के सभी कृत्रिम गर्भाधान केंद्रों और पशु अस्पतालों में उपलब्ध करा दी गई है।

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